Mental Health Therapy: कई बार हम खुद को ऐसे शब्दों से परिभाषित करते हैं जैसे- मैं चिंतित व्यक्ति हूं या मैं रिश्तों में खराब हूं। ये शब्द हमें अपनी समस्याओं के साथ जोड़ देते हैं और हम खुद को उसी परिभाषा में कैद कर लेते हैं। लेकिन नैरेटिव थेरेपी का उद्देश्य हमें अपनी समस्याओं से अलग करना है। यह हमें यह सिखाती है कि आप खुद आपकी समस्या नहीं हैं बल्कि सही मायनों में समस्या ही समस्या है।
नैरेटिव थेरेपी की शुरुआत माइकल व्हाइट और डेविड एपस्टन ने की थी। इस थेरेपी का मूल सिद्धांत है कि हम अपने आप को बुरा मानने के बजाय अपनी गलतियों को समझें। उदाहरण के लिए, मैं डिप्रैसन हूं के बजाय मैं डिप्रैसन का सामना कर रहा हूं कहना, एक महत्वपूर्ण बदलाव है। यह एक छोटा सा बदलाव हमारी सोच में बड़ा अंतर ला सकता है।
इस थेरेपी में 'एक्सटर्नलाइजिंग' की प्रक्रिया शामिल होती है, जिसमें समस्याओं को एक अलग नाम दिया जाता है। जब हम अपनी समस्याओं को एक अलग पहचान देते हैं, तो हम उन्हें कम शर्मनाक और अधिक समझने योग्य बना लेते हैं। इससे हम अपनी समस्याओं के प्रति जिज्ञासु हो जाते हैं।
इसके बाद, समस्याओं को तोड़ने और फिर से लिखने की प्रक्रिया होती है। हम अपनी जीवन की उन घटनाओं का पुनर्मूल्यांकन करते हैं, जो हमें नकारात्मक कहानी में कैद कर सकती हैं। नैरेटिव थेरेपिस्ट हमें उन विशिष्ट परिणामों या चमकते क्षणों को खोजने में मदद करते हैं, जो हमारे जीवन में सकारात्मकता लाते हैं।
यह थेरेपी विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो ट्रॉमा, अवसाद, चिंता, दुख, या आत्म-सम्मान की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। एक अध्ययन में यह पाया गया कि 2016 में बच्चों ने नैरेटिव थेरेपी के माध्यम से आत्म- जागरूकता, सहानुभूति, और निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि की है।
नैरेटिव थेरेपी का उपयोग केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जोड़ों और परिवारों के लिए भी लाभदायक है। जब सभी सदस्य समस्याओं को अलग से देखते हैं, तो वास्तविक संवाद शुरू होता है। इस प्रकार, नैरेटिव थेरेपी एक प्रभावी उपकरण है, जो हमें अपनी समस्याओं से अलग होकर उन्हें समझने और हल करने में मदद करता है। यह हमें सिखाता है कि हमारी कहानी केवल नकारात्मकता नहीं है, बल्कि उसमें सकारात्मकता भी है।
