बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2025) होने तय हैं। आजकल चुनावों के दौरान नेताओं के जबरदस्त तामझाम होते हैं। मुख्यमंत्री और तमाम नेता प्रचार का पूरा कार्यक्रम तैयार करते हैं। प्रचार के लिए बड़ी योजनाएं बनती हैं और फिर जनता के बीच पूरे लाव-लश्कर के साथ पहुंचकर अपनी ताकत दिखाकर वोट मांगे जाते हैं। लेकिन बिहार में एक ऐसे भी मुख्यमंत्री रहे हैं, जिन्होंने प्रचार नहीं किया, फिर भी वह हर बार चुनाव जीते। जी हां, बात राज्य के पहले मुख्यमंत्री 'श्रीबाबू' यानी श्री कृष्ण सिंह की हो रही है। श्रीबाबू बिहार के इकलौते मुख्यमंत्री रहे, जो पहले प्रधानमंत्री रहे और फिर मुख्यमंत्री बनाए गए। यही नहीं, वह बिहार के विकास के लिए इतने समर्पित थे कि मुख्यमंत्री रहते हुए वह अपनी ही पार्टी की केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ अनशन पर बैठ गए। आखिर उनकी मांग मानी गई, यही कारण है कि उन्हें आधुनिक बिहार का निर्माता माना जाता है। 'मुख्यमंत्री' सीरीज के तहत हम बिहार के हर मुख्यमंत्री के बारे में विस्तार से जानेंगे। चलिए आज जानते हैं बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीबाबू के बारे में...
पांच साल की उम्र में मां का साया उठ गया
श्रीकृष्ण सिंह का अपना पैतृक गांव मुंगेर जिले में बरबीघा थाना क्षेत्र के माउर में था। लेकिन श्रीबाबू का जन्म अपने ननिहाल नवादा जिले के खनवा गांव में 21 अक्टूबर 1887 को हुआ। वह कुल पांच भाई थे, तीन उनसे बड़े और एक उनसे छोटा भाई था। उनके पिता हरिहर सिंह मुंगेर में जमींदार थे। जब श्रीबाबू महज पांच साल के थे, तब एक दिन अचानक उनकी मां की सेहत बिगड़ गई। बाद में पता चला कि उन्हें प्लेग हो गया है और कुछ ही दिन बाद उनका निधन हो गया। इस तरह सिर्फ पांच साल की उम्र में ही उनके सिर से मां का साया उठ गया। इसके बाद उनकी देखरेख की जिम्मेदारी उनकी बड़ी भाभी यानी सबसे बड़े भाई देवकीनंदन सिंह की पत्नी ने संभाली।
हाथ में गीता और कृपाण लेकर देश सेवा की कसम ली
श्रीबाबू को शुरुआती शिक्षा अपने पिता हरिहर सिंह से मिली। उन्होंने उर्दू और हिंदी सीखी। 1894 में गांव के स्कूल में पढ़ने जाने लगे। बाद में वह मुंगेर के जिला स्कूल में पढ़ने गए। पढ़ाई के दौरान उनका मन धीरे-धीरे राजनीति की ओर झुकने लगा। वह देश-दुनिया की राजनीति से जुड़ी किताबें पढ़ने लगे। लोकमान्य तिलक का 'मराठा' और 'श्री अरविंदो का 'वंदे मातरम' अखबार भी पढ़ने लगे। उनके मानस पर बंगाली और मराठी नेताओं के विचारों, लेखों और किताबों का असर दिखने लगा। वे क्रांति की ओर झुकने लगे और एक दिन तो गंगा नदी में खड़े होकर उन्होंने एक हाथ में गीता और दूसरे में कृपाण लेकर देश सेवा की कमस खा ली। उनकी कसम थी कि चाहे प्राण चले जाएं, देश सेवा की राह से कभी नहीं भटकूंगा।
गांधी जी के आंदोलन और कांग्रेस से जुड़े श्रीबाबू
श्रीबाबू ने साल 1913 में MA की डिग्री ली और फिर पटना के नेशनल कॉलेज में पढ़ाने लगे। लेकिन पितातुल्य बड़े भाई देवकीनंदन के कहने पर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और वकालत की पढ़ाई करने लगे। साल 1915 में उन्होंने डॉक्टरेट ऑफ लॉ की डिग्री ली और मुंगेर में ही प्रैक्टिस करने लगे। इस दौरान उनकी शादी भी हो गई और उनके दो बेटे शिवशंकर और बंदीशंकर भी हो गए। बात 1916 की है, जब वाराणसी के सेंट्रल हिंदू कॉलेज में एक सभा हुई और वहां श्रीबाबू भी मौजूद थे। यहां महात्मा गांधी ने भाषण दिया। वह गांधी जी के विचारों से काफी प्रभावित हुए और उनके आंदोलनों में भाग लेने लगे। 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन किया तो 1921 में श्रीबाबू भी इस आंदोलन से जुड़ गए और उन्होंने वकालत छोड़ दी। इस दौरान उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया और जेल से बाहर आने के बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए। इसी बीच उन्हें 'बिहार केसरी' भी कहा जाने लगा।

आधुनिक बिहार के निर्माता माने जाते हैं श्रीबाबू
बिहार के प्रधानमंत्री बने श्रीबाबू
फिर 1927 का साल भी आया, जब श्रीबाबू बिहार विधान परिषद के सदस्य बन गए और अब उनका नाम बिहार के बड़े नेताओं में लिया जाने लगा। साल 1937 में अंग्रेजों ने बिहार विधानसभा के चुनाव कराए और कांग्रेस को बहुमत मिला। अंग्रेजों ने मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी के मोहम्मद यूनुस को बिहार का प्रीमियर यानी प्रधानमंत्री बना दिया। बता दें कि उस समय राज्यों में मुख्यमंत्री नहीं, प्रधानमंत्री होते थे। कांग्रेस के घोर विरोध के बाद यूनुस को इस्तीफा देना पड़ा और कांग्रेस में विधायक दल का नेता चुनने के लिए जद्दोजहद शुरू हुई। अनुग्रह नारायण सिंह ने चंपारण सत्याग्रह में महात्मा गांधी का काफी साथ दिया था, इसलिए वह चाहते थे कि अनुग्रह नारायण सिंह को विधायक दल का नेता चुना जाए। महात्मा गांधी की चिट्ठी मिलने पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. राजेंद्र प्रसाद (देश के पहले राष्ट्रपति) ने जुलाई 1937 में पटना के सदाकत आश्रम में बैठक बुलाई। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने गांधी जी की मर्जी के अनुसार, अनुग्रह नारायण सिंह को नेता चुनने के लिए आग्रह किया। कांग्रेस नेता सर गणेश दत्त सिंह और किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती ने इस बात का विरोध किया और कहा कि अनुग्रह बाबू क्यों, श्रीबाबू क्यों नहीं? अनुग्रह नारायण सिंह राजपूत थे और उन्हें कायस्थ लॉबी से समर्थन मिल रहा था। उधर भूमिहार श्रीबाबू के समर्थन में ब्राह्मण गुट था। दरभंगा के तत्कालीन नरेश कामेश्वर सिंह ने भी श्रीबाबू का समर्थन किया। श्रीबाबू को समर्थन मिलता देख अनुग्रह बाबू ने स्वयं ही उनका नाम आगे बढ़ा दिया। इस तरह गांधी जी की मर्जी के खिलाफ श्रीबाबू बिहार के प्रधानमंत्री बन गए।
अनुग्रह नारायण सिंह पर श्रीबाबू का भरोसा
आजादी के बाद साल 1950 में देश में संविधान लागू हुआ तो राज्यों में प्रधानमंत्री के पद को मुख्यमंत्री पद में बदल दिया गया। इस तरह श्रीबाबू आजाद भारत में बिहार के पहले मुख्यमंत्री बन गए। साल 1952 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस को जबरदस्त सफलता हाथ लगी। एक बार फिर विधायक दल का नेता चुनने की बात होने लगी। राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद फिर से चाहते थे कि अनुग्रह नारायण सिंह को नेता चुना जाए। लेकिन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने श्रीबाबू का साथ दिया। दोनों खेमों में खूब लामबंदी हुई, आखिरकार जवाहर लाल नेहरू ने अनुग्रह नारायण सिंह से बात करके मामला सुलझा लिया। इस तरह श्रीबाबू बिहार के मुख्यमंत्री बने और अनुग्रह नारायण सिंह को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया, उनको वित्त मंत्रालय की भी जिम्मेदारी दी गई। श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू भले ही एक ही पार्टी में रहकर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हों, लेकिन एक-दूसरे पर भरोसा भी काफी था। श्रीबाबू कई बार अनुग्रह बाबू के लिए प्रोटोकॉल से बाहर जाकर भी काम कर देते थे।
अनुग्रह बाबू की दावेदारी और श्रीबाबू का दांव
बात फरवरी 1957 की है, जब बिहार में एक बार फिर विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस ने फिर से भारी मतों से जीत दर्ज की। इस बार अनुग्रह नारायण सिंह ने सीएम मद के लिए खुलकर अपनी दावेदारी पेश की थी। उन्हें विधायकों के समर्थन का पूरा भरोसा था। कहतें हैं सतर्क श्रीबाबू ने चुनाव से पहले ही मोरारजी देसाई से बात कर अनुग्रह नारायण सिंह के समर्थक उम्मीदवारों के टिकट कटवा दिए। चुनाव के बाद श्रीबाबू को 145 विधायकों का समर्थन मिला, जबकि अनुग्रह बाबू को सिर्फ 109 विधायकों ने समर्थन दिया। जीत के बाद श्रीबाबू के घर पर जश्न मन रहा था, अनुग्रह बाबू भी वहां पहुंचे और दोनों ने गले मिलकर साथ में आंसू बहाए और मतभेद भुलाने की कसम खाई।
एक परिवार एक टिकट
1957 के ही बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के कुछ बड़े नेता चाहते थे कि श्रीबाबू के बड़े बेटे शिवशंकर चुनाव लड़ें। लेकिन श्रीबाबू इस बात पर नहीं माने। उन्होंने साफ कहा कि मैं शिवशंकर को चुनाव लड़ाने के लिए तैयार हूं, लेकिन फिर मैं चुनाव नहीं लडूंगा। एक परिवार से एक ही व्यक्ति को चुनाव लड़ना चाहिए। यही कारण रहा कि उनके रहते उनके परिवार से कोई अन्य व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ा। इसके साथ ही उनका यह भी मानना था कि काम स्वयं बोलता है वोट मांगने की जरूरत नहीं है। शायद यही कारण रहा कि जनता ने उन पर हमेशा भरोसा दिखाया और वह कभी भी चुनाव नहीं हारे। हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि वह अपने निर्वाचन क्षेत्र को ऐसे ही छोड़ देते हों। आम दिनों में वह अपने चुनाव क्षेत्र में जाते थे। लेकिन वह अपने गांव में अपने सुरक्षाकर्मियों को लेकर नहीं जाते थे, बल्कि उन्हें गांव से दूर छोड़ देते थे। उनका मानना था कि उनके अपने गांव में उन्हें कोई खतरा नहीं है।

साल 1960 में एक मीटिंग के दौरान मुख्यमंत्री श्रीबाबू (फोटो साभार - Bihar chambers of commerce and Industries)
दलितों के लिए खुलवाए वैद्यनाथ धाम के कपाट
साल 1953 में गांधीवादी विनोबा भावे का भूदान आंदोलन चल रहा था। तब उन्हें पता चला कि देवघर के बाबा वैद्यनाथ धाम मंदिर में दलितों के जाने पर रोक है। उन्होंने दलितों के साथ जाने की कोशिश की तो मंदिर के पंडों ने उन्हें जाने नहीं दिया। विनोबा भावे वहीं सत्याग्रह पर बैठे तो पंडों ने उनके साथ मारपीट भी की। हंगामा होने पर मुख्यमंत्री श्रीबाबू ने स्वयं दलितों के साथ बाबा वैद्यनाथ धाम में प्रवेश करने का ऐलान कर दिया। हड़कंप मचने पर करीबियों और परिवारवालों यहां तक कि बड़े भाई देवकीनंदन सिंह ने भी उन्हें ऐसा करने से मना किया, लेकिन वह नहीं माने। 27 सितंबर 1953 को श्रीबाबू ने मंत्री विनोदानंद झा और 700 दलितों के साथ न सिर्फ मंदिर में प्रवेश किया, बल्कि पूजा भी की।
इंसुलिन का इंजेक्शन लगाकर खाते थे रसगुल्ले
श्रीबाबू के परपोते अनिल कुमार सिन्हा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके परदादा खाने के बड़े शौकीन थे। उन्होंने कहा कि उनके पिताजी बताते थे कि श्रीबाबू इंसुलिन का इंजेक्शन लगाकर रसगुल्ला खाते थे।
सीएम रहते बैठ गए अनशन पर
बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीबाबू चाहते थे कि बिहार में उर्वरक फैक्ट्री और रिफाइनरी लगे। लेकिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसके लिए दूसरे राज्य चुन रखे थे। इस पर श्रीबाबू अनशन पर बैठ गए और साफ-साफ कह दिया कि बिहार को ये प्रोजेक्ट नहीं मिले तो इस्तीफा दे दूंगा। उनकी इस जिद के बाद ही बरौनी में यह दोनों कारखाने खोले गए। अपने कार्यकाल के दौरान श्रीबाबू ने बोकारो स्टील प्लांट और बरौनी डेयरी शुरू करवाई। हटिया में भारी उद्योग निगम और गढ़हरा में एशिया का सबसे बड़ा रेलवे यार्ड बनवाया। भागलपुर के सबौर, समस्तीपुर के पूसा और रांची में एग्रीकल्चर कॉलेज बनवाए। इसके अलावा सड़कों का निर्माण तो हुआ ही। यही कारण है कि उन्हें आधुनिक बिहार का निर्माता कहा जाता है।
परिवार के लिए नहीं छोड़ी दौलत
मुख्यमंत्री रहते हुए 31 जनवरी 1961 को श्रीबाबू का निधन हो गया। उस समय उनके पास 24500 रुपये थे। जब उनकी तिजोरी खोली गई तो 4 लिफाफे निकले। जिसमें से एक में 20 हजार रुपये प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नाम थे। दूसरे लिफाफे में उजिहार हुसैन मुनीमी नामक दोस्त की बेटी के लिए 3 हजार रुपये, तीसरे लिफाफे में मंत्री महेश प्रसाद सिन्हा की छोटी बेटी की शादी के लिए 1 हजार रुपये और चौथे लिफाफे में भरोसेमंद नौकर के लिए 500 रुपये थे।
