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मुख्यमंत्री : बिहार के 23वें मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी, सीएम पद छोड़ने के लिए कहने पर हो गए बागी, बनाई अपनी पार्टी

बिहार चुनाव के दौरान राज्य के सभी मुख्यमंत्रियों पर आप लगातार हमारी मुख्यमंत्री सीरीज में जान रहे हैं। आज बारी बिहार के 23वें मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की है। जो कभी बचपन में बंधुआ मजदूर रह चुके हैं और विधानसभा चुनाव के लिए टिकट न मिलने पर रोने वाले यह मांझी जीतने के बाद टिकट दिलाने वाले के ही विरोधी गुट में शामिल हो गए।

23 CM of Bihar Jitanram Manjhi.

बिहार के 23वें मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी

बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर हम इस चुनावी मौसम में आपको बिहार के सभी मुख्यमंत्रियों के बारे में जानकारी दे रहे हैं। 'मुख्यमंत्री' नाम की इस सीरीज में सभी मुख्यमंत्रियों के बारे में बात हो चुकी है। आज बात बिहार के 23वें मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की। जीतन राम मांझी बिहार के एक ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं, जिन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए कहा कि चूहा मारकर खाना खराब बात नहीं है। मैं भी चूहा खाता था। आज भी मिल जाए तो परहेज नहीं है। यही नहीं, इससे पहले साल 2008 में तो उन्होंने लोगों को चूहे खाने की सलाह ही दे डाली थी। तब उन्होंने तर्क दिया था कि चूहे फसल बर्बाद कर देते हैं और उन्हें खाने पर चिकन के बराबर ही प्रोटीन मिलता है। चलिए जानते हैं जीतन राम मांझी का सफरनामा।

जीतन नाम भी खास वजह से मिला

जीतन राम मांझी का जन्म गया जिले के हथियावां गांव में हुआ था। यहां पर नाले के किनारे मुसहर समाज की कुल 4-5 झोपड़ियां ही थीं, जिनमें से एक में जीतन राम के माता-पिता खेतिहर मजदूर रामजीत मांझी और सुकरा देवी रहते थे। जीतन राम का जन्म 6 अक्टूबर 1944 के दिन हुआ था। उस दिन जीतिया पर्व था और उनकी मां सुकरी देवी ने निर्जला व्रत रखा हुआ था। जीतिया के दिन बेटे का जन्म हुआ और वह शादी के कई वर्षों और बड़ी मन्नतों के बाद, इसलिए बच्चे का नाम जीतन राम रख दिया गया।

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छिपकर पढ़ाई की और फिर स्कूल भी मिला

अभी जीतन राम सालभर के ही थे कि गांव में बहुत ज्यादा बारिश होने के कारण उनकी झोपड़ी बह गई। जान बचाने के लिए पूरे परिवार ने बरगद के एक पेड़ पर चढ़कर रात बितायी। इसके बाद उनका परिवार पास के ही महकार गांव में चला गया। यहां पर जमींदार कामेश्वर सिंह ने उन्हें रहने के लिए अपनी बंजर जमीन दे दी। लेकिन अब परिवार कामेश्वर सिंह के यहां बंधुआ मजदूर बन गया। जब वह 5-6 साल के हुए तो जमींदार कामेश्वर के जानवरों को चराने लगे। दिनभर जानवर चराते, खेल-कूद करते और शाम को जमींदार के घर चले जाते और वहां जीतन राम को कुछ खाना मिला जाता था। इस बीच जमींदार के बच्चों को बढ़ाने के लिए एक मास्टरजी आते थे। जीतन राम छिपकर मास्टरजी को सुनते रहते थे। एक दिन मास्टरजी के पूछने पर जब जमींदार के बच्चों से पहले ही जीतन ने तुरंत जवाब दे दिया। ताड़ी पीने के शौकीन मास्टरजी एक दिन ताड़ी की दुकान पर जीतन के पिता रामजीत से मिले। तब उन्होंने रामजीत को बताया कि उनका बेटा मालिक के बच्चों से भी होशियार है। पढ़-लिखा जाएगा तो कुछ बन जाएगा। रामजीत ने अगले ही दिन जमींदार से जीतन को पढ़ाने की मंजूरी मांगी, जमींदार ने तंज भी कसा, रामजीत अड़े रहे और गांव छोड़कर जाने की बात कही। इसके बाद जीतन जानवर चराने नहीं गए तो जमींदार उनके घर आया और बोले, मास्टर मेरे बच्चों को पढ़ाता है, वो जीतन को भी पढ़ा देगा। इसके बाद जीतन दिनभर जानवर चराकर शाम को टूटी स्लेट और पेंसिल से पढ़ते थे। 7वीं तक ऐसे ही किसी तरह पढ़ने के बाद जीतन ने मिडिल स्कूल केवड़ी और नइली हाई स्कूल में आगे की पढ़ाई की।

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हॉस्टल में जीतन के वो कठिन दिन

महज 11 साल की उम्र में ही जीतन राम की शांदी बिंदी देवी से कर दी गई। इधर उन्होंने 10वीं पास की और 25 रुपये स्कॉलरशिप के साथ कॉलेज में एडमिशन मिल गया और हॉस्टल की सुविधा भी मिल गई। हालांकि, अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उन्हें हॉस्टल में कभी भी सामान्य कमरा नहीं मिला। या तो उन्हें बीमारों का कमरा दिया जाता या फिर नशेड़ी लड़कों के साथ रहने को कहा जाता था। कॉलेज के दिनों में ही वह नेताओं की तरह भाषण देने लगे थे। 1966 में उन्होंने इतिहास में बैचलर डिग्री भी ले ली। मांझीनामा किताब में जीतन राम बताते हैं कि बचपन में वह कलेक्टर, जमींदार और जज बनने के बारे में सोचते थे। हालांकि, उनका कहना है कि उन्होंने महज 7 साल की उम्र में राजनीति में आने का फैसला कर लिया था। ताकि देश और राज्य की तरक्की के लिए काम कर सकें।

Jitan ram Manjhi.
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी

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डाक विभाग में लगी सरकारी नौकरी

जीतन राम पोस्ट ग्रेजुएशन करके लेक्चरर बनना चाहते थे, लेकिन परिवार की तंगी के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी। साल 1967 में उन्हें डाक विभाग में उनकी कलर्क की नौकरी लग गई और 2500 रुपये सैलरी मिलने लगी। जीतन राम चाहते थे कि छोटे भाई गोविंद की नौकरी लग जाए और वह राजनीति में ध्यान दें, इसलिए उन्होंने भाई को अपने साथ रखकर पढ़ाया। इधर वह ट्रेड यूनियन से जुड़े और जनरल सेक्रेटर व प्रेसिडेंट भी बन गए। इसी दौरान 1972 में उनकी पत्नी बिंदी देवी का निधन हो गया। तब उनके बेटे संतोष की उम्र मजह 3 महीने थी। दो बेटियां भी छोटी ही थीं। इसके बाद उन्होंने विधवा शांति देवी से दूसरी शादी की। शांति देवी का एक बबेटा था और जीतन राम से उन्हें तीन बेटियां और हुईं। छोटा भाई गोविंद 1976 में सब-इंस्पेक्टर बन गया। अब जीतन राम ने राजनीति में आने की ठान ली। उनका गया ऑफिस में आना-जाना शुरू हो चुका था। 1980 में बिहार विधानसभा चुनाव होने थे, जीतन राम को फतेहपुर सीट से टिकट मिलने की उम्मीद थी। इसी उम्मीद में उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और दिल्ली चले आए। लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिली और जीतन रोने लगे। उसी शाम 5 बजे वह पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र से मिलने उनके घर चले गए। वह घर पर नहीं थे तो जीतन ने वहीं इंतजार करने का फैसला किया। जगन्नाथ सुबह 4 बजे घर लौटे और सीधे अंदर चले गए। आधे घंटे पर बाहर निकलकर जीतन राम से बोले, 'क्या जीतन, क्या हाल है? तुम्हारा टिकट कट गया।'

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टिकट मिली और जीत गए जीतन राम

जीतन ने जगन्नाथ मिश्र से कहा, इसीलिए आपके पास आए हैं। हम अपनी नौकरी छोड़कर आए हैं और हमारा टिकट गट गया। जगन्नाथ के एक प्रश्न पर उन्होंने कहा, लगता है मैंने अपने बच्चों के साथ अन्याय कर दिया। एक बार तालकटोरा स्टेडियम में कांग्रेस कार्यक्रम में आपने मुझे मेरे नाम से पहचाना था। तब मुझे लगा आप हमारे साथ धोखा नहीं होने देंगे। जगन्नाथ ने देखते हैं कहकर जीतन राम को आश्वासन दिया और पीएम इंदिरा गांधी से मिलकर जीतन राम की सिफारिश कर दी। उसी शाम जीतन को टिकट मिल गया। जीतन राम के मास सिर्फ 250 रुपये थे और उन्हें दिल्ली से गया जाने पर जनरल बोगी का 195 रुपये किराया भी चुकाना था। उनके पास सिर्फ 55 रुपये ही बचते और नॉमिनेशन की फीस 125 रुपये थी। हसनपुर के केदार सिंह ने उन्हें 500 रुपये दे दिए। पार्टी से प्रचार के लिए 40 हजार रुपये मिले। जीतराम ने एक गाड़ी किराए पर ली और 5 जगह दफ्तर भी खोले। सिर्फ 22 हजार रुपये खर्च करके उन्होंने पूरा चुनाव लड़ा और चुनाव जीतकर विधायक बन गए।

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जगन्नाथ के विरोधी गुट में हुए शामिल

जगन्नाथ मिश्र ने ही जीतन राम की टिकट के लिए इंदिरा गांधी से पैरवी की थी। लेकिन जीतन उनके ही विरोधी गुट में शामिल हो गए। एक बार जब वह जगन्नाथ से मिलने पहुंचे तो उन्होंने पूछ लिया, 'क्यों जीतन, तुम हमारा विरोध क्यों करते हो?' इस पर जीतन ने जवाब दिया, 'किसने कहा मैं आपका विरोध करता हूं? आपने मुझे टिकट दिया।' जगन्नाथ बोले - लेकिन तुम उधर क्यों रहते हो? हमारे साथ क्यों नहीं रहते हो? तब जीतन ने इजाजत लेकर जगन्नाथ को जवाब दिया, 'मिसरी सदा मुसहर जाति से हैं र 1957 से आपके साथ हैं। आप उन्हीं को मंत्री बनाएंगे। कांग्रेस में दो-ढाई साल में सीएम बदल जाते हैं। आप बदलेंगे तो इधर की सरकार होगी। फिर तो मैं मंत्री बन जाऊंगा।' यह जवाब सुनकर जगन्नाथ मिश्र भी खूब हंसे। फिर 1983 में हुआ भी ऐसा ही। जगन्नाथ की जगह चंद्रशेखर सिंह मुख्यमंत्री बने तो जीतन राम मांझी को उपमंत्री बनाया गया। 1985 में वह दोबारा विधायक बने। कांग्रेस के मुख्यमंत्री बदलते रहे, लेकिन जीतन राम मंत्री बने रहे।

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कांग्रेस से RJD और फिर JDU में शामिल हुए जीतन

जीतन राम मांझी को 1990 और 1995 के बिहार विधानसभा के साथ ही 1991 के लोकसभा चुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा। 1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया। पूर्व कांग्रेस सांसद रंजीत सिंह के कहने पर वह लालू यादव से मिलने गए और जनता दल के सदस्य बन गए। जनता दल ने उन्हें जल्द ही गया में पार्टी का जिलाध्यक्ष बना दिया। इसी साल बाराचट्टी विधानसभा उपचुनाव में जनता दल ने उन्हें टिकट दिया और वह जीतकर विधायक बन गए। 1997 में लालू यादव ने जब RJD बनाई तो जीतन उनके साथ हो गए और राबड़ी देवी की सरकार में राज्यमंत्री बने। फिर 2005 में जीतन राम मांझी ने फतेहपुर सीट से टिकट का दावा किया। लेकिन RJD ने उन्हें टिकट नहीं दिया। जीतन राम ने RJD छोड़कर JDU का दामन थाम लिया और नीतीश कुमार के करीबी बन गए।

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मंत्री बने और फिर मुख्यमंत्री भी बनाए गए

साल 2005 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो जीतन राम मांझी मंत्री बन गए। लेकिन फर्जी Bed डिग्री रैकेट में नाम आने के कारण कुछ ही घंटों बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। अप्रैल 2008 में जीतन राम आरोपों से बरी होने के बाद फिर से नीतीश कैबिनेट में मंत्री बने। 2010 में भी जीतन ने JDU की टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता। 2013 में JDU ने भाजपा से किनारा कर लिया और महागठबंधन बनाया। लेकिन लोकसभा चुनाव 2014 में पार्टी को बिहार की 40 में से सिर्फ 2 सीटें ही मिलीं। सीएम नीतीश कुमार ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए 17 मई 2014 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। अब नए मुख्यमंत्री की तलाश होने लगी और यह खोज जीतन राम मांझी पर जाकर ठहरी। नीतीश कुमार पार्टी के महादलित जनाधार को खुश करने के लिए जो चेहरा ढूंढ़ रहे थे वह चेहरा जीतन राम मांझी थे। आखिर 20 मई 2014 को जीतन राम मांझी ने बिहार के 23वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली।

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चूहा क्यों खाते थे जीतन राम मांझी

जीतन राम मांझी ने मुख्यमंत्री रहते हुए चूहा खाने की बात कही थी। वह मुसहर समाज से आते हैं और उनके समाज में चूहे खाना आम बात है। हालांकि, उन्होंने कभी भी शराब नहीं पी, जबकि ताड़ी वह बचपन में ही पी चुके हैं। मांझीनामा में वह बताते हैं कि जब वह 7 साल के थे, तब उनके पिता ने शराब पीकर मां को मारा था, जिसमें मां की आंख फूट गई। उनके घर में ही शराब बनती थी और माता-पिता दोनों शराब पीते थे। वह कहते हैं, मैंने कभी शराब को नहीं छुआ, इसके खिलाफ जागरूकता फैलाता रहा। हालांकि, वह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने ताड़ी पी है। फरवरी 2024 में तो उन्होंने ताड़ी को नेचुरल जूस बता दिया था और अपने बचपन की एक कहानी बयां की थी, जिसमें वह बीमार हो गए और 8 दिन तक खजूर की ताड़ी पीकर ठीक हुए थे।

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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी

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मुख्यमंत्री रहते पार्टी से निकाले गए और इस्तीफा देना पड़ा

कुछ ही समय बाद नीतीश कुमार को समझ आने लगा कि जीतन राम को मुख्यमंत्री बनाने से फायदा नहीं हो रहा है। इधर जीतन भी समझ गए थे कि उन्हें काबिलीयत नहीं बल्कि जाति देखकर सीएम बनाया गया है। मांझी अपने बयानों ले लगातार जेडीयू की मुश्किलें बढ़ा रहे थे। 17 अक्टूबर 2014 को मांझी ने मरीजों के इलाज में लापरवाही बरतने पर डाक्टरों के हाथ काटने का बयान दिया। फिर 26 अक्टूबर को उन्होंने नीतीश कुमार पर हमला बोल दिया। बोले - मैं सीएम तो हूं, लेकिन फैसले नहीं ले सकता। फिर एक दिन वह बोले, मैं सीएम हूं, मुझे कोई नहीं हटा सकता। 8 फरवरी 2015 को वह नीति आयोग की बैठक के लिए दिल्ली आए थे, जेडीयू ने अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर मुख्यमंत्री मांझी को पार्टी से निकाल दिया और नीतीश को फिर से अपना नेता चुन लिया। फिर 20 फरवरी 2015 को उन्होंने राज्यपाल के पास जाकर इस्तीफा दे दिया।

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जीतन राम ने बनाई अपनी पार्टी

मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बाद 18 विधायकों के साथ जीतन राम मांझी ने अपनी अलग पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) बना ली। बेटे संतोश ने भी टीचर की नौकरी छोड़कर पार्टी की सदस्यता ले ली। 2023 में HAM ने भाजपा के साथ गठबंधन किया। उन्होंने अक्टूबर 2023 में राजनीति से सन्यास की भी घोषणा की, लेकिन2024 में लोकसभा चुनाव लड़ा और जीतकर अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री हैं। उनके बेटे संतोष बिहार सरकार में मंत्री हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भी वह JDU और BJP के साथ NDA के बैनर तले चुनाव लड़ रहे हैं।

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