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मायोपिया : बचपन में 'कमजोर होती आंखें', AIOS ने चेताया कैसे स्क्रीन और मोबाइल बच्चों की आंखों के लिए बने खतरा

risk of Myopia in children: बच्चों की नन्हीं आंखें अपना मनोरंजन मोबाइल और टीवी में देख रही हैं। लेकिन इसी के साथ मायोपिया का भी शिकार हो रही है। AIOS ने बच्चों की कमजोर होती नजर के बारे में चेताया।

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मोबाइल और स्क्रीन टाइम से बढ़ रहा है बच्चों में मायोपिया का खतरा

risk of Myopia in children: अब कम उम्र में बच्चों को चश्मा लगना केवल एक सामान्य समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह भविष्य में आंखों की गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है। तेजी से बढ़ रहे मायोपिया यानी निकट दृष्टिदोष (दूर की चीजें धुंधली दिखना) को लेकर देश के नेत्र विशेषज्ञों ने बड़ा अलर्ट जारी किया है।

विश्व मायोपिया सप्ताह 2026 के दौरान All India Ophthalmological Society (AIOS) ने बच्चों में मायोपिया की रोकथाम और इलाज को लेकर राष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी किए हैं।

ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसाइटी की साइंटिफिक कमेटी की चेयरमैन डॉ. नम्रता शर्मा का कहना है कि मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप और टीवी स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों की आंखों पर गंभीर असर डालना शुरू कर दिया है। बच्चे घंटों तक ऑनलाइन पढ़ाई, गेमिंग और वीडियो देखने में लगे रहते हैं, जिससे आंखों पर लगातार दबाव पड़ रहा है। यही वजह है कि शहरों में स्कूल जाने वाले बच्चों में मायोपिया के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के शहरी इलाकों में लगभग 14 प्रतिशत बच्चे मायोपिया से प्रभावित पाए गए हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है। सन फार्मा द्वारा देश के 13 शहरों और 12 राज्यों में किए गए स्कूल स्क्रीनिंग कार्यक्रम में एक लाख से ज्यादा बच्चों की जांच की गई, जिसमें करीब 13.6 प्रतिशत बच्चों में मायोपिया और 27 प्रतिशत बच्चों में किसी न किसी प्रकार की दृष्टि समस्या पाई गई।

क्या है मायोपिया

मायोपिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें पास की चीजें साफ दिखाई देती हैं लेकिन दूर की वस्तुएं धुंधली नजर आती हैं। शुरुआत में यह केवल चश्मे तक सीमित लग सकता है, लेकिन समय रहते ध्यान न देने पर यह आंखों की गंभीर बीमारियों में बदल सकता है।

AIOS ने इस अभियान के जरिए संदेश दिया है कि जल्दी पहचान करें, बच्चों की आंखों को जीवनभर सुरक्षित रखें।

विशेषज्ञों के अनुसार हाई मायोपिया आगे चलकर रेटिना डिटैचमेंट, ग्लूकोमा, मोतियाबिंद और स्थायी दृष्टि हानि का खतरा बढ़ा सकता है। कई बार बच्चे खुद यह नहीं समझ पाते कि उनकी नजर कमजोर हो रही है, इसलिए अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में बदलाव पर ध्यान देना जरूरी है।

बच्चों की आंखों को कैसे बचाएं

AIOS द्वारा जारी गाइडलाइन में कुछ अहम सुझाव दिए गए हैं जो कि इस प्रकार हैं -

  • हर साल बच्चों की आंखों की जांच कराना जरूरी
  • मोबाइल और स्क्रीन टाइम सीमित करना
  • पढ़ाई के दौरान पर्याप्त रोशनी रखना
  • किताब या स्क्रीन से सही दूरी बनाए रखना
  • बच्चों को रोज कम से कम दो घंटे आउटडोर खेलों में शामिल करना

इसके अलावा 20-20-20 नियम भी अपनाया जाना चाहिए। यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखना। इससे आंखों की मांसपेशियों की कसरत होती है और नजर जल्दी कमजोर नहीं पड़ती।

विशेषज्ञों ने क्या कहा

Dr. Jivan Singh Titiyal ने कहा कि बचपन में होने वाला मायोपिया अब केवल कम उम्र में चश्मा लगने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आंखों के लंबे समय तक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। समय पर पहचान और नियमित जांच बेहद जरूरी है।

वहीं Dr. Namrata Sharma ने कहा कि केवल इलाज नहीं, बल्कि जीवनशैली में बदलाव ही मायोपिया रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है। बच्चों को ज्यादा आउटडोर गतिविधियों और कम स्क्रीन एक्सपोजर की जरूरत है।

आरपी सेंटर, All India Institute of Medical Sciences के वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ Dr. Rohit Saxena ने कहा कि इस समस्या से निपटने के लिए परिवार, स्कूल और हेल्थकेयर सिस्टम को मिलकर काम करना होगा।

इलाज मौजूद, लेकिन सावधानी सबसे जरूरी

दिशानिर्देशों में एट्रोपिन आई ड्रॉप्स, विशेष मायोपिया कंट्रोल चश्मे, ऑर्थोकेराटोलॉजी और मल्टीफोकल कॉन्टैक्ट लेंस जैसे उपायों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि विशेषज्ञों ने साफ कहा कि ये उपाय केवल बीमारी की रफ्तार धीमी कर सकते हैं, इसे पूरी तरह रोक नहीं सकते। इसलिए बच्चों की जीवनशैली में बदलाव और समय पर जांच सबसे अहम कदम हैं।

bhawana gupta
भावना किशोर author

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मूल की भावना ने देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIMC से 2014 में पत्रकारिता की पढ़ाई की. 12 सालों से मीडिया में काम कर रही हैं. न्यू... और देखें

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