बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के मद्देनजर हम आपके लिए बिहार के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी लेकर आए हैं। मुख्यमंत्री नाम की इस सीरीज में आज बात राज्य की 21वीं और अब तक की इकलौती महिला मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के बारे में। राबड़ी देवी की कहानी उस रात से शुरू करते हैं, जब पहली बार उन्हें पता चला कि उन्हें अगले दिन मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी है। बात 24 जुलाई 1997 की है। सीबीआई ने चारा घोटाला मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी थी। मुख्यमंत्री आवास 1 अणे मार्ग के बाहर बड़ी मात्रा में पुलिस बल तैनात थे और लालू प्रसाद की गिरफ्तारी तय थी। रात के 10 बजे थे और सीएम लालू प्रसाद यादव अपने बेडरूम में पहुंचे। यहां पर उनकी पत्नी राबड़ी देवी और 9 बच्चे मौजूद थे। मौका देखकर लालू यादव ने राबड़ी देवी की तरफ मुखातिब होते हुए कहा, 'ऐ सुनिए... कल सुबह आपको मुख्यमंत्री का शपथ लेना है।' यह सुनते ही बेडरूम में सन्नाटा छा गया। फिर बच्चे रोने लगे और राबड़ी देवी की आंखों में भी आंसू भर आए। वह बोलीं, 'हम कैसे चलाएंगे सरकार? हमको राजनीति-परशासनी के बारे में कुछ पता नहीं है।' लालू बोले - 'डरिए नहीं। हम जेल पहली बार नहीं जा रहे हैं। अब पूरा बिहार आपका बच्चा है। सबका ध्यान रखिएगा।' लालू यादव ने बहुत सोच-समझकर यह फैसला लिया था, लेकिन राबड़ी देवी रो रही थीं। क्योंकि लालू नहीं चाहते थे कि सत्ता परिवार से बाहर किसी के हाथ में जाए, इससे पार्टी पर उनकी पकड़ ढीली हो सकती थी। यही कारण है कि उन्होंने राबड़ी देवी को सत्ता सौंपने का विवादित फैसला किया और अगले दिन यानी 25 जुलाई 1997 को राबड़ी देवी ने बिहार की 21वीं मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली।
पांचवीं तक ही पढ़ीं राबड़ी देवी
राबड़ी देवी का जन्म 1 जनवरी 1955 को गोपालगंज जिले के सेलार कला गांव में हुआ था। उनके पिता शिवप्रसाद चौधरी सरकारी ठेकेदार थे। वह एक सम्पन्न किसान थे, उनके पास 500 गाय भी थीं। उनका बड़ा सा घर था, जिसके बाहर हाथी और शेर के पुतले लगे हुए थे, जो उनके परिवार की ताकत और सम्मान को दर्शाते थे। राबड़ी देवी अपने सात भाई-बहनों में तीसरे नंबर की हैं। राबड़ी देवी की 5वीं तक की पढ़ाई गांव के ही स्कूल में हुई। लेकिन इसके बाद पढ़ाई के लिए गांव से दूर जाना था और उनके पिता नहीं चाहते थे कि लड़कियां गांव से दूर जाएं। इसलिए राबड़ी देवी की आगे की पढ़ाई नहीं हो सकी।
दहेज में क्या-क्या लेकर आई राबड़ी
राबड़ी देवी के पिता ने उनकी शादी फुलवारी के युवक लालू प्रसाद से तय कर दी थी। उस समय लालू प्रसाद यादव पटना में बढ़ते थे। साल 1973 में बसंत पंचमी के दिन राबड़ी और लालू प्रसाद की शादी हुई। राबड़ी देवी के पिता ने उन्हें दहेज में 5 बीघा जमीन और 5 गायें दी थीं। जबकि लालू प्रसाद यादव के परिवार के पास बमुश्किल ही 2 बीघा जमीन थी और उनका परिवार काफी गरीब था। लालू यादव ने अपनी आत्मकथा 'गोपालगंज टू रायसीना...' में बताया है कि सिंदूर डालते समय राबड़ी ने घूंघट भी नहीं हटाया था। गौने के बाद ही पहली बार उन्होंने राबड़ी देवी का चेहरा देखा था।
गौना और लालू प्रसाद के मरने की खबर
लालू और राबड़ी देवी की शादी हो चुकी थी। इधर लालू प्रसाद यादव छात्र आंदोलन में जुट गए। बात 18 मार्च 1974 की है। बिहार छात्र संघर्ष समिति विधानमंडल का घेराव करने का ऐलान कर दिया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर ने छात्रों से सख्ती से निपटने का फैसला किया। लाठीचार्ज में 8 छात्रों की मौत हो गई। पटना में लालू प्रसाद यादव के मारे जाने की भी अफवाह फैल गई। अपनी बायोग्राफी में लालू ने लिखा है कि 18 मार्च के प्रदर्शन से पहले वह राबड़ी से मिले थे और तब उन्होंने पहली बार राबड़ी को देखा था। वह साधारण साड़ी पहने हुई थी और शर्म व डर से भरी थी। लालू ने उस समय राबड़ी को बताया था कि वह बिहार में चल रहे आंदोलन के नेता हैं और 18 मार्च से पहले पटना पहुंचना जरूरी है, नहीं तो उन्हें भगोड़ा माना जाएगा। अंडरग्राउंड होने से पहले भी लालू यादव पुलिस से बचते हुए राबड़ी से मिले और उन्हें समझाकर अंडरग्राउंड हो गए। 22 मार्च को पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। उन्हें मीसा एक्ट के तहत गिरफ्तार करके बांकीपुर जेल भेजा गया। वह 2 साल तक जेल में रहे। राबड़ी देवी उनसे मिलने जाती थीं और एक आदमी के हाथों लालू यादव के लिए दूध, दही, फल और चूड़ा भेजती थीं। लालू भी जेल से राबड़ी देवी को चिट्ठियां लिखा करते थे।

बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी (PTI)
राबड़ी देवी का CM की पत्नी से मुख्यमंत्री तक का सफर
1990 में लालू यादव पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो वह पटना के वेटनरी कॉलेज के छोटे पिओन क्वार्टर में रही रहते थे। मुख्यमंत्री बनने के बावजूद वह यहीं रहकर राजकाज चला रहे थे। इस दौरान उनकी पत्नी राबड़ी देवी मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाती, बच्चों को संभालती और खुद ही कपड़े धोती थीं। मुख्यमंत्री की पत्नी होने के बावजूद उनका राजनीति से कोई संबंध नहीं था। उनकी दुनिया लालू यादव और अपने 9 बच्चों के इर्द-गिर्द घूमती थी। फिर एक दिन उनकी जिंदगी ने बड़ी करवट ली। लालू यादव का जेल जाना तय हो गया तो 25 जुलाई 1997 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जिस राबड़ी देवी का राजनीति से कोई संबंध नहीं था, वह अचानक राज्य की मुख्यमंत्री बन गई थीं। विपक्ष की तरफ से परिवारवाद, कठपुतली सरकार और लालू जेल से चलाएं सरकार जैसे आरोप लगाए जा रहे थे। असल में राबड़ी देवी की सरकार को शुरुआत में लालू यादव जेल से चला रहे थे। वह स्वयं अधिकारियों को निर्देश देते और सरकारी फाइलों का फैसला जेल से ही हो रहा था। विपक्ष के लिए राबड़ी सिर्फ एक कठपुतली मुख्यमंत्री थी।
शपथग्रहण में लड़खड़ाई तो बनाया गया मजाक
25 जुलाई 1997 को राबड़ी देवी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं। लेकिन शपथग्रहण के दौरान वह तीन बार लड़खड़ाई भी, जिसको लेकर विपक्ष ने उनका मजाक भी बनाया। विपक्ष ने कहा, 'घर से सीधा सत्ता में! क्या बिहार अब परिवार का खेल हो गया है?' लेकिन राबड़ी देवी ने बड़ी ही तेजी से राजनीति को सीखा और राजनीति ने भी उतनी ही तेजी से उन्हें अपना लिया। शुरुआत में धीरे-धीरे ही सही, लेकिन उन्होंने सिस्टम को समझना शुरू कर दिया। वह फाइलें देखने लगीं और मुख्यमंत्री आवास पर बैठकें लेने लगीं।
इन घटनाओं ने राबड़ी देवी के शासन को बदनाम किया
राबड़ी देवी के शासन में आपराधिक घटनाएं लगातार होती रहीं और कई बड़े हत्याकांड हुए, जिनके कारण उनके राज को जंगलराज कहा गया। इनमें प्रमुख थे - 1998 में समाज कल्याण विभाग के सचिव पद पर तैनात बिहार कैडर के सीनियर IAS अधिकारी बीबी बिस्वास की पत्नी चंपा के साथ बलात्कार की घटना ने सबको चौंका दिया। चंपा ने राज्यपाल सुंदर भंडारी को चिट्ठी लिखकर आरोप लगाया कि RJD विधायक और समाज कल्याण बोर्ड की चेयरपर्सन हेमलता यादव के बेटे मृत्युंजय और उसके साथियों ने 2 साल तक उनके साथ रेप किया, धमकाया, मारा-पीटा और एक बार गर्भ भी गिराया। यही नहीं, आगे गर्भधारण से बचने के लिए नसबंदी भी कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि मृत्युंजय और उसके साथियों ने उनकी मां, ननद, भतीजी और दो नौकरानियों के साथ भी बलात्कार किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनकी भतीजी और दोनों नौकरानियां गायब हैं, हो सकता है उन्हें मार दिया गया हो। इस केस ने सियासी गलियारों में खलबली मचा दी। कहा जाने लगा कि जब महिला मुख्यमंत्री के रहते IAS ऑफिसर की पत्नी और परिवार सुरक्षित नहीं तो फिर जनता का क्या होगा। इस मामले में केंद्र सरकार ने राज्यपाल द्वारा राबड़ी सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश राष्ट्रपति के आर नारायणन तक पहुंचाई, लेकिन उन्होंने इस सिफारिश को खारिज कर दिया।
राष्ट्रपति शासन के बाद राबड़ी देवी की फिर वापसी
इसके बाद 25 जनवरी 1999 को रणवीर सेना ने शंकर बिगहा में 23 और 10 फरवरी को नारायणपुर गांव में 11 दलितों की हत्या कर दी। सिर्फ 15 दिन के अंदर 34 दलितों की हत्या से बिहार ही नहीं, पूरे देश में हंगामा हो गया। फिर 12 फरवरी को दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में बैठक हुई और राबड़ी देवी की सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाने पर सहमति बन गई। इस बार प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति केआर नारायणन ने भी मंजूरी दे दी। राबड़ी देवी की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और लालू यादव ने से लोकतंत्र की हत्या करार दिया। RJD समर्थक सड़कों पर उतर आए और हिंसक प्रदर्शनों में एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए। इधर लालू यादव ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को साध लिया और उन्हें राष्ट्रपति शासन के खिलाफ वोट करने के लिए मना लिया। प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी भी सोनिया गांधी से मिले, लेकिन वह राष्ट्रपति शासन के लिए नहीं मानीं। आखिर 8 मार्च को केंद्र ने राष्ट्रपति शासन वापस ले लिया और 9 मार्च 1999 को राबड़ी देवी फिर से बिहार की मुख्यमंत्री बन गईं।

राबड़ी देवी और लालू यादव की फाइल फोटो (PTI)
तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं राबड़ी देवी
फरवरी 2000 में बिहार में एक बार फिर विधानसभा चुनाव हुए। इस बार RJD ने लालू यादव के चेहरे पर वोट लड़ा। भाजपा और समता पार्टी ने गठबंधन बना लिया। 23 फरवरी 2000 को जब नतीजे आए तो RJD को पिछली बार से 43 सीटें कम यानी कुल 123 सीटें मिलीं। हालांकि, वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे और NDA के हिस्से 122 सीटें आईं। कांग्रेस को 23 व अन्य को 56 सीटों पर जीत मिली। 324 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 163 सीटें जरूरी थीं। NDA की तरफ से नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया। राज्यपाल विनोद चंद्र पांडेय ने सबसे बड़े दल RJD को छोड़कर NDA को सरकार बनाने का न्योता दे दिया। 3 मार्च 2000 को नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली, जबकि उनके पास बहुमत नहीं था। नीतीश कुमार बहुमत नहीं जुटा पाए और 10 मार्च 2000 को इस्तीफा दे दिया। फिर 11 मार्च 2000 को राबड़ी देवी तीसरी बार बिहार की मुख्यमंत्री बनीं।
जंगलराज की कहानी
जब बिहार में RJD शासन के दौरान जंगलराज की बात होती है तो इसमें राबड़ी शासन की बात होती है। 3 जुलाई 1999 को राबड़ी देवी के भाई साधु यादव के बंगले के गैराज में एक कार के अंदर गौतम और शिल्पी नाम के दो लोगों के शव मिले। परिजनों का आरोप था कि शिल्पी का गैंगरेप करने के बाद हत्या की गई है। शिल्पी को बचाने पहुंचे प्रेमी गौतम की गला दबाकर हत्या की गई। इस पर हंगामा हुआ तो राबड़ी देवी ने यह केस सीबीआई को सौंप दिया। साधु यादव ने डीएनए और ब्लड सैंपल देने से मना कर दिया। फिर अगस्त 2003 में मामले को आत्महत्या बताकर बंद कर दिया गया। वह ऐसा दौर था, जब सीएम राबड़ी देवी की नाक के नीचे उनके भी साधु और सुभाष यादव की शह पर पार्टी नेताओं पर तमाम कुकर्म के आरोप लगे। कहा जाता है कि सुभाष यादव ने बिहार के अपराध को अपने कंट्रोल में ले लिया था। इस दौरान अपहरण एक उद्योग की तरह चल निकला था। हत्या, बलात्कार, चोरी-डकैती, नरसंहार आम बात थी। 5 अगस्त 1997 को सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट ने कहा था कि बिहार में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। जंगलराज है। भ्रष्ट अफसर प्रशासन चला रहे हैं। विपक्ष ने इसे हाथों-हाथ लिया और आज भी RJD के शासन को जंगलराज कहकर उसकी आलोचना की जाती है।
