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अमेरिका उठा रहा कर्ज और भारत में हाहाकार, समझें कैसे US Bond Yield बना शेयर बाजार का 'काल'

अमेरिका पर रिकॉर्ड 40 ट्रिलियन डॉलर कर्ज है। आने वाले दिनों में यह कर्ज और बढ़ने की उम्मीद है। इसके साथ ही महंगाई और ब्याज दर भी लंबे समय तक बढ़े रहने की आशंका बढ़ रही है।

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अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड से हिला बाजार
Authored by: यतींद्र लवानिया
Updated Sep 28, 2026, 14:33 IST
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US Treasury Bond Yields Vs Indian Equity Market : अमेरिका का कर्ज बढ़ रहा है और इस कर्ज पर मिलने वाला ब्याज भी ऊंचा होता जा रहा है। सितंबर 2026 में US 10-Year Treasury Yield 5% के पार पहुंचकर करीब 19 साल के ऊंचे स्तर पर चला गया। 25 सितंबर तक यह 5.17% के आसपास था। वहीं, 30-Year Treasury Yield भी कई साल के शीर्ष के करीब है।

पहली नजर में यह सिर्फ US Bond Market की कहानी लगती है। लेकिन, इसका असर भारत के शेयर बाजार तक सीधे पहुंचता है। यही वजह है कि US Treasury Yield दुनिया की फाइनेंशियल मार्केट (Financial Markets) के लिए एक तरह का बेंचमार्क है। जब अमेरिका में अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले सरकारी बॉन्ड ज्यादा यील्ड देने लगते हैं, तो दुनियाभर की पूंजी के लिए दूसरे बाजारों खासकर उभरते बाजारों की तुलना बदल जाती है। यही वजह है कि US Bond Yield को समझे बिना आज के भारतीय शेयर बाजार के दबाव को समझना मुश्किल है।

बढ़ती बॉन्ड यील्ड आखिर क्या बता रही?

Treasury Yield उस रिटर्न को दर्शाती है, जो निवेशक अमेरिकी सरकार को पैसा उधार देने के बदले मांगते हैं। यील्ड बढ़ने का सामान्य अर्थ है कि लंबी अवधि के अमेरिकी सरकारी कर्ज को खरीदने के लिए बाजार अब ज्यादा रिटर्न चाहता है। इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। बड़ी वजह, कर्ज के दम पर आ रही अमेरिकी इकोनॉमी में मजबूती है। इसकी वजह से महंगाई (Inflation) और US Fed रेट हाइक बढ़ने की उम्मीद है। इसके साथ ही अमेरिकी सरकार की भारी उधारी और ट्रेजरी बॉन्ड्स की सप्लाई भी यील्ड बढ़ा रही है।

असली सवाल अमेरिका का कर्ज कौन खरीद रहा है?

यहीं से इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शुरू होता है। कुछ मार्केट एक्सपर्ट का तर्क है कि ट्रेजरी मार्केट में सिर्फ सप्लाई नहीं, बल्कि बायर बेस भी बदल रहा है। लंबे समय तक विदेशी सेंट्रल बैंक अमेरिकी ट्रेजरीज के बड़े और प्राइस इन्सेंसिटिव खरीदार रहे हैं। लेकिन अब कुल अमेरिकी कर्ज तेजी से बढ़ने के मुकाबले फॉरेन ऑफिशियल होल्डिंग की हिस्सेदारी कम हुई है। इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशी निवेशक अमेरिकी कर्ज खरीदना बंद कर चुके हैं। हालांकि, फॉरेन हाल्डिंग अब भी बहुत बड़ी है। लेकिन बायर मिक्स में बदलाव हुआ है और प्राइवेट, प्राइस सेंसिटिव इन्वेस्टर्स की भूमिका बढ़ी है। ऐसे निवेशक यील्ड और रिस्क रिटर्न कैल्कुलेशन को ज्यादा महत्व देते हैं।

भारत के शेयर बाजार पर असर कैसे?

US Yield का भारतीय बाजार तक असर पहुंचने के कई रास्ते हैं। सबसे पहली वजह FII/FPI का पैसा अमेरिका की ओर मुड़ना है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स के सामने दो विकल्प हैं। एक तरफ भारत जैसे उभरते बाजार हैं, जहां करेंसी रिस्क और मार्केट वोलैटिलिटी (Market Volatility) ज्यादा है। वहीं, दूसरी तरफ US ट्रेजरीज का रास्ता है, जहां अब 5% से ज्यादा यील्ड मिल रही है। ऐसी स्थिति में भारत जैसे बाजारों के लिए निवेशकों को ज्यादा रिटर्न की उम्मीद करनी पड़ सकती है। यानी अब भारतीय बाजार का रिस्क प्रीमियम बढ़ रहा है। यही वजह है कि High US Yield अक्सर भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए फॉरेन पोर्टफोलिया निवेशकों (FPI/FII) के लिए हेडविंड का काम करती है। भारत में घरेलू निवेशकों पर सेलिंग को कुछ हद तक सोख रहे हैं, लेकिन फॉरेन आउटफ्लो बढ़ने पर बेंचमार्क इंडेक्स और हाई बीटा स्टॉक्स पर दबाव बनता है।

शेयरों के वैल्यूएशन पर आता है असर

यह सबसे अहम ट्रांसमिशन मैकेनिज्म है। किसी शेयर की सैद्धांतिक वैल्यू भविष्य में मिलने वाली आय और कैश फ्लो को डिस्काउंट करके निकाली जाती है। जब ग्लोबल रिस्क फ्री रेट ऊपर जाता है, तो डिस्काउंट रेट भी ऊपर जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि भविष्य की आय की करंट वैल्यू घटती है। खासकर वे कंपनियां, जिनके शेयर का वैल्यूएशन बहुत ऊंचे P/E मल्टीपल पर टिकी है, उनके वैल्यूएशन पर ट्रेजरी यील्ड बढ़ने का असर सबसे ज्यादा दिखता है। यह भारतीय शेयरों के वैल्यूएशन मैथमेटिक्स को भी बदल देता है।

अमेरिका के लिए एक छिपा खतरा भी बॉन्ड यील्ड

बढ़ती बॉन्ड यील्ड को जहां ज्यादातर इकोनॉमिस्ट और एक्सपर्ट अमेरिकी इकोनॉमी की मजबूती का संकेत मान रहे हैं। वहीं, एक पक्ष ऐसा भी है, जो इसे US इकोनॉमी के लिए एक बड़ा खतरा बता रहा है। इसी तरह की राय रखते हुए टेक फाउंडर और फाइनेंस प्लेटफॉर्म के कंटेंट पार्टनर रिकार्डो भी रखते हैं। उनका कहना है कि बढ़ी हुई बॉन्ड यील्ड बता रही है कि निवेशक अब तक दुनिया की सबसे सुरक्षित संपत्ति को कबाड़ समझ रहे हैं। यही वजह है कि वे इसे खरीदने के लिए अब ज्यादा रिटर्न की मांग कर रहे हैं। इसका दूसरा साफ और सीधा मतलब यही है कि अब दुनिया अमेरिका को कर्ज देना बंद कर रही है।

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