हेल्थ

घंटों मोबाइल देखने से बच्चों में बढ़ रहा इन 6 बीमारियों का खतरा, पैरेंट्स हो जाएं अलर्ट

Kids Screen Time Harmful Effects: अगर आपका भी बच्चा मोबाइल में ज्यादा समय बिताता है तो अलर्ट हो जाएं। कुछ स्टडीज के मुताबिक ये आदत बच्चों में गंभीर बीमारियों को पैदा कर सकती है।

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ज्यादा मोबाइल देखने से बच्चों में क्या बीमारियां हो सकती है (Image AI Generated and Newsroom Verified)

Kids Screen Time Harmful Effects: आज के दौर में स्मार्टफोन, टैबलेट और टीवी बच्चों की पढ़ाई और मनोरंजन का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन जब स्क्रीन का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा होने लगे और बच्चा मोबाइल पर घंटों समय बिताने लगे, तो उसकी रोजमर्रा की लाइफस्टाइल प्रभावित होने लगती है। खेलना, आउटडोर एक्टिविटी, पर्याप्त नींद और परिवार के साथ बातचीत का समय कम होने से सेहत पर असर पड़ सकता है।

हाल की रिसर्च में ज्यादा स्क्रीन टाइम को बच्चों में आंखों की परेशानी, नींद में बदलाव, मेंटल हेल्थ से जुड़ी दिक्कतों और वजन बढ़ने जैसी समस्याओं को देखा गया है। कई रिसर्च में पाया गया है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों में कुछ बीमारियों को बढ़ा सकता है। आइए जानते हैं कि वे कौन सी बीमारियां हैं।

मायोपिया यानी दूर की नजर कमजोर होने का खतरा

बच्चों में ज्यादा स्क्रीन टाइम का सबसे बड़ा असर आंखों पर दिखाई दे सकता है। मोबाइल या टैबलेट को लंबे समय तक पास से देखने की वजह से बच्चों का लगातार नियर वर्क बढ़ जाता है। दूसरी तरफ स्क्रीन के कारण आउटडोर एक्टिविटी और प्राकृतिक रोशनी में बिताया जाने वाला समय कम हो सकता है।

जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित एक बड़ी सिस्टेमैटिक रिव्यू और डोज-रिस्पॉन्स मेटा-एनालिसिस में 45 अध्ययनों और 3.35 लाख से ज्यादा लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें डिजिटल स्क्रीन टाइम में हर अतिरिक्त एक घंटे को मायोपिया की ज्यादा संभावना देखी गई। इस कारण एक पैरेंट्स होने के नाते आपको बच्चे के स्क्रीन इस्तेमाल के बीच नियमित ब्रेक दिलाना चाहिए और उसे रोजाना कुछ समय बाहर खेलने के लिए भेजना चाहिए। अगर बच्चा दूर की चीजें देखने में आंखें सिकोड़ता है, बोर्ड देखने में परेशानी बताता है या बार-बार आंखों के पास जाकर चीजें देखने लगे तो आई स्पेशलिस्ट से जांच कराना जरूरी है।

बिगड़ सकता है स्लीपिंग पैटर्न

रात में लंबे समय तक स्मार्टफोन चलाने की आदत बच्चे की नींद को प्रभावित कर सकती है। मोबाइल पर वीडियो देखना, गेम खेलना या सोशल मीडिया इस्तेमाल करना सोने का समय पीछे कर सकता है। इससे बच्चा देर से सोता है और अगले दिन पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता है।

2026 में जामा पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित सिस्टेमैटिक रिव्यू और मेटा-एनालिसिस में बच्चों और युवाओं के रोजाना स्क्रीन इस्तेमाल तथा देर से सोने के समय के बीच एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण संबंध मिला। खासकर सोने के समय के बाद स्क्रीन इस्तेमाल करने पर नींद की क्वालिटी के साथ नकारात्मक संबंध ज्यादा दिखाई दिया।

इसका असर बच्चे के अगले दिन के व्यवहार, पढ़ाई और एक्टिविटी पर भी दिख सकता है। बच्चा देर रात तक मोबाइल मांगता है, सुबह उठने में परेशान होता है या दिनभर सुस्ती रहती है तो पैरेंट्स को उसके नाइट स्क्रीन रूटीन पर तुरंत ध्यान देना चाहिए।

एंग्जायटी, डिप्रेशन और ध्यान से जुड़ी दिक्कतें

स्क्रीन का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों के मेंटल हेल्थ को लेकर भी चिंता बढ़ा रहा है। 2026 में प्रकाशित एक सिस्टेमैटिक रिव्यू में 52 अध्ययनों को शामिल किया गया। इसमें ज्यादा स्क्रीन टाइम का संबंध एडीएचडी के लक्षणों, एंग्जायटी, डिप्रेशन, मूड से जुड़ी समस्याओं, लो सेल्फ-एस्टीम, सामाजिक-भावनात्मक दिक्कतों और नींद की समस्याओं के साथ पाया गया।

एक अलग मेटा-एनालिसिस में कोविड-19 के दौरान बच्चों और किशोरों से जुड़े 23 अध्ययनों के 29,581 प्रतिभागियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें ज्यादा स्क्रीन टाइम और डिप्रेशन तथा एंग्जायटी के लक्षणों के बीच पॉजिटिव रिलेशन देखने को मिला।

ऐसे में हर पैरेंट्स को यह भी देखना चाहिए कि बच्चा फोन पर कितना समय बिता रहा है और किस तरह का कंटेंट देख रहा है। हर समय फोन की मांग करना, फोन हटाने पर बहुत ज्यादा चिड़चिड़ापन, पढ़ाई में ध्यान न लगना या दोस्तों और परिवार से दूरी बनाने जैसी चीजें लगातार दिखाई दें तो बच्चे से बात करना और जरूरत पड़ने पर बाल रोग विशेषज्ञ या मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल से सलाह लेना बेहतर है।

वजन बढ़ने का है खतरा

घंटों एक ही जगह बैठकर मोबाइल देखने से बच्चे का एक्टिव टाइम कम हो जाता है। दौड़ना, खेलना, साइकिल चलाना या दूसरी फिजिकल एक्टिविटी की जगह स्क्रीन ले ले तो लंबे समय में वजन बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है।

2026 की एक सिस्टेमैटिक रिव्यू और मेटा-एनालिसिस में प्रीस्कूल बच्चों पर की गई स्क्रीन टाइम कम करने वाली इंटरवेंशंस का अध्ययन किया गया। इसमें स्क्रीन टाइम कम करने से बीएमआई में कुछ सुधार पाया गया, हालांकि डाइट से जुड़ी आदतों में बदलाव का असर लगातार एक जैसा नहीं था। समस्या तब और बढ़ सकती है जब बच्चा मोबाइल देखते समय लगातार स्नैक्स, चिप्स, बिस्किट या मीठे पेय लेता रहे। इस कारण सिर्फ स्क्रीन टाइम कम करना ही नहीं, बल्कि उसकी जगह एक्टिव खेल और बेहतर खान-पान की आदत बनाना भी जरूरी है।

ईटिंग डिसऑर्डर

स्मार्टफोन और बच्चों के खान-पान से जुड़ी आदतों पर सितंबर 2026 में जामा नेटवर्क ओपन में एक महत्वपूर्ण स्टडी प्रकाशित हुई। इसमें अमेरिका के 8,957 किशोरों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इनमें करीब 69.5 फीसदी के पास 12 साल की उम्र में स्मार्टफोन था।

रिसर्च में 12 साल की उम्र में स्मार्टफोन रखने और बाद के वर्षों में ईटिंग डिसऑर्डर से जुड़े कई लक्षणों के बीच संबंध पाया गया। 12 साल की उम्र में स्मार्टफोन रखने वाले बच्चों में बाद में बिंज ईटिंग, वजन बढ़ने से बचने के लिए गलत तरीके अपनाने और अपनी सेल्फ-वर्थ को वजन से जोड़ने जैसे लक्षणों का जोखिम ज्यादा पाया गया। 12 साल की उम्र में स्मार्टफोन रखने और 14 साल की उम्र में किसी भी ईटिंग डिसऑर्डर लक्षण के बीच समायोजित रिस्क रेशियो 1.49 था। सोशल मीडिया, बॉडी इमेज, दूसरों से तुलना, नींद और खान-पान से जुड़े व्यवहार जैसे कई दूसरे फैक्टर भी इस संबंध के पीछे काम कर सकते हैं।

क्या ज्यादा स्क्रीन टाइम से ऑटिज्म हो सकता है

कम उम्र के बच्चों में स्क्रीन एक्सपोजर और ऑटिज्म जैसे लक्षणों को लेकर भी रिसर्च सामने आई है। 2026 में एम्स दिल्ली की एक स्टडी को लेकर रिपोर्ट में बताया गया कि एक साल की उम्र से पहले ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर वाले बच्चों में तीन साल की उम्र तक ऑटिज्म से जुड़े संकेत दिखने की संभावना ज्यादा पाई गई।

ऑटिज्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल कंडीशन है। स्क्रीन टाइम और ऑटिज्म से जुड़े संकेतों के बीच संबंध मिलने का मतलब सीधा कारण साबित होना नहीं है। बच्चे के विकास को समझने के लिए उसकी भाषा, सामाजिक व्यवहार और उम्र के मुताबिक माइलस्टोन पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।

क्या करें पैरेंट्स

छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन को लेकर साफ सीमाएं तय करना जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक एक साल के बच्चों के लिए सेडेंटरी स्क्रीन टाइम न के बराबर होना चाहिए। वहीं, दो साल की उम्र में इसे एक घंटे से ज्यादा न रखें। 3 से 4 साल के बच्चों के लिए भी सेडेंटरी स्क्रीन टाइम एक घंटे तक सीमित रखें।

घर में खाने की टेबल और बेडरूम को स्क्रीन-फ्री रखना एक अच्छी शुरुआत हो सकती है। बच्चे को मोबाइल देने के बजाय आउटडोर गेम, कहानी की किताब, ड्राइंग, पजल और परिवार के साथ बातचीत जैसी एक्टिविटीज बढ़ाएं। रात में सोने से पहले स्मार्टफोन और दूसरे स्क्रीन इस्तेमाल को कम करना भी जरूरी है। पैरेंट्स को ये नहीं देखना चाहिए कि बच्चा कितने घंटे स्क्रीन देख रहा है, बल्कि यह भी देखें कि स्क्रीन की वजह से उसकी नींद, खेल, पढ़ाई, खान-पान और परिवार के साथ समय कितना प्रभावित हो रहा है।

Mohit Tiwari
मोहित तिवारीauthor

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों प्लेटफॉर्म पर काम किया है। देश-विदेश, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि रखने वाले मोहित ने ज्योतिष का भी व्यापक अध्ययन किया है। मोहित के आलेख लाइफस्टाइल, हेल्थ, न्यूज, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों पर गहरी शोध और प्रामाणिकता पर आधारित होते हैं और इन विषयों पर वह 12,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं।

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