28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले से पश्चिम एशिया में शुरू हुई जंग की आग अभी तक बुझी नहीं है। इस हमले के बाद मध्य पूर्व वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान को चेतावनी दे रहे हैं कि अगर उसने परमाणु कार्यक्रम नहीं रोका,तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई कर सकता है। हालांकि ट्रंप की धमकियों के बीच दिलचस्प बात यह है कि आठ अप्रैल के बाद करीब 41 दिनों में 26 बार ईरान को धमकाने वाले ट्रंप अब तक निर्णायक हमला नहीं कर पाए हैं। अमेरिका कई बार हमले की तैयारी की बात करता है, लेकिन आखिरी समय में पीछे हट जाता है।
पहली नजर में इसकी वजह कूटनीति,खाड़ी देशों का दबाव या तेल बाजार की चिंता लग सकती है,लेकिन इसकी असली तस्वीर कुछ और ही कहती है। दरअसल, पर्दे के पीछे रहकर चीन और रूस ने ईरान के लिए ऐसी ढाल तैयार की है, जिसे भेद पाने में ट्रंप हाल-फिलहाल असमर्थ से दिखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में ईरान ने रूस और चीन की मदद से अपनी सैन्य क्षमता को उस स्तर तक मजबूत कर लिया है,जहां अमेरिका को भी संभावित युद्ध की कीमत भारी दिखाई देने लगी है।
1979 से शुरू हुई दुश्मनी अब सबसे खतरनाक दौर में
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव नया नहीं है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से दोनों देशों के रिश्ते लगातार खराब रहे। उसी वर्ष तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास में बंधक संकट हुआ और तब से दोनों देशों के बीच अविश्वास गहराता गया।
2000 के दशक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने इस तनाव को और बढ़ाया। अमेरिका और उसके सहयोगियों को डर था कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि ईरान लगातार कहता रहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल ऊर्जा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए है।
2015 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौर में ईरान और विश्व शक्तियों के बीच JCPOA यानी न्यूक्लियर डील हुई। लेकिन 2018 में ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका के बाहर होने का एलान किया और ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। यहीं से तनाव नए स्तर पर पहुंच गया।
सैन्य समीकरण बदलने में रूस-चीन की क्या भूमिका
एक समय था जब अमेरिका को लगता था कि वह इराक या लीबिया की तरह ईरान पर भी दबाव बना सकता है। लेकिन ईरान की भौगोलिक स्थिति,उसकी सैन्य तैयारी और रूस-चीन का समर्थन से अब हालात बदल गए हैं। ईरान ने आज पूरे क्षेत्र में अपना रणनीतिक नेटवर्क बना लिया है। उसके प्रभाव वाले समूह इराक, सीरिया, लेबनान, यमन और खाड़ी क्षेत्र तक सक्रिय हैं। यही वजह है कि किसी भी अमेरिकी हमले का जवाब केवल तेहरान तक सीमित नहीं रहेगा।रूस ने कैसे बदला पूरा खेल?
रूस और ईरान के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में तेजी से मजबूत हुए हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग और बढ़ा। ईरान ने रूस को ड्रोन उपलब्ध कराए, जबकि बदले में रूस ने सैन्य और तकनीकी सहयोग बढ़ाया। माना जा रहा है कि रूस ने ईरान को अमेरिकी सैन्य गतिविधियों से जुड़ी अहम और खुफिया जानकारी उपलब्ध कराई है।पश्चिमी रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक रूस ने ईरान को कई अहम क्षेत्रों में मदद दी है। इनमें-
- अमेरिकी और नाटो विमानों की उड़ान रणनीति
- इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग तकनीक
- एयर-टू-एयर ऑपरेशन की जानकारी
- सैटेलाइट और निगरानी डेटा
- रडार से बचने वाले विमानों की पहचान के तरीके
दरअसल, रूस ने सीरिया युद्ध में अमेरिकी एयर ऑपरेशन को करीब से देखा था। माना जाता है कि वही अनुभव अब ईरान के काम आ रहा है। रूस की मदद से ईरान ने अपनी निगरानी और प्रतिक्रिया प्रणाली को काफी तेज कर लिया है।
चीन की भूमिका क्यों अहम मानी जा रही है?
जहां रूस ने खुफिया सहयोग दिया, वहीं चीन ने ईरान के तकनीकी और रक्षा ढांचे को मजबूत करने में मदद की है। 2021 में दोनों देशों के बीच 25 साल की रणनीतिक साझेदारी का समझौता हुआ था, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 400 अरब डॉलर बताई गई थी। इस साझेदारी के तहत चीन ने ईरान के एयर डिफेंस नेटवर्क को आधुनिक बनाने,रडार तकनीक सुधारने,साइबर सुरक्षा बढ़ाने,इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम तैयार करने और मिसाइल ट्रैकिंग क्षमता मजबूत करने जैसे क्षेत्रों में सहयोग किया।
ईरान ने बहुत मजबूत कर लिया है अपना एयर डिफेंस सिस्टम
युद्ध विश्लेषकों का दावा है कि रूस और चीन की मदद से ईरान ने अपनी सैन्य ताकत में इजाफा कर लिया है। ईरान ने अपने पुराने रूसी S-300 सिस्टम के साथ नए घरेलू एयर डिफेंस सिस्टम भी तैयार किए हैं। इनमें 'बावर-373'सबसे चर्चित है,जिसे ईरान रूस के S-400 के बराबर बताता है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इतना जरूर है कि ईरान की हवाई सुरक्षा पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत हो चुकी है।
रूस और चीन दोनों की है मध्य पूर्व पर नजर
रूस और चीन दोनों नहीं चाहते कि अमेरिका मध्य पूर्व में अपनी पकड़ और मजबूत करे। इसलिए दोनों देशों का रणनीतिक हित ईरान के साथ जुड़ा हुआ है। रूस के लिए ईरान पश्चिमी दबाव के खिलाफ एक महत्वपूर्ण साझेदार है, जबकि चीन के लिए ईरान ऊर्जा सुरक्षा और बेल्ट एंड रोड रणनीति का अहम हिस्सा है। यही कारण है कि दोनों देश सीधे युद्ध से बचते हुए भी ईरान को मजबूत करने में रुचि रखते हैं।
अमेरिका को सबसे बड़ा डर किस बात का?
अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी एयर पावर मानी जाती है। लेकिन अगर विरोधी देश उसके विमानों को ट्रैक करने और जवाबी हमला करने में सक्षम हो जाए, तो पूरा सैन्य समीकरण बदल जाता है।'कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस’ (सीआरएस) की रिपोर्ट में बताया गया है कि ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को शुरू किए गए ’ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के दौरान लड़ाकू विमानों और ड्रोन सहित अमेरिका के कम से कम 42 विमान या तो नष्ट हो गए या क्षतिग्रस्त हो गए। वहीं कई पश्चिमी मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि संभावित सैन्य कार्रवाई से पहले अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने व्हाइट हाउस को चेताया कि ईरान की नई क्षमताओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता। आशंका जताई गई कि अगर अमेरिका ने हमला किया, तो उसे अपने लड़ाकू विमानों और सैन्य ठिकानों पर गंभीर जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। ईरान के पास हजारों किलोमीटर रेंज वाली बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। इनमें शाहब, फतेह और खोर्रमशहर जैसी मिसाइलें शामिल हैं। इसके अलावा उसके पास बड़ी संख्या में ड्रोन भी हैं, जिनका इस्तेमाल वह पहले भी कर चुका है।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों सबसे बड़ा हथियार है?
ईरान की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत सिर्फ उसकी सेना नहीं, बल्कि उसकी भौगोलिक स्थिति है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा Strait of Hormuz से गुजरता है। ऐसे में ईरान ने पहले ही इस समुद्री रास्ते को बाधित कर रखा है, वहीं अगर पूर्ण युद्ध होता है तो वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है। ऐसे में तेल की कीमतें अचानक आसमान छू सकती हैं, जिसका असर अमेरिका, यूरोप, भारत और चीन समेत पूरी दुनिया पर पड़ेगा। यही वजह है कि खाड़ी देश भी बड़े युद्ध से बचना चाहते हैं।
क्या ट्रंप के गले की फांस बन गया है ईरान युद्ध ?
अब जबकि इस जंग को ढाई महीने से अधिक समय हो गया है तब यह युद्ध ट्रंप के गले की हड्डी बनता दिख रहा है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगर वे हमला नहीं करते, तो उनकी 'सख्त नेता' वाली छवि प्रभावित होती है। लेकिन अगर हमला करते हैं और अमेरिका को भारी नुकसान होता है, तो उसका राजनीतिक असर भी बड़ा हो सकता है।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच कोई नया समझौता होता है या फिर तनाव दोबारा युद्ध के मुहाने तक पहुंचता है। लेकिन इतना साफ है कि मध्य पूर्व की राजनीति अब पहले जैसी एकध्रुवीय नहीं रही, और ईरान को मिला रूस-चीन का समर्थन अमेरिकी रणनीति के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।
