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PAK सेना के अकेले और असली मालिक बन गए हैं असीम मुनीर, जानें कैसे उन्हें असीमित ताकत दे गया नया सैन्य कानून

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने गुरुवार यानी 20 अगस्त 2026 को दो कानून पास किए। पहला, डिफेंस फोर्सेज ऑफ पाकिस्तान एक्ट, 2026, और दूसरा, नेशनल कमांड अथॉरिटी एक्ट, 2010 में संशोधन। ये दोनों बिल पहले प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट मीटिंग में मंजूर हुए थे।

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पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर। तस्वीर-AI
Written by: Alok Rao
Updated Aug 21, 2026, 13:23 IST
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Asim Munir : पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने गुरुवार को एक ऐसा कानून पास कर दिया, जिसके बाद फील्ड मार्शल असीम मुनीर पाकिस्तान की पूरी फौज के अकेले और असली मालिक बन गए हैं। अब वह किसी भी अफसर को नौकरी से निकाल सकते हैं, रिटायर कर सकते हैं, रिटायरमेंट की उम्र बढ़ा या घटा सकते हैं। यानी थल सेना, नौसेना और वायुसेना के हजारों अफसरों का करियर अब सीधे उनकी मुट्ठी में है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि विपक्ष के वॉकआउट के बीच, बिना एजेंडे में शामिल किए, ये बिल चंद घंटों में पास करा दिया गया। तो आखिर ये कानून है क्या, इसका असली मतलब क्या है, और पाकिस्तान की नागरिक-सैन्य संतुलन पर, और भारत के लिए इसके क्या मायने हैं।

क्या पास हुआ, कानून की बुनियादी बातें

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने गुरुवार यानी 20 अगस्त 2026 को दो कानून पास किए। पहला, डिफेंस फोर्सेज ऑफ पाकिस्तान एक्ट, 2026, और दूसरा, नेशनल कमांड अथॉरिटी एक्ट, 2010 में संशोधन। ये दोनों बिल पहले प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट मीटिंग में मंजूर हुए थे, और उसके बाद डिफेंस मिनिस्टर ख्वाजा आसिफ ने इन्हें असेंबली में पेश किया। अब ध्यान देने वाली बात ये है कि ये दोनों बिल असेंबली के एजेंडे में थे ही नहीं। अचानक पेश किए गए, और विपक्ष ने वॉकआउट कर दिया। पाकिस्तान पीपल्स पार्टी, जो शहबाज सरकार की सहयोगी पार्टी है, उसने भी इस तरीके पर आपत्ति जताई। पीपीपी चीफ बिलावल भुट्टो-जरदारी ने कहा कि बिल जिस तरह लाया गया, वो सही नहीं था लेकिन आपत्ति के बावजूद उनकी पार्टी के सांसदों ने वोटिंग में इसके पक्ष में ही वोट डाला। यानी विरोध सिर्फ प्रक्रिया पर था, कानून की मूल भावना पर नहीं।

सीडीएफ की मर्जी पर अब हर अफसर और जवान

अब सवाल ये है कि इस कानून में है क्या। नए कानून के मसौदे के मुताबिक, चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज यानी सीडीएफ को वो सारी शक्तियां दी गई हैं जो 'मल्टी-डोमेन इंटीग्रेशन, ऑपरेशनल कोहीजन और तीनों सेनाओं से जुड़े रणनीतिक मामलों' के लिए जरूरी हैं। सीधी भाषा में समझें, तो सीडीएफ अब किसी भी अफसर को जो आर्मी एक्ट के दायरे में आता है, रिटायर कर सकता है, उसका इस्तीफा मंजूर या रद्द कर सकता है, नौकरी से बर्खास्त कर सकता है, या फिर उसकी रिटायरमेंट की उम्र में छूट दे सकता है। हां, इसमें एक अपवाद है, आर्टिकल 243 के तहत नियुक्त लोग, यानी खुद आर्मी चीफ-कम-सीडीएफ, नेवी चीफ और एयर चीफ, इस दायरे से बाहर हैं, क्योंकि उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करते हैं। बाकी पूरी फौज यानी लगभग हर अफसर और जवान अब सीडीएफ की मर्जी पर निर्भर हैं।

क्या है 27वां संविधान संशोधन

अब इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलना जरूरी है। ये पूरा ढांचा पिछले साल नवंबर 2025 में हुए 27वें संविधान संशोधन की देन है। उस संशोधन ने पाकिस्तान के आर्टिकल 243 को पूरी तरह बदल दिया, और चेयरमैन जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का पुराना पद खत्म करके दो नए पद बनाए -चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज, यानी सीडीएफ, और कमांडर नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड। असीम मुनीर, जो पहले से आर्मी चीफ थे, उन्हें ही पाकिस्तान का पहला सीडीएफ बनाया गया यानी एक ही शख्स के पास आर्मी चीफ और सीडीएफ, दोनों पद इकट्ठे हैं। अब नया कानून इसी ढांचे को कानूनी शक्ल देता है। इसके तहत डिफेंस फोर्सेज हेडक्वार्टर, यानी डीएफएचक्यू बनाया गया है, जो रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य मामलों पर अब प्रधानमंत्री का 'प्रिंसिपल मिलिट्री एडवाइजर' होगा।

Asim munir

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ये भूमिका पहले चेयरमैन जॉइंट चीफ्स के पास होती थी, जो एक बड़े हद तक सांकेतिक पद माना जाता था। अब ये सीधे उस शख्स के पास है जो पहले से आर्मी का कमांडर भी है। यानी थल सेना की कमान भी उसी के पास, बाकी दोनों सेनाओं पर ऑपरेशनल कमांड भी उसी के पास, और प्रधानमंत्री को सलाह देने का काम भी वही करेगा। दिलचस्प बात ये भी है कि ये कानून पूर्वव्यापी, यानी रेट्रोस्पेक्टिव तरीके से लागू हो रहे हैं। डिफेंस फोर्सेज एक्ट 13 नवंबर 2025 से लागू माना जाएगा, और एनसीए में संशोधन 27 नवंबर 2025 से। यानी संसद ने अभी मंजूरी दी है लेकिन कानूनन ये पहले से ही प्रभाव में थे।

न्यूक्लियर कमांड और स्ट्रैटेजिक फोर्सेज का एंगल

अब आते हैं सबसे संवेदनशील हिस्से न्यूक्लियर कमांड स्ट्रक्चर पर। 27वें संशोधन ने एक और नया पद बनाया गया है, वह है कमांडर नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड, यानी सीएनएससी। ये चार-सितारा जनरल का पद है, और इसका काम है पाकिस्तान की स्ट्रैटेजिक फोर्सेज यानी परमाणु हथियारों से जुड़ी ऑपरेशनल इंटीग्रेशन। पिछले महीने, 24 जुलाई को, लेफ्टिनेंट जनरल आमिर रजा को प्रमोट करके फोर-स्टार जनरल बनाया गया, और उन्हें पहला सीएनएससी नियुक्त किया गया। अब इस नियुक्ति की शर्तें भी गौर करने लायक हैं। कमांडर की नियुक्ति प्रधानमंत्री करते हैं, लेकिन सीडीएफ यानी असीम मुनीर की सिफारिश पर। कार्यकाल तीन साल का है, और एक बार और तीन साल के लिए बढ़ाया जा सकता है। सबसे अहम बात-इस नियुक्ति, दोबारा नियुक्ति या एक्सटेंशन को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। यानी न्यायिक समीक्षा का रास्ता पूरी तरह बंद है।

एक ही व्यक्ति के हाथ में इतनी सारी शक्तियां

चूंकि सीडीएफ ही देश की न्यूक्लियर कमांड संरचना से जुड़े मामलों पर वरिष्ठ सैन्य सलाहकार की भूमिका में भी है, तो व्यावहारिक तौर पर देखें तो असीम मुनीर की पकड़ अब सिर्फ पारंपरिक फौज पर ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से जुड़े फैसलों की चेन पर भी है। ये वो जगह है जहां जानकार और विश्लेषक सबसे ज्यादा चिंता जताते हैं क्योंकि एक ही व्यक्ति के हाथ में इतनी सारी शक्तियों का केंद्रीयकरण, वह भी बिना अदालती निगरानी के, दुनिया के किसी भी परमाणु हथियार संपन्न देश के लिए असामान्य बात मानी जाती है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया, सिविल-मिलिट्री बैलेंस पर सवाल

अब बात करते हैं इसके सियासी असर की। पाकिस्तान का इतिहास वैसे भी फौजी दखल से भरा पड़ा है। देश ने अपने ज्यादातर वजूद में या तो सीधा सैन्य शासन देखा है, या फिर सिविलियन सरकारों पर फौज का परोक्ष नियंत्रण। इस नए कानून के बाद, बहुत से पाकिस्तानी विश्लेषक और विपक्षी नेता ये सवाल उठा रहे हैं कि क्या ये कानून उस 'हाइब्रिड सिस्टम' को और मजबूत कर रहा है, जहां लोकतांत्रिक ढांचा तो बना रहता है, लेकिन असली सत्ता फौज के पास होती है। बिलावल भुट्टो-जरदारी की आपत्ति भी इसी ओर इशारा करती है कि बिल को बिना एजेंडे में डाले, अचानक, बिना पर्याप्त बहस के पास कराया गया। लेकिन ये भी ध्यान देने वाली बात है कि पीपीपी ने आपत्ति के बावजूद वोट सरकार के पक्ष में ही दिया। यानी पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां भी फौज से सीधा टकराव मोल लेने से बचती दिख रही हैं।

भारत के लिए इसके क्या मायने हैं

अब बात करते हैं कि क्या भारत को इससे चिंतित होना चाहिए? पहली बात, भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल ये है कि सत्ता और फैसले लेने की क्षमता अब कितनी केंद्रीकृत हो गई है। जब पूरी फौज, नौसेना-वायुसेना पर ऑपरेशनल कमांड, और परमाणु मामलों पर सलाहकार भूमिका ये सब एक ही व्यक्ति के हाथ में आ जाए, तो भारत की रणनीतिक बिरादरी के लिए इसका मतलब है कि सीमा पार फैसले लेने की प्रक्रिया अब पहले से कहीं ज्यादा एक व्यक्ति-केंद्रित हो गई है। पहले भी पाकिस्तानी फौज का दबदबा किसी से छिपा नहीं था, लेकिन अब वो दबदबा कानूनी और संस्थागत तौर पर औपचारिक रूप ले चुका है।

pak army

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दूसरी बात, ये कानून ऐसे वक्त पास हुआ है जब पाकिस्तान पहले ही सऊदी अरब और तुर्की के साथ रक्षा समझौते कर चुका है, जिसमें एक पर हमले को सभी पर हमला माना जाएगा। यानी पाकिस्तान अपने बाहरी सुरक्षा गठबंधनों को भी मजबूत कर रहा है, साथ ही अंदरूनी कमान ढांचे को भी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द समेट रहा है। भारत के नजरिए से, इन दोनों चीजों को साथ में देखना ज़रूरी है क्योंकि अगर भविष्य में सीमा पर कोई तनाव या संकट खड़ा होता है, तो फैसला लेने वाला शख्स कौन है, वो कैसे सोचता है, और उसका फैसले लेने का ट्रैक रिकॉर्ड क्या है, ये सब पहले से ज्यादा मायने रखने लगता है, क्योंकि अब चेक्स एंड बैलेंसेज काफी कम हो गए हैं।

पाक के घटनाक्रम पर भारत का नजर रखना जरूरी

तीसरी बात, ये भी समझनी जरूरी है कि ये कोई नई घटना नहीं है। पाकिस्तान में फौज हमेशा से मजबूत रही है। जो बदला है वो ये कि पहले ये ताकत अनौपचारिक और परदे के पीछे की राजनीति से आती थी, अब वो सीधे संविधान और कानून में दर्ज हो गई है। भारतीय रणनीतिक हलकों में इसे अक्सर इस तरह देखा जाता है कि जब फौज की ताकत अनौपचारिक की बजाय संस्थागत हो जाती है, तो नागरिक सरकार का उस पर असर और भी कम हो जाता है और लंबी अवधि में इससे पाकिस्तान की नीतियों में अप्रत्याशितता बढ़ सकती है। कुल मिलाकर, पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने जो कानून पास किया है, वो सिर्फ एक प्रशासनिक अपडेट नहीं है। ये उस पूरे सत्ता ढांचे की कानूनी मुहर है जो 27वें संविधान संशोधन के बाद बना था। असीम मुनीर अब आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान की तीनों सेनाओं, और परमाणु कमान से जुड़े सलाहकारी ढांचे पर पहले से कहीं ज्यादा पकड़ रखते हैं। पाकिस्तान के अंदर विपक्ष की आवाजें उठी हैं, लेकिन वोटिंग पैटर्न बताता है कि फौज को चुनौती देने का सियासी साहस अभी भी सीमित है। भारत के लिए ये पूरा घटनाक्रम एक ऐसा संकेत है जिस पर नजर रखना जरूरी है क्योंकि पड़ोस में सत्ता जितनी ज्यादा एक हाथ में सिमटती है, रणनीतिक अनिश्चितता उतनी ही बढ़ती है।

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