बात 1952 की है। बात पहले बिहार विधानसभा चुनाव की है। देश के आजाद होने के बाद बिहार में पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहे थे। चुनाव में खड़े होने का एक नियम था, जिसके तहत 25 साल से कम उम्र का व्यक्ति उम्मीदवार नहीं बन सकता। मार्च-अप्रैल 1952 में विधानसभा चुनाव हुए और एक ऐसा शख्स चुनाव में खड़ा हो गया, जो अगस्त में 25 साल का होने वाला था। मतलब चुनाव के समय उस शख्स की उम्र 25 साल नहीं हुई थी और इस लिहाज से वह चुनाव लड़ने के लिए पात्र नहीं थे। फिर भी न सिर्फ उस शख्स ने चुनाव लड़ा, बल्कि जीत भी दर्ज की। चुनाव जीतने के बाद 17 अगस्त 1952 को यह शख्त 25 साल का हुआ। नामांकन पत्र में जन्म का साल, गांव, जिला लिखा, दो प्रस्तावक व पार्टी सिंबल दिए। दस्तावेजी सबूत भी जमा नहीं करने थे। नामांकन में आज जैसी सख्ती नहीं होने के चलते वह ऐसा कर पाए। बिहार विधानसभा चुनाव के तहत हमारी मुख्यमंत्री सीरीज के तहत चलिए जानते हैं बिहार के 16वें मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह के बारे में, जो चुनाव में जीतने के बावजूद अपनी सीएम की कुर्सी गंवा बैठे।
कौन थे 16वें मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह
चंद्रशेखर सिंह का जन्म 17 अगस्त 1927 को जमुई में हुआ था। उनका घर पटना से करीब 150 किमी दूर जमुई जिले के मलयपुर में था। उनके पिता बड़े जमींदार थे और चंद्रशेखर को प्यार से लल्लू बाबू पुकारा जाता था। उन्होंने इकोनॉमिक्स में पोस्टग्रेजुएट की डिग्री हासिल की। व्यक्ति जीवन की बात करें तो उनकी पत्नी का नाम मनोरमा सिंह था और उनके तीन बच्चे थे। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी ने उपचुनाव में जीत दर्ज की थी। एक और बात जो खास थी, वह थी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान चंद्रशेखर बिहार कांग्रेस के 'यंग टर्क्स' का हिस्सा थे। जिसमें बिंदेश्वरी दुबे, भगवत झा आजाद, अब्दुल गफूर, सत्येंद्र नारायण सिंह, केदार पांडे आदि कई नेता शामिल थ।
चंद्रशेखर सिंह का राजनीतिक करियर
जैसा कि हमने ऊपर बताया था, 1952 के पहले बिहार विधानसभा चुनाव में उम्र सीमा नहीं होने के बावजूद चंद्रशेखर सिंह नियमों के सख्ताई से लागू नहीं होने की वजह से चकाई सीट से चुनाव लड़े और जीत भी गए। इसके बाद 1957 और 1969 में वह झाझा से चुनाव लड़े और जीते। हालांकि, 1962 में इस सीट से वह चुनाव हार गए थे। 1972 में चंद्रशेखर सिंह ने चकाई विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीतकर विधानसभा पहुंचे।
चंद्रशेखर सिंह का दिल्ली तक का सफर
लल्लू बाबू उर्फ चंद्रशेखर का राजनीतिक सफर अच्छा चल रहा था। 1970 के दशक में उन्हें लाल-बत्ती भी मिलने लगी थी। 1977 में चंद्रशेखर सिंह ने लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन जनता पार्टी की लहर में हार गए। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान 1980 में बननी शुरू हुई। जब उन्होंने जनता पार्टी (सेक्युलर) के मधु लिमये को हराया। इंका प्रमुख इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो चंद्रशेखर सिंह को मंत्रिपरिषद में जगह भी मिल गई। इसके बाद 1985 में भी उन्होंने बांका लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में जीत दर्ज की थी। चंद्रशेखर सिंह राजस्व, उद्योग, लघु सिंचाई, कानून और लोक निर्माण जैसे मंत्रालयों में केंद्रीय मंत्री रहे। उन्होंने केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री के रूप में भी कार्य संभाला और इस पद पर रहते हुए ही उनका 9 जुलाई 1986 को कैंसर की बीमारी से निधन हो गया।
मुख्यमंत्री पद तक का सफर
चंद्रशेखर 1980 में लोकसभा चुनाव जीत चुके थे और केंद्र में मंत्री भी बन गए थे। लेकिन उधर पटना में राजनीतिक खेल कुछ और ही चल रहा था। 1983 तक जगन्नाथ मिश्र को सरकार चलाते हुए तीन साल हो गए थे, लेकिन पार्टी में गुटबाजी, विवादास्पद प्रेस बिल, बॉबी हत्याकांड, कथित को-ऑपरेटिव धांधली, मिनरल पॉलिसी विरोध ने जगन्नाथ मिश्र की कुर्सी हिला दी थी। इस सबके बीच कांग्रेस महासचिव राजीव गांधी ने भ्रष्ट छवि वाले मुख्यमंत्रियों को हटाने का फैसला किया और जगन्नाथ मिश्र की कुर्सी भी चली गई। अब नए मुख्यमंत्री की खोज शुरू हुई, प्रणब मुखर्जी और अरुण नेहरू पर्यवेक्षक बनकर पटना गए, विधायकों की राय ली, लेकिन सहमति नहीं बनीं। सीताराम केसरी और भीष्म नारायण सिंह का नाम लिया जा रहा था, लेकिन दिल्ली से आए एक फोन ने सब कुछ बदलकर रख दिया। विधायकों को चंद्रशेखर के नाम पर सहमत कराया गया। सहमति बनी और 13 अगस्त 1983 को चंद्रशेखर विधायक दल के नेता चुन लिए गए। 14 अगस्त 1983 को चंद्रशेखर सिंह ने बिहार के 16वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लिया। लोकसभा सांसद चंद्रशेखर को सांसदी से इस्तीफा दिलाकर विधान परिषद का सदस्य बनाया गया। चंद्रशेखर की सरकार में जीतन राम मांझी भी पहली बार राज्यमंत्री बने थे।
बिहार कांग्रेस में चंद्रशेखर बनाम जगन्नाथ मिश्र
मुख्यमंत्री बनने के बाद चंद्रशेखर बिना लाल बत्ती के कहीं भी पहुंच जाते थे और जमीनी हकीकत से रूबरू होते थे। फिर वहीं से प्रशासनिक अमले की क्लास भी लगाई जाती थी। यही कारण था कि उन्हें लोग धोती-कुर्ते वाला IAS कहने लगे थे। इधर जगन्नाथ मिश्र अलग ही चाल चल रहे थे। बिहार कांग्रेस और सरकार में चंद्रशेखर बनाम जगन्नाथ मिश्र लंबे समय तक चलता रहा। दोनों तरफ से चालें चली गईं, ब्राह्मणवाद और राजपूतवाद के आरोप भी एक-दूसरे पर लगे। दिल्ली की तरफ से दोनों गुटों को शांत कराया गया, लेकिन यह शांति सिर्फ दिखावे की थी। इस बीच 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। देश के अन्य हिस्सों की तरह बिहार के पटना, जमशेदपुर, धनबाद सहित कई शहरों में दंगे हुए। 1984 लोकसभा चुनाव हुए तो बिहार में इंका को 54 में से 48 सीटों पर जीत मिली। सीएम चंद्रशेखर की पत्नी मनोरमा सिंह भी बांका से चुनाव जीत गईं।
चुनाव जीतकर भी हार गए
फरवरी 1985 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए। लेकिन इससे पहले राजीव गांधी ने धनबाद के मजदूर नेता व नसबंदी के दौर में बिहार के स्वास्थ्य मंत्री रहे बिंदेश्वरी दुबे को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया। बिहार में चंद्रशेखर और जगन्नाथ मिश्र के गुटों का असर चुनाव पर पड़ सकता था, लेकिन बिंदेश्वरी दुबे किसी गुट के नहीं थे। चुनाव में जगन्नाथ मिश्र गुट के लगभग 2 दर्जन नेताओं के टिकट काट दिए गए। उधर चंद्रशेखर सिंह के समर्थक माने जाने वाले कुछ नेताओं के भी टिकट काटे गए। विधानसभा चुनाव हुए और 324 में से इंका ने 198 सीटों पर जीत दर्ज की। इंका की जीत के बाद केंद्रीय मंत्री बंसीलाल पटना पहुंचे और विधायकों से बात की। उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बताया कि चंद्रशेखर के पक्ष में सिर्फ 30 और विरोध में 100 विधायक हैं, बाकी सभी कह रहे थे कि आलाकमान के फैसले के साथ जाएंगे। चंद्रशेखर का जाना तय था और राजीव गांधी ने बंसीलाल से बिंदेश्वरी दुबे के नाम का ऐलान करने को कहा। इस तरह से मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव जीतने के बावजूद चंद्रशेखर सिंह सत्ता गंवा बैठे।
लोकसभा चुनाव में जॉर्ज फर्नांडिस को दी पटखनी
उस दौर में जॉर्ज फर्नांडिस को द जाइंट किलर कहा जाता था। लेकिन चंद्रशेखर सिंह को मुख्यमंत्री न बनाने के बाद राजीव गांधी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में जगह देने का मन बनाया। इसके लिए बांका से सांसद चंद्रशेखर सिंह की पत्नी ने इस्तीफा दिया और 1985 के उपचुनाव में उनके सामने जॉर्ज फर्नांडिस खड़े हो गए। दोनों तरफ से चुनाव में धांधली के आरोप लगे, लेकिन जीत चंद्रशेखर को मिली। इस तरह चंद्रशेखर सिंह ने जाइंट किलर डॉर्ज फर्नांडिस को मात दे दी। उन्हें पहले राज्यमंत्री और फिर पेट्रोलियम मंत्री का कैबिनेट प्रभार दिया गया। हालांकि, इस बीच उन्हें कैंसर हो गया और एम्स में इलाज भी चला। लेकिन वह कैंसर को नहीं हरा पाए। आखिर 9 जुलाई 1986 को उनका निधन हो गया।
