उमर, शरजील पर क्यों लागू नहीं हुआ 'जेल अपवाद, जमानत नियम' का सिद्धांत , जानें SC ने अपने फैसले में क्या कहा
- Reported by: गौरव श्रीवास्तव
- Updated Jan 5, 2026, 02:44 PM IST
उमर और शरजील की जमानत अर्जी खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने कथित आपराधिक साजिश मामले में दोनों की भूमिका एवं संलिप्तता से जुड़े कई अहम एवं पर्याप्त साक्ष्य रिकॉर्ड पर रखे हैं। अदालत ने कहा कि दिल्ली दंगे के सभी आरोपियों को अलग-अलग नजर से देखने की जरूरत है।
उमर खालिद, शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली जमानत।
2020 Delhi riots conspiracy case : साल 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुख्य आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इंकार कर दिया। हालांकि, दंगा मामले में उसने पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी। जमानत अर्जियों पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि कोर्ट ने कहा कि उमर और शरजील दोनों आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत पहली नजर में केस बनता है। साथ ही जस्टिस अरविंद कुमार एवं जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने इस मामले में पांच अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान एवं शादाब अहमद की जमानत अर्जी मंजूर कर ली।
दंगे के सभी आरोपियों को अलग-अलग नजर से देखने की जरूरत-SC
उमर और शरजील की जमानत अर्जी खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने कथित आपराधिक साजिश मामले में दोनों की भूमिका एवं संलिप्तता से जुड़े कई अहम एवं पर्याप्त साक्ष्य रिकॉर्ड पर रखे हैं। अदालत ने कहा कि दिल्ली दंगे के सभी आरोपियों को अलग-अलग नजर से देखने की जरूरत है। अदालतों को इस बात को लेकर सतर्क रहना चाहिए कि आपराधिक जिम्मेदारी (क्रिमिनल लाइबिलिटी) के निर्धारण और जमानत (बेल) से जुड़े विचार के बीच भ्रम न हो। देश की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था का संरक्षण संविधान के महत्वपूर्ण पहलू हैं। प्री-ट्रायल हिरासत (मुकदमे से पहले की गिरफ्तारी) मनमानी तरीके से नहीं हो सकती। हालांकि, इस मामले में उमर और शरजील की स्थिति अन्य आरोपियों से अलग है। सुप्रीम कोर्ट का संकेत उमर खालिद और शरजील इमाम को छोड़कर बाकियों को जमानत मिल सकती है।
... तो हिरासत को प्राथमिकता दी जाएगी
वहीं, कोर्ट ने पांच आरोपियों को जमानत देते हुए कहा कि इन्हें जमानत दिया जाना उनके खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता में कोई कमी (डायल्यूशन) नहीं माना जाएगा। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि देश की सुरक्षा से जुड़े अपराधों के मामलों में कानून के तहत जमानत का अलग और सख्त मानदंड लागू होता है। पीठ ने कहा कि यदि उपलब्ध सामग्री से पुलिस के आरोप प्रथमदृष्टया सही प्रतीत होते हैं, तो हिरासत (कारावास) को प्राथमिकता दी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने UAPA की धारा 43D(5) का जिक्र किया
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उमर खालिद और शरजील इमाम UAPA की धारा 43D(5) की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। इसलिए दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज की जाती हैं। दरअसल, उमर और शरजील की जमानत याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने UAPA की धारा 43D(5) का जिक्र किया। UAPA की धारा 43D(5) जमानत से जुड़ी एक कड़ी शर्त लगाती है, खासकर देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों में।
धारा 43D(5) कहती क्या है?
अगर अदालत के सामने रखी गई सामग्री (चार्जशीट, दस्तावेज, बयान आदि) से यह प्रथम दृष्टया लगता है कि: अभियोजन (दिल्ली पुलिस) के आरोप सही हो सकते हैं, तो ऐसे आरोपी को जमानत नहीं दी जाएगी। यानी सामान्य कानून की तरह 'जमानत नियम, जेल अपवाद' यहां लागू नहीं होता है। मुकदमे के इस स्टेज पर जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट पूरे सबूतों की गहराई से जांच नहीं करती है। अदालत सिर्फ यह देखती है कि आरोप पहली नजर में विश्वसनीय लगते हैं या नहीं। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ योजना बनाने और संगठन करने से जुड़ी भूमिका पाई गई है। ये सारी बातें रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथमदृष्टया सामने आती हैं।
क्या है 'जमानत नियम है और जेल अपवाद' का सिद्धांत?
यदि किसी व्यक्ति को संज्ञेय अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है और उसे पुलिस द्वारा सक्षम न्यायालय के समक्ष पेश किया जाता है, तो उसे जमानत के लिए आवेदन करने का अधिकार है। भारतीय न्याय प्रणाली 'जमानत नियम है और जेल अपवाद' के सिद्धांत को मानती है, लेकिन जमानत देने के लिए समानता ही एकमात्र आधार नहीं हो सकता है। भारतीय कानून के तहत 'जमानत ही नियम है और जेल एक अपवाद है' आपराधिक न्यायशास्त्र की भावना में बसा हुआ है। यह नियम इस तथ्य से आता है कि आपराधिक कानून किसी व्यक्ति को तब तक निर्दोष मानता है, जब तक कि वह दोषी साबित न हो जाए। इसका मतलब है कि आमतौर पर एक विचाराधीन कैदी को अनिश्चित काल के लिए जेल में नहीं रखा जाना चाहिए, जब तक कि समाज के लिए कोई स्पष्ट खतरा न हो, गवाहों/जांच को प्रभावित करने का खतरा न हो या उसके भागने का खतरा न हो।
जमानत देते समय कई पहलुओं पर विचार
यह नियम यह भी सुनिश्चित करता है कि प्रक्रिया को भी सजा न बनाया जाए, जिसमें किसी व्यक्ति को ट्रायल लंबित होने के कारण कई सालों तक जेल में रखा जाता है। जमानत दोषसिद्धि से पहले आरोपी का एक योग्य अधिकार है, जिसमें आरोपी को जमानत की गारंटी नहीं है, बल्कि यह अभियोजन पक्ष पर बोझ डालता है कि वह यह साबित करे कि विचाराधीन कैदी को जमानत पर क्यों नहीं छोड़ा जाना चाहिए। जमानत देते समय अदालत को कई पहलुओं पर विचार करना होता है।