बिहार के 18वें और 19वें मुख्यमंत्री की पूरी कहानी
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का प्रचार जोरों पर है। पहले चरण के तहत 6 नवंबर को मतदान होना है और इसके लिए प्रचार अपने अंतिम चरण में है। महागठबंधन और NDA दोनों बड़े गठबंधनों ने बिहार में अपनी पूरी ताकत झौंक दी है। दोनों गठबंधनों के साथ ही अन्य छोटे दलों के भी बड़े-बड़े नेता चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। निर्दलीय उम्मीदवार भी अपनी पूरी ताकत झौंके हुए हैं। बिहार चुनाव पर हमारी विशेष कवरेज जारी है और मुख्यमंत्री सीरीज के तहत हम बिहार के सभी मुख्यमंत्रियों के बारे में आपको जानकारी दे रहे हैं। आज इस सीरीज में हम बिहार के 18वें मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद और 19वें सीएम सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के बारे बात करेंगे। भागवत झा जहां 1 साल 24 दिन तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे, वहां सत्येन्द्र नारायण सिन्हा का कार्यकाल 270 दिन का ही रहा। चलिए जानते हैं दोनों के बारे में विस्तार से -
भागवत झा आजाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। बिहार की राजनीति में उन्हें 'शेर-ए-बिहार' नाम से जाना गया। वह एक बड़े राजनेता होने के साथ ही साहित्यकार भी थे। अपनी किताब मृत्युंजयी में उन्होंने लोक दृष्टि विकसित करने के लिए जन-संघर्ष को अनिवार्य बताया है। विकट से विकट परिस्थितियों में भी उनका मनोबल कभी नहीं गिरा और इसी वजह से स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही उनके नाम के साथ 'आजाद' शब्द जुड़ गया।
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भागवत झा आजाद का जन्म 28 नवंबर 1922 को तत्कालीन बिहार और उड़ीसा प्रांत गोड्डा में हुआ था। गोड्डा आज झारखंड का जिला है और यहां के मेहरमा प्रखंड के कसबा गांव में भागवत झा आजाद का जन्म हुआ था। वह पढ़ाई में बहुत अच्छे थे, लेकिन गुलामी से लड़ने की अपनी जीवटता के चलते स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। 1942 भारत छोड़ो आंदोलन के एक प्रदर्शन में भाग लिया और उनके पैर में गोली लग गई। बाद में अंग्रेजों ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया। वह एक प्रखर राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी रहे। भागवत झा आजाद 6 बार सांसद रहे और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार में केंद्रीय राज्यमंत्री भी रहे।
भागवत झा आजाद के मन पर गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू का काफी गहरा प्रभाव पड़ा। जब देश आजाद हुआ तो स्वयं राजनीति ने उन्हें चुना। उनकी समाज में लोकप्रियता काफी ज्यादा थी, जिसके कारण वह गोड्डा से सांसद चुने गए। बाद में भागलपुर से भी वह सांसद रहे। 6 बार सांसद रहे भागवत झा आजाद इंदिरा गांधी की सरकार में केंद्रीय राज्यमंत्री भी बने। वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी थे, लेकिन अपनी बात रखना उन्हें बखूबी आता था। वह राज्य मंत्री थे, लेकिन एक बार उन्हें इसी राज्यमंत्री पद के लिए फिर से शपथ दिलाए जाने की बात हुई तो उन्होंने शपथ लेने से इनकार कर दिया। यही नहीं वह शपथग्रहण कार्यक्रम छोड़कर चले गए।
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सिर्फ इंदिरा गांधी ही नहीं, उनके बाद प्रधानमंत्री बने उनके बेटे राजीव गांधी को भी भागवत झा आजाद ने करारा जवाब दिया। बाद 1980 के दशक के अंतिम दिनों की है। जब बिहार में कांग्रेस के लिए हालात लगातार बिगड़ते जा रहे थे। इसी दौरान राजीव गांधी ने उनसे कहा कि आप बिहार जाएं और वहां संभालें, मैं आपके बेटे को एडजस्ट कर लूंगा। इस पर भागवत झा आजाद ने उनसे कहा कि मैं पटना चला जाऊंगा और बिहार भी संभाल लूंगा, लेकिन बेटे को एडजस्ट करने वाली बात मुझे मत बोलिए, मैं वैसा आदमी नहीं हूं, जिसकी सोच सिर्फ अपने परिवार तक सीमित हो।
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बिहार में बाढ़ और संगठन की समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई और फिर केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें हटाने का फैसला कर लिया। राजीव गांधी ने भागवत झा आजाद को बिहार भेजा और 14 फरवरी 1988 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। बाद में उन्हें विधान परिषद भेज दिया गया। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंन को-ऑपरेटिव माफियाओं के खिलाफ अभियान चलाया। इसके बाद नंबर आया धनबाद के कोल माफिया और अन्य जिलों के संगठित अपराधियों का। आजादी की बिहार के गवर्नर के साथ भी ठन गई, यहां तक कि दोनों छठ के अवसर पर मोटर बोट में भिड़ गए।
17 दिसंबर 1988 को भागलपुर में इंका के छात्र संगठन (N.S.U.I.) का जिला अध्यक्ष प्रवीण सिंह एक डॉक्टर के घर में घुस गया। हथियारों के साथ घर में घुसे प्रवीण सिंह ने बंदूक दिखाकर डॉक्टर की बेटी पापरी घोष का अपहरण कर लिया। इस घटना को लेकर कई बातें हुईं, लेकिन भागलपुर में लोगों में इस घटना के बाद काफी गुस्सा भड़क गया। बात इसलिए और बिगड़ी क्योंकि प्रवीण सिंह को मुख्यमंत्री आजाद का करीबी माना जाता था। हालांकि, बाद में गोड्डा जिले से लड़की का बयान भी आया कि उसने बिना किसी दबाव के अपनी मर्जी से प्रवीण सिंह से शादी की है। लेकिन भागलपुर में लोग मानने को तैयार नहीं थे। तीन दिन तक शहर बंद रहा। पापरी घोष को बरामद भी कर लिया गया और बाद में घोष परिवार शहर छोड़कर ही चला गया। इस घटना के बाद भागवत झा आजाद ने केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा भी खो दिया और आखिर मार्च 1989 में हाई कमान ने उन्हें हटाकर पुराने कांग्रेसी नेता सत्येन्द्र नारायण सिन्हा को राज्य की कमान सौंप दी। भागवत झा आजाद का 89 वर्ष की उम्र में लंबी बीमारी के बाद 2011 में निधन हुआ।
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भागवत झा आजाद केंद्रीय नेतृत्व का विश्वास खो चुके थे और जब बिहार के लिए नए मुख्यमंत्री की खोज हो रही थी तो कांग्रेस को अपने पुराने नेता सत्येन्द्र नारायण सिन्हा की याद आयी। सत्येन्द्र नारायण स्वतंत्रता सेना रह चुके थे। वह एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ थे और प्यार से लोग उन्हें छोटे साहब कहते थे। सत्येन्द्र नारायण सिन्हा बिहार की औरंगाबाद लोकसभा सीट से 7 बार सांसद रहे और वह लगातार 10 साल तक केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे।
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12 जुलाई 1917 को जन्मे सत्येन्द्र नारायण सिन्हा की शुरुआती पढ़ाई इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुई। यहां उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री के साथ काफी समय बिताया, जिसका उन पर व्यापक असर पड़ा। बता दें कि सत्येन्द्र नारायण सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा, वैशाली की पहली महिला सांसद थी। वह 1980 में जनता पार्टी और 1984 में कांग्रेस से सांसद बनीं।
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सत्येन्द्र नारायण सिंह ने छठे और सातवें दशक में बिहार की राजनीति में अहम भूमिका निभाई। राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री बिनोदानंद झा उनके राजनीतिक समर्थन से ही इस कुर्सी तक पहुंचे। बाद में पंडित बिनोदानंद झा ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से खास आग्रह किया और उन्हें बिहार लाकर अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया। उनकी शक्तियां ऐसी थीं कि उस समय सत्येन्द्र नारायण सिन्हा को 'डिफैक्टो' सीएम माना जाता था। उन्हें शिक्षामंत्री, कृषिमंत्री और स्थानीय प्रशासन मंत्रालय की जिम्मेदारियां मिलीं। उनके समय में ही मगध विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 1963 में कामराज योजना के तहत बिनोदानंद झा की कुर्सी गई तो सत्येन्द्र नारायण सिन्हा सीएम बन सकते थे, लेकिन उन्होंने केबी सहाय का नाम आगे बढ़ा दिया। इसे उनका मास्टर स्ट्रोक माना जाता है।
साल 1969 में जब कांग्रेस टूटी तो सत्येन्द्र नारायण सिन्हा बुजुर्ग नेताओं की कांग्रेस ओ के साथ आ गए। बाद में आपातकाल के बाद उन्होंने जनता दल का दामन थाम लिया। 1977 से 1984 तक वह जनता दल में रहे। बाद में बिहार की राजनीति को बदलकर रख देने वाले मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, रघुवंश प्रसाद सिंह, सुशील कुमार मोदी, रामविलास पासवान, सुबोधकांत सहाय, रामजतन सिन्हा और नरेंद्र सिंह जैसे नेताओं को उन्होंने प्रोत्साहित किया। जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर सिंह से अनबन के बाद वह 1984 में वापस कांग्रेस में लौट गए। इंदिरा गांधी ने स्वयं उन्हें पार्टी में शामिल करवाया।
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सत्येन्द्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 को बिहार के 19वें मुख्यमंत्री बने। इस दौरान उन्होंने शिक्षा विभाग भी अपने पास रखा। छोटे साहेब के काल में ही बिहार में पंचायती राज व्यवस्था को लागू किया गया। उनके शासन काल के दौरान ही बिहार के भागलपुर में दंगे हुए, जिसे काबू नहीं कर पाने का उन पर आरोप लगा। आखिर 6 दिसंबर 1989 को सिर्फ 270 दिन की सत्ता के बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। चुनाव से ठीक पहले उनकी जगह पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को गद्दी सौंपी गई। 4 सितंबर 2006 को छोटे साहेब इस दुनिया को छोड़कर चले गए।
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