नीतीश कुमार, बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री, पूर्व रेल मंत्री, जय प्रकाश नारायण के शिष्य, कई बार के सांसद, कई बार के विधायक...ऐसी कई उपलब्धियां हैं जो उनके नाम दर्ज है, लेकिन नीतीश कुमार की राजनीति की शुरुआत कुछ अच्छी नहीं रही थी। जेपी आंदोलन के बाद जब नीतीश कुमार राजनीति में उतरे तो उन्हें झटके पर झटके लगे थे, जबकि उनके साथी लालू प्रसाद यादव लगातार आगे बढ़ रहे थे। लालू यादव जहां सांसद और विधायक बन चुके थे, वहीं नीतीश कुमार अपना पहला और दूसरा दोनों चुनाव हार गए थे, लेकिन फिर नीतीश कुमार ने ऐसे झंडे गाड़े कि लालू उनसे काफी पीछे छूट गए और नीतीश का सितारा आजतक बुलंद रहा। हार के बाद नीतीश ने एक ऐसी कसम खाई थी, जिसके बाद वो लगातार राजनीति में कामयाबी की सीढ़ी चढ़ते गए।
नीतीश कुमार की पहली चुनावी हार
वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर अपनी किताब बंधु बिहारी में इस 'कसम' का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि तब नीतीश कुमार जेपी आंदोलन से निकले थे और चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमाने उतरे थे। नीतीश कुमार अपनी जन्मभूमि नालंदा जिले के हरनौत सीट से चुनावी मैदान में थे, इसी विधानसभा सीट के अंदर नीतीश कुमार का गांव कलियांबीघा भी आता है, लेकिन वो हार गए। नीतीश कुमार अपनी पहली परीक्षा में फेल हो गए। लालू यादव समेत उनके अधिकतर साथी चुनाव जीते और आगे बढ़ गए।

नीतीश कुमार और लालू यादव (फोटो- @TejYadav14)
इंडियन कॉफी हाउस बना अड्डा
हार के बाद नीतीश कुमार का अड्डा इंडियन कॉफी हाउस बन गया। वहां सत्ता, विपक्ष, अधिकारी सबका जमावड़ा लगा रहता था, कोई न कोई वहां मिल ही जाता था। इस घटना को बंधु बिहारी में कुछ इस तरह से बयां किया गया है, "सन् 1977 का चुनाव एक लहर पर सवार था, कांग्रेस को राष्ट्रीय सिंहासन से उतार दिया गया था। एक गैर कांग्रेस टिकट हासिल करना आधी लड़ाई जीतने के बराबर था, लेकिन नीतीश जीत का जश्न मनाने वालों के बीच एक दुखी आत्मा थे। उनका मन खट्टा हो गया होगा। उनके पास न तो विधानसभा में कोई सीट थी, न पार्टी में कोई पद। कोई ऐसा रिकॉर्ड नहीं है, जिससे यह पता चले कि नीतीश ने कोई राजनीतिक संरक्षण खोज लिया था। उनके पास करने के लिए कुछ नहीं था। वह सत्ता की परिधि के आसपास घूमते रहते थे, इंडिया कॉफी हाउस उस दायरे में सबसे अच्छी जगह थी।"
कर्पूरी ठाकुर से नाराजगी
नीतीश कुमार भले ही चुनाव हार गए थे, लेकिन उनकी पार्टी सत्ता में थी, कर्पूरी ठाकुर सीएम थे, लेकिन कर्पूरी ठाकुर का शासन लगातार सवालों के घेरे में था। आए दिन किसी ने किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। उनकी आलोचना होने लगी थी और नीतीश भी उनके आलोचकों में से एक हो चुके थे। एक दिन नीतीश कुमार कॉफी हाउस के अंदर सुरेंद्र किशोर के साथ बैठे थे और वहां कर्पूरी ठाकुर और उनकी सरकार पर हो रही बातों को सुन रहे थे। नीतीश स्वयं कर्पूरी सरकार से बहुत जल्द निराश हो गए थे। नीतीश के विचार में कर्पूरी सरकार ने जेपी आंदोलन के वादे के साथ विश्वासघात किया था। वह सभाओं में जाकर जोरदार शब्दों में इस बात पर चर्चा करने लगे कि कि यह वो छुटकारा नहीं है, जिसके लिए उन्होंने संघर्ष किया था।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और नीतीश कुमार (फोटो- Indian Govt)
नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा
| साल | राजनीतिक दल | भूमिका |
| 1977 | जनता दल | हरनौत से चुनावी हार |
| 1980 | जनता दल | हरनौत से दूसरी बार चुनाव हारे |
| 1985 | जनता दल | विधायक (बिहार विधानसभा), हरनौत से जीते |
| 1989–1994 | जनता दल | सांसद, सक्रिय राजनीति में पहचान बनाई |
| 1996 | समता पार्टी (एनडीए का हिस्सा) | लोकसभा सांसद, केंद्रीय मंत्री |
| 2000 | समता पार्टी | पहली बार सीएम बने, 7 दिनों के लिए सत्ता मिली |
| 2005 | जनता दल (यूनाइटेड) | दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, NDA को बहुमत मिली |
| 2010 | जद(यू) | मुख्यमंत्री,बहुमत के साथ सत्ता में वापसी |
| 2015 | (जद(यू) | मुख्यमंत्री,महागठबंधन की जीत, फिर मुख्यमंत्री बने |
| 2017 | जद(यू) | मुख्यमंत्री,राजद से नाता तोड़कर भाजपा के साथ |
| 2022 | जद (यू) | मुख्यमंत्री, भाजपा से अलग होकर फिर महागठबंधन में शामिल हुए |
| वर्तमान | जद (यू) | मुख्यमंत्री, भाजपा के साथ |
नीतीश कुमार की वो 'कसम'
इसी इंडियन कॉफी हाउस में नीतीश कुमार ने वो कसम खाई थी, जिसे पूरा करने में उन्हें लगभग 30 साल तक सियासी लड़ाई लड़नी पड़ी। दरसअल कर्पूरी सरकार के दौरान जब उनके पक्ष और विपक्ष में लोग चर्चांएं करने लगे तो इसकी धमक इंडियन कॉफी हाउस तक भी पहुंची, जहां नीतीश कुमार का परमानेंट अड्डा था। यहीं पर एक दिन नीतीश से कुछ दूरी पर बैठे लोग कर्पूरी सरकार के बारे में बातें कर रहे थे। तभी नीतीश कुमार भड़क उठे। संकर्षण ठाकुर ने इस घटना को नीतीश कुमार के साथ बैठे सुरेंद्र किशोर के हवाले से लिखा है, " मुझे ठीक से याद नहीं, किस बात ने उन्हें इस कदर उकसाया, लेकिन इसका कुछ नाता दूसरी मेज पर हो रही बकवास से अवश्य था, भ्रष्टाचार से था या जातिवाद से था, बता नहीं सकता कि क्या था? मैंने नीतीश को अचानक उत्तेजित होते हुए देखा। गुस्सा उनके चेहरे तक आ गया था। उन्होंने मेज पर मुक्का मारा और किसी व्यक्ति विशेष को संबोधित न करते हुए ऐलान किया, "सत्ता प्राप्त करूंगा, किसी भी तरह से, लेकिन सत्ता लेके अच्छा काम करूंगा।"

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फोटो- @NitishKumarJDU)
और सत्ता की शिखर पर पहुंचे नीतीश कुमार
नीतीश कुमार ने इस 'कसम' के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। राजनीतिक करियर की शुरुआत नीतीश कुमार ने जनता दल से की और 1985 में पहली बार विधायक चुने गए। 1989 से 1994 तक वे इसी दल से जुड़े रहे। इसके बाद, 1994 में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन किया। समता पार्टी के टिकट पर 1996 में वे लोकसभा पहुंचे और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्रीय मंत्री बने। इसी अवधि में उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा बनी। 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को बहुमत मिला और भाजपा के साथ गठबंधन कर नीतीश कुमार ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभाली। इससे पहले 2000 में नीतीश कुमार सात दिनों के लिए सीएम बने थे।
