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'लाइफ सपोर्ट पर' सीजफायर: US-ईरान समझौते की हर कोशिश नाकाम क्यों हो जाती है?

US-Iran Ceasefire Failure: हालांकि अमेरिका और ईरान दोनों बातचीत कर रहे हैं, लेकिन वे साथ ही साथ सैन्य और आर्थिक दबाव के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की भी कोशिश कर रहे हैं।

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'लाइफ सपोर्ट पर' सीजफायर: US-ईरान समझौते की हर कोशिश नाकाम क्यों हो जाती है?

Iran War News: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा युद्ध, किसी समझौते तक पहुंचने की कई नाकाम कोशिशों के बाद, अब लड़ाई के एक और दौर में प्रवेश कर सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य के पास तेल के टैंकर फंसे हुए हैं, अमेरिकी नौसेना के ऑपरेशन कभी रुकते हैं तो कभी तेज हो जाते हैं और दोनों तरफ से नई धमकियां लगातार जारी हैं। जिसे शुरू में युद्धविराम की दिशा में एक रास्ता बताया गया था, वह अब फिर से टूटन, अविश्वास और टकराव की कगार पर पहुंचने के एक नए चक्र में फंस गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कहा कि ईरान के साथ युद्धविराम 'जीवन रक्षक प्रणाली पर (यानी बहुत नाज़ुक हालत में) है; उन्होंने वाशिंगटन के शांति प्रस्ताव पर तेहरान की ताजा प्रतिक्रिया को अस्वीकार कर दिया था। ट्रंप ने ईरान के इस प्रस्ताव को 'पूरी तरह से अस्वीकार्य' बताया।

इस बीच, ईरान का कहना है कि अमेरिका बातचीत के बजाय आत्मसमर्पण की मांग कर रहा है।

सक्रिय सैन्य टकराव के बीच बातचीत का टूट जाना यह दर्शाता है कि इस युद्ध में अमेरिका और ईरान के बीच हर समझौते की कोशिश क्यों नाकाम होती रहती है। दोनों पक्ष एक तरफ बातचीत कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ सैन्य और आर्थिक दबाव के जरिए अपनी स्थिति मज़बूत करने की भी कोशिश कर रहे हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य का गतिरोध

मौजूदा संकट के केंद्र में होर्मुज जलडमरूमध्य है, जो एक संकरा समुद्री रास्ता है और जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का व्यापार होता है। ईरान द्वारा इस जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में बाधा डालने से मौजूदा सैन्य टकराव शुरू हुआ। अमेरिका ने नौसेना की तैनाती और 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' के साथ इसका जवाब दिया। यह एक ऐसा अभियान था जिसका मकसद होर्मुज से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा देना और ईरान की प्रभावी नाकेबंदी को कमजोर करना था।

लेकिन, जहां एक तरफ सैन्य अभियान जारी थे, वहीं दूसरी तरफ वॉशिंगटन ने समानांतर बातचीत करने की भी कोशिश की।

पिछले हफ्ते, ट्रंप ने अचानक होर्मुज सुरक्षा अभियान के कुछ हिस्सों को रोक दिया। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ 'पूर्ण और अंतिम समझौते' की दिशा में काफी प्रगति हुई है। उन्होंने बताया कि यह कदम पाकिस्तान और कूटनीति पर जोर देने वाले अन्य देशों के अनुरोध पर उठाया गया था। लेकिन, यह आशा सिर्फ कुछ ही दिनों तक कायम रही।

ईरान के जवाबी प्रस्ताव में वॉशिंगटन से कई बड़ी रियायतें मांगी गईं। इनमें अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को हटाना, नौसेना की नाकेबंदी खत्म करना, युद्ध से हुए नुकसान के लिए मुआवजा देना, होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान के अधिकार को मान्यता देना और भविष्य में किसी भी सैन्य कार्रवाई के खिलाफ गारंटी देना शामिल था। ट्रंप प्रशासन ने इन शर्तों को लगभग तुरंत ही खारिज कर दिया।

ट्रंप एक समझौता चाहते हैं, लेकिन…

ट्रंप ने बार-बार कहा है कि अमेरिका की मुख्य शर्त जस की तस बनी हुई है। ईरान परमाणु हथियार बनाने का कोई भी रास्ता अपने पास नहीं रख सकता। ईरान के ताजा प्रस्ताव को ठुकराने की वजह बताते हुए ट्रंप ने कहा, 'योजना यह है कि उनके पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते।'

अमेरिकी अधिकारियों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन को कम करे और होर्मुज में कमर्शियल जहाजों को निशाना बनाने वाले हमलों या दखलंदाजी को रोके।

लेकिन अमेरिका का तरीका बातचीत के साथ-साथ सैन्य दबाव का भी इस्तेमाल करता है और ईरान का कहना है कि इसी वजह से सार्थक बातचीत नामुमकिन हो जाती है।

कुछ नौसैनिक ऑपरेशनों को रोकने के बाद भी, ट्रंप लगातार चेतावनी देते रहे कि अगर ईरान समुद्री यातायात में बाधा डालना जारी रखता है, तो सैन्य कार्रवाई फिर से शुरू हो सकती है। रिपोर्टों से पता चलता है कि व्हाइट हाउस पहले से ही नए सिरे से सैन्य ऑपरेशनों के विकल्पों पर विचार कर रहा है अगर कूटनीति पूरी तरह से नाकाम हो जाती है।

अमेरिका दबाव डालकर बातचीत कर रहा- ईरान

ईरान के नजरिए से, मौजूदा बातचीत बुनियादी तौर पर असमान है। ईरानी अधिकारियों का तर्क है कि अमेरिका प्रतिबंधों, नौसैनिक दबाव और सैन्य तैनाती का इस्तेमाल करके तेहरान को ऐसी शर्तें मानने पर मजबूर कर रहा है, जिन्हें वह अन्यथा अस्वीकार कर देता।

वॉशिंगटन परमाणु मामले पर बात और समझौता चाहता है, वहीं ईरान पहले प्रतिबंधों से राहत और सुरक्षा गारंटी चाहता है।

वॉशिंगटन परमाणु मामले पर बात और समझौता चाहता है, वहीं ईरान पहले प्रतिबंधों से राहत और सुरक्षा गारंटी चाहता है।

ईरान का नवीनतम प्रस्ताव न केवल परमाणु मुद्दे पर, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा मांगों पर भी केंद्रित था, जिसमें पूरे क्षेत्र में शत्रुता समाप्त करना और ईरानी तेल निर्यात पर से प्रतिबंध हटाना शामिल है।

ईरानी अधिकारियों ने अपने प्रस्ताव को जिम्मेदाराना बताया है और युद्धकालीन बातचीत के दौरान अमेरिकी मांगों को अवास्तविक करार दिया है। ईरान का यह भी मानना है कि वाशिंगटन रणनीतिक रूप से उन्हें कमजोर करने की कोशिश कर रहा है, जबकि बदले में केवल अस्थायी कूटनीतिक राहत की पेशकश कर रहा है।

यह अविश्वास इसलिए और बढ़ गया है क्योंकि बातचीत किसी संघर्ष के समाप्त होने के बाद नहीं, बल्कि एक सक्रिय संघर्ष के दौरान हो रही है।

सैन्य तनाव कूटनीति पर हावी होता जा रहा

बातचीत के बार-बार विफल होने का एक और कारण यह है कि युद्ध के मैदान में होने वाली घटनाएं बार-बार कूटनीति पर हावी हो जाती हैं।

हाल के दिनों में, ईरान ने जहाजों के आवागमन में हस्तक्षेप जारी रखा है, जबकि अमेरिका ने सैन्य सुरक्षा (एस्कॉर्ट) अभियानों को फिर से शुरू करने पर चर्चा की है। इन सबके बीच, होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक व्यवधान की आशंकाओं के चलते तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, क्योंकि दोनों पक्ष एक-दूसरे पर संघर्ष विराम समझौतों का उल्लंघन करने का आरोप लगाना जारी रखे हुए हैं।

इससे एक ऐसा चक्र बन जाता है जहां बातचीत शुरू होती है, सैन्य दबाव बढ़ता है, बाजारों में घबराहट फैलती है और कोई भी समझौता स्थिर होने से पहले ही बातचीत फिर से टूट जाती है।

यहां तक कि ट्रंप का अपना संदेश भी तेजी से बदला है 'अंतिम समझौते' की दिशा में प्रगति की बात करने से लेकर इस चेतावनी तक कि संघर्ष-विराम (ceasefire) बस किसी तरह टिका हुआ है।

परमाणु मुद्दा अभी भी अनसुलझा

हालांकि होर्मुज संकट ने तत्काल टकराव को जन्म दिया, लेकिन परमाणु विवाद ही मुख्य मुद्दा बना हुआ है। अमेरिका का रुख यह है कि ईरान को अपने संवर्धन कार्यक्रम (enrichment programme) के कुछ हिस्सों को काफी हद तक सीमित करना होगा या उन्हें पूरी तरह से खत्म करना होगा।

खबरों के मुताबिक, ईरान के ताजा प्रस्ताव में पूर्ण वापसी (full rollback) के बजाय केवल सीमित संवर्धन-स्थगन (enrichment freeze) की पेशकश की गई थी। यह अंतर अभी भी बहुत बड़ा है।

अमेरिका के लिए, ईरान को संवर्धन जारी रखने की अनुमति देना भविष्य की परमाणु क्षमता के लिहाज से जोखिम भरा है। ईरान के लिए, संवर्धन को पूरी तरह से छोड़ देना सैन्य दबाव के आगे समर्पण जैसा लगेगा। फिलहाल, दोनों में से कोई भी पक्ष इस खाई को पाटने के लिए पर्याप्त समझौता करने को तैयार नहीं दिखता।

तेल, शिपिंग और वैश्विक दबाव से दांव और बढ़ रहे

बातचीत का टूटना अब वैश्विक अर्थव्यवस्था को और भी ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, क्योंकि यह डर बढ़ रहा है कि होर्मुज में रुकावटें हफ्तों तक जारी रह सकती हैं। शिपिंग यातायात अभी भी बाधित है और हजारों नाविक तथा जहाज अभी भी इस संकट से प्रभावित हैं। इससे दोनों देशों पर एक बड़े युद्ध से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है।

अमेरिका होर्मुज को कमजोर दिखे बिना तेजी से फिर से खोलना चाहता है। ईरान कोई भी रियायत देने से पहले प्रतिबंधों में राहत और अपने क्षेत्रीय प्रभाव की मान्यता चाहता है। दोनों पक्षों का मानना है कि समय और दबाव उनकी बातचीत की स्थिति को बेहतर बना सकते हैं।

बातचीत बार-बार असफल क्यों हो रही?

अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत एक बहुत ही साधारण कारण से टूट रही है। कोई भी पक्ष दूसरे पर इतना भरोसा नहीं करता कि कूटनीति को जबरदस्ती (coercion) से अलग करके देख सके। अमेरिका सैन्य दबाव बनाए रखते हुए बातचीत कर रहा है। वहीं, ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य का इस्तेमाल एक सौदेबाजी के हथियार के तौर पर करते हुए बातचीत कर रहा है। जहां एक ओर वॉशिंगटन पहले परमाणु मामले पर बात और समझौता चाहता है, वहीं ईरान पहले प्रतिबंधों से राहत और सुरक्षा गारंटी चाहता है।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ा author

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदे... और देखें

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