बिहार विधानसभा चुनाव का प्रचार जोरों पर है। राज्य में 6 और 11 नवंबरों को दो चरणों में मतदान होना है और 14 नवंबर 2025 को परिणाम घोषित किए जाएंगे। इस दौरान हम आपके लिए बिहार के अब तक के सभी CM के ऊपर एक सीरीज 'मुख्यमंत्री' लेकर आए हैं। आज हम बात करेंगे बिहार के ऐसे मुख्यमंत्री के बारे में, जो दो बार इस पद तक तो पहुंचे, लेकिन कार्यकाल ज्यादा दिन नहीं चल पाया। वह ऐसे मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने बिहार की शिक्षा व्यवस्था में एक अलग तरह का प्रयोग किया। उन्होंने अंग्रेजी को अनिवार्य विषय यानी कम्पलसरी सब्जेक्ट से हटा दिया। यही नहीं, राज्य के इस 11वें मुख्यमंत्री ने पहली बार बिहार में शराबबंदी की भी घोषणा की थी। बिहार के इस मुख्यमंत्री को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। उन्हें आज भी सम्मान से सभी जन-नायक कहते हैं। जी हां, बात जन-नायक कर्पूरी ठाकुर की हो रही है। तो चलिए जानते हैं बिहार के 11वें मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बारे में विस्तार से -
कर्पूरी ठाकुर का शुरुआती जीवन कैसा था
कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को आज के समस्तीपुर जिले के पितौंझिया गांव में हुआ था। आज इस गांव का नाम कर्पूरी ग्राम रख दिया गया है। उनके पिता गोकुल ठाकुर एक नाई थे और जब झोपड़ी में कर्पूरी ठाकुर का जन्म हुआ उस समय कड़ाके की ठंड पड़ रही थी और उनके पिता के पास नवजात कर्पूरी के लिए गर्म कपड़े भी नहीं थे। नवजात बच्चे के जन्म के बाद उसे मां के पास सूखी खास में लिटा दिया गया। कहा जाता है कि एक दिन एक साधु उनकी झोपड़ी में आए और उन्होंने कर्पूरी का माथा देखकर कहा कि ये बच्चा बहुत बड़ा आदमी बनेगा। तब गोकुल ठाकुर को लगा कि साधु-संत ऐसा ही बोलते हैं। नाई का बेटा है तो बाल ही काटेगा। कर्पूरी की 6 बहनें और एक भाई कभी भी स्कूल नहीं गए, लेकिन एक दिन कर्पूरी ने पिता से तख्ती (स्लेट) मांग ली। उनके पिता ने पत्थर की एक स्लेट और कुछ चूने के टुकड़े देकर बाल मन को बहला दिया। लेकिन वह मन से चाहते नहीं थे कि कर्पूरी स्कूल जाएं, उनकी चाहत थी कि वह नाई का काम सीखें। हालांकि, कुछ समय बाद कर्पूरी का नाम गांव के स्कूल में लिखवा दिया गया।
8 साल की उम्र में शादी
कर्पूरी ठाकुर की उम्र जब महज 8 साल की थी, तब उनकी शादी कर दी गई। 1932 में मुजफ्फरपुर की फुलेश्वरी देवी के साथ उनका विवाह हुआ। तीन साल बाद यानी जब कर्पूरी की उम्र 11 वर्ष थी दब गौना भी हो गया। अब कर्पूरी और फूलेश्वरी साथ रहने लगे। इधर ताजपुर के बॉयज मिडिल इंग्लिश स्कूल में उनका एडमिशन करवा दिया गया। बाद में वह पढ़ने के लिए तिरहुत अकादमी भी गए। साल 1940 में जब कर्पूरी 10वीं में थे तो उनको स्कूल की फीस के रूप में 2 रुपये चुकाने थे, लेकिन उनके पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। जब गोकुल ठाकुर बेटे के साथ गांव के जमींदार बच्चा सिंह के पास गए और फीस के लिए 2 रुपये मांगे तो बच्चा सिंह ने कहा कि पहले मेरे नहाने के लिए कर्पूरी कुएं से 27 बाल्टी पानी निकाले। 27 बाल्टी पानी भी कर्पूरी ने निकाल दिया। इस पानी से नहाने के बाद जमींदार ने कर्पूरी की फीस के लिए 2 रुपये दिए।
10वीं पास करने पर जमींदार ने कहा पैर दबाओ
कर्पूरी ठाकुर ने फर्स्ट डिवीजन में 10वीं पास की। वह अपने परिवार में 10वीं पास करने वाले पहले शख्स थे। इस बात से खुश पिता कर्पूरी को लेकर उसी जमींदार के पास ले गए, जिसने 27 बाल्टी पानी निकालने के बाद कर्पूरी की फीस के लिए 2 रुपये दिए थे। गोकुल ठाकुर ने जमींदार बच्चा सिंह से हाथ जोड़ते हुए कहा, 'हमरो कर्पूरी मैट्रिक पास होय गेले, मालिक।' जमींदार को अपनी ठसक प्यारी थी, उसने तुरंत अपने पैर टेबल पर रख दिए और कर्पूरी से कहा, 'अच्छा, अब मेरे पांव दबाओ।' कर्पूरी तुरंत ही जमींदार के पांव दबाने लगे। हालांकि, कर्पूरी ने बाद में इस बात को पूरी तरह से अपने मन-मस्तिष्क से निकाल दिया।

कर्पूरी ठाकुर ने ही पहली बार वृद्धावस्था पेंशन शुरू करवाई
कमाने वाला खाएगा, लूटने वाला जाएगा
अपनी पढ़ाई के दौरान कर्पूरी ठाकुर ने रामधारी सिंह दिनकर, शिवपूजन सहाय और गोपाल सिंह नेपाली जैसे लेखकों को पढ़ा। वह भी कविताएं व भाषण लिखने और सुनाने लगे। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर कर्पूरी ठाकुर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। 9 अगस्त 1942 को दरभंगा में छात्रों की बैठक के दौरान उन्होंने जोरदार भाषण दिया, जिसके बाद लोग सरकारी भवनों पर तिरंगा फहराने पहुंचने लगे और रेल की पटरियां भी उखाड़ने लगे। अंग्रेजों से बचने के लिए वह नेपाल चले गए और वहां अंडरग्राउंड आंदोलन से जुड़ गए। वहां पर उनकी मुलाकात जयप्रकाश नारायण यानी जेपी से हुई। यहां उन्होंने बंदूक चलाना और बम बनाना भी सीखा। बाद में कर्पूरी ठाकुर सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। अक्टूबर 1942 की एक रात 2 बजे कर्पूरी और उनके कुछ साथियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उन्हें जेल की सजा हुई। 26 महीने बाद नवंबर 1945 में जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने नारा दिया - 'कमाने वाला खाएगा, लूटने वाला जाएगा, नया जमाना आएगा।' देखते ही देखते यह नारा गांव-गांव में गूंजने लगा।
चुनावी राजनीति में एंट्री
1947 में देश के आजाद होने के बाद कर्पूरी अपने गांव के ही स्कूल में पढ़ाने लगे, लेकिन कुछ ही समय बाद वह सक्रिय राजनीति में आ गए। 1952 के पहले बिहार विधानसभा चुनाव में ताजपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीते। वह मजदूरों के अधिकारों और वंचितों व पिछड़ों के आरक्षण के लिए लड़ते रहे, जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई। मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व करने के लिए भी उन्हें गिरफ्तार किया गया। 1970 में टेल्को में मजदूरों के समर्थन में उन्होंने 28 दिन तक आमरण अनशन किया। जय प्रकाश नारायण के साथ उनकी जोड़ी हिट रही। इन दोनों ने जनता पार्टी के अन्य नेताओं के साथ मिलकर संपूर्ण क्रांति आंदोलन चलाया। वह दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे। इससे पहले 1967 में राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार में महामाया प्रसाद मुख्यमंत्री बने तो कर्पूरी ठाकुर को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया। कर्पूरी को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी भी दी गई।
कर्पूरी डिवीजन से पास हुए बच्चे
कर्पूरी राज्य के मुख्यमंत्री ही नहीं शिक्षामंत्री भी रहे। उनका मानना था कि बिहार के छात्रों को अंग्रेजी नहीं, हिन्दी में शिक्षा मिलनी चाहिए। उन्होंने राज्य में 10 की परीक्षा में अंग्रेजी को अनिवार्य विषय की सूची से हटा दिया। उनके इस फैसले के बाद जो छात्र अंग्रेजी में पास नहीं होते थे, उन्हें भी पास मान लिया जाता था। उस समय विपक्ष के साथ अखबारों ने भी इस तरह पास होने वाले छात्रों को तंज मारते हुए कर्पूरी डिवीजन से पास कहना शुरू कर दिया था। 22 दिसंबर 1970 को दारोगा प्रसाद राय की कुर्सी जाने के बाद कर्पूरी ठाकुर बिहार के 11वें मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस (O) ने कर्पूरी ठाकुर को समर्थन दिया और जनसंघ भी उनके साथ आ गया। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में विधायक दल के नेता रामानंद तिवारी थे, लेकिन ज्यादातर विधायक कर्पूरी के समर्थन में थे। कर्पूरी मुख्यमंत्री बन गए और रामानंद तिवारी ने अपना दावा छोड़ दिया। कर्पूरी पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने और रामानंद को गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। सीएम बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने ही बिहार में पहली बार शराबबंदी भी लागू की थी।
वृद्धावस्था पेंशन स्कीम का आइडिया
मुख्यमंत्री बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर पहली बार अपने माता-पिता से मिलने उनकी झोपड़ी में गए तो पांव छूकर आशीर्वाद लिया। उनकी मां ने उन्हें गुड़ भी खिलाया और 25 पैसे भी दिए। कर्पूरी के पिता भी उन्हें कुछ देना चाहते थे, लेकिन पैसा नहीं होने के कारण झेंपकर झोपड़ी से बाहर चले गए। पिता की बेबसी समझकर उन्होंने पटना लौटते ही बुजुर्गों के लिए वृद्धावस्था पेंशन स्कीम शुरू की। स्कीम के तहत 60 साल से अधिक उम्र के प्रत्येक बुजुर्ग को 10 रुपये प्रति माह दिए जाने लगे।

बिहार में पहली बार OBC आरक्षण कर्पूरी ठाकुर ने ही शुरू किया
163 दिन की सरकार
कर्पूरी ठाकुर ने गठबंधन को एक रखने की काफी कोशिशें कीं। लेकिन वह सभी को खुश और अपने साथ नहीं रख पाए। उन्होंने 5 बार मंत्रिमंडल विस्तार किया, मंत्रियों की संख्या भी 41 तक पहुंच गई लेकिन असंतोष खत्म नहीं हुआ। मई 1971 में कांग्रेस (R) ने उनके खिलाफ विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया। लेकिन अविश्वास प्रस्ताव आने से पहले ही कर्पूरी ठाकुर ने 2 जून 1971 को मुख्यमंत्री बद से इस्तीफा दे दिया। उनकी सरकार सिर्फ 163 दिन ही चल पायी।
दूसरी बार मुख्यमंत्री बने कर्पूरी ठाकुर
जनवरी 1977 में केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार के आपातकाल के खिलाफ समूचा विपक्ष इकट्ठा हो गया। कांग्रेस (ओ) जनसंघ, भारतीय लोकदल, समाजवादी दल और अन्य छोटे-छोटे दल मिल गए और जनता पार्टी बनाई। जेपी ने जनता पार्टी बनाने में अहम भूमिका निभाई और चंद्रशेखर इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। जून 1977 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए तो जनता पार्टी पार्टी ने 324 में से 214 सीटें जीत लीं। विधायक दल का नेता चुनने की बात आई तो कैलाशपति मिश्र, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर प्रमुख दावेदार थे। जनसंघ के कद्दावर नेता रहे नानाजी देशमुख को विधायक दल का नेता चुनने की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने कैलाशपति मिश्र को तो मना लिया, लेकिन सत्येंद्र नारायण सिंह नहीं माने, आखिर वोटिंग हुई तो कर्पूरी के समर्थन में दो-तिहाई विधायकों ने वोट किया। 24 जून 1977 को कर्पूरी ठाकुर ने दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस बार कर्पूरी ठाकुर 1 साल 301 दिन तक यानी 21 अप्रैल 1979 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे।
पहली बार OBC आरक्षण लागू किया
बात नवंबर 1978 की है। पटना के गांधी मैदान में बने मंच से तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने आरक्षण के खिलाफ बोला। भीड़ के एक हिस्से को पीएम की बात पसंद आई और जमकर तालियां भी बजाईं। इसी दौरान बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर भी मंच पर थे और उन्हें पीएम की यह बातें पसंद नहीं आईं। प्रधानमंत्री को एयरपोर्ट से विदा करने के बाद वह सीधे सचिवालय पहुंच गए। रात करीब साढ़े आठ बजे उन्होंने बिहार में पिछड़ों के लिए आरक्षण की अधिसूचना जारी की। एक हफ्ते बाद 10 नवंबर को उनकी सरकार ने तीन प्रस्ताव पास किए, जिनमें पिछड़ों के लिए 20 फीसद आरक्षण, महिलाओं के लिए 3 फीसद और आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जाति के लोगों के लिए भी 3 फीसद आरक्षण दिया गया था। इस तरह से बिहार पहला राज्य बन गया, जहां OBC आरक्षण लागू हुआ। सरकार में शामिल कई पार्टियां कर्पूरी ठाकुर के इस फैसले से नाराज हो गईं और उनके कई विधायक भी उनसे दूर हो गए। इस बीच मोरारजी देसाई से भी उनके मतभेद बढ़ गए। आखिर 19 अप्रैल 1979 को विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव आया और कर्पूरी को 105 वोट ही मिले, जबकि उनके विरोध में 135 वोट पड़ गए। इस तरह कर्पूरी ठाकुर की सरकार गिर गई।
जून 1980 से फरवरी 1988 तक वह बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। 17 फरवरी 1988 को उनका निधन हो गया। डॉक्टरों के अनुसार कर्पूरी ठाकुर की मृत्यु हार्ट अटैक के चलते हुई थी, जबकि उनके करीबियों के अनुसार षड़यंत्र के तहत उनकी हत्या की गई थी। भारत सरकार ने 2024 में उनकी मृत्यु के 36 साल बाद उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा।
