बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के तहत प्रचार जोरों पर है और इसी के साथ हमारी स्पेशल 'मुख्यमंत्री' सीरीज भी आगे बढ़ रही है। इस सीरीज के तहत हम आपको बिहार के अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। आज इस कड़ी में बिहार के 17वें मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे की बारी है। ये वहीं बिंदेश्वरी हैं, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पसंद से मुख्यमंत्री बने थे। उनसे जुड़ा एक अहम किस्सा ये भी है कि उन्हें हराने के लिए बिहार के डॉक्टरों में प्रचार की कमान अपने हाथों में थाम ली थी। बात 1977 के विधानसभा चुनाव की है। देश आपातकाल के दौर से अभी बाहर निकला ही था। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बन चुकी थी और अब बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे थे। बिंदेश्वरी दुबे सातवीं बार बिहार की बेरमो सीट से उम्मीदवार थे। इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी को खुश करने के लिए बिंदेश्वरी दुबे ने जिस तरह से डॉक्टरों को सताया था, उसका बदला डॉक्टरों ने इस चुनाव में लिया। उन्होंने बिंदेश्वरी दुबे को हराने की ठान ली और उनके खिलाफ प्रचार में कूद गए। डॉक्टरों का बिंदेश्वरी दुबे के खिलाफ प्रचार जनता पार्टी के मिथिलेश कुमार के काम आया। जब चुनाव के नतीजे आए तो बिंदेश्वरी दुबे को लगभग 12 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा। चलिए जानते हैं बिंदेश्वरी दुबे और उनके सफर के बारे में विस्तार से -
बिंदेश्वरी दुबे का शुरुआती जीवन
14 जनवरी 1921 को भोजपुर जिले के महुआंव गांव में बिंदेश्वरी दुबे का जन्म हुआ था। उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था जो गांव के दुबे टोले में रहता था। लेकिन उनकी इस कहानी में एक ट्विस्ट ये है कि परिवार में दो जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ था, जिनमें से एक बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ और दूसरे की जान को भी खतरा था। पिता शिव नरेश और मां जानकी देवी ने बिंध्येश्वरी देवी से अपने बच्चे के लिए मन्नत मांगी। मां के आशीर्वाद से बचे बच्चे का नाम माता-पिता ने बिंदेश्वरी प्रसाद दुबे रख दिया। बिंदेश्वरी की शुरुआती पढ़ाई उनके गांव के स्कूल में हुई। पिता चाहते थे कि बिंदेश्वरी खेती-किसानी करे, लेकिन बिंदेश्वरी पढ़ना चाहते थे। एक दिन वह घर छोड़कर मामा के घर कटेया चले गए और मामा ने उनका एडमिशन पटना के माइकल हाई स्कूल में करवा दिया। अपना खर्च चलाने के लिए बिंदेश्वरी बच्चों को ट्यूशन बढ़ाते थे। 1936 में 10वीं बात करने के बाद वह साइंस कॉलेज चले गए। ट्यूशन के अलावा वह कारखाने में नाइट शिफ्ट भी करते थे। इसी दौरान उनकी शादी भी हो गई। पत्नी शिव शक्ति देवी से उन्हें चार बेटियां हुईं। 1938 में उनका सिलेक्शन पटना के बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में हो गया, जो आज NIT बिहार कहलाता है। बिंदेश्वरी जब फाइनल ईयर में थे तो पढ़ाई छोड़कर महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ गए। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उन्हें 2 साल जेल में काटने पड़े। रिहा होने के बाद वह बेरमो आ गए और कोयला खदानों में मैकेनिक का काम करने लगे। यहां मजदूरों पर अत्याचार होते देख वह बर्दाश्त नहीं कर पाए और नौकरी छोड़कर मजदूर नेता बन गए। फिर वह कोलियरी मजदूर संघ के वाइस-प्रेसिडेंट बन गए।
राजनीति में बिंदेश्वरी दुबे
इधर उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता भी ले ली और 1951 में उन्हें कांग्रेस के मजदूर संगठन इंटक से जुड़े कोलियरी मजदूर संघ का राष्ट्रीय संगठन मंत्री बना दिया गया। आजादी के साध रजवाड़े खत्म हो गए, लेकिन रियासतों व उनके राजाओं का रसूक नहीं। 1952 के पहले बिहार विधानसभा चुनाव में रामगढ़ रियासत के राजा कामाख्या नारायण सिंह ने 5 सीटों से चुनाव लड़ा। उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि उन्हें सभी सीटों पर जीत मिल गई। नियम के तहत वह सिर्फ एक सीट से विधायक रह सकते थे, इसलिए उन्हें चार सीटों से इस्तीफा देना पड़ा। उन्हीं चार में से एक सीट पेटरवार थी, जहां से कांग्रेस ने 31 साल के मजदूर नेता बिंदेश्वरी दुबे को टिकट दिया और वह चुनाव जीतकर विधायक बन गए। 1957 के चुनाव तक पेटरवार सीट का नाम बदलकर बेरमो हो गया। इस बार कामाख्या नारायण सिंह के रिश्तेदार ब्रजेश्वर प्रसाद सिंह के सामने बिंदेश्वरी दुबे हार गए। हालांकि, इसके बाद के अगले 4 चुनावों में बिंदेश्वरी ने बेरमो सीट से ही जीत दर्ज की। फिर 1973 का साल भी आया, जब 5 बार के विधायक बिंदेश्वरी दुबे, मुख्यमंत्री केदार पांडेय की सरकार में मंत्री (शिक्षा मंत्री) बन गए। एग्जाम्स में नकल रोकने के लिए बिंदेश्वरी ने राज्य की यूनिवर्सिटीज में IAS अधिकारियों को कुलपति बनाया।
संजय गांधी को खुश करने में सफल रहे बिंदेश्वरी दुबे
फिर वो समय भी आया जब 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा हो गई। उस समय बिहार में जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री थे। बिंदेश्वरी दुबे स्वास्थ्य मंत्री थे। केंद्र की सत्ता असल में संजय गांधी चलाने लगे थे और उन्होंने 5 सूत्री कार्यक्रम चलाया, जिसमें सबसे बड़ा काम परिवार नियोजन था। 'हम दो, हमारे दो' के नारे के साथ जनसंख्या नियंत्रण के लिए जबरन नसबंदी की जानी लगी। संजय गांधी न हर राज्य को नसबंदी का टार्गेट दे दिया। उस समय तमाम मुख्यमंत्री संजय गांधी को खुश करने के लिए एक तरह का कॉम्पटीशन करने लगे। जगन्नाथ मिश्र ने भी बड़ा टार्गेट लिया और स्वास्थ्य मंत्री बिंदेश्वरी दुबे के जिम्मे इस टार्गेट को पूरा करने की जिम्मेदारी आई। बिहार में सरकार अस्पतालों के साथ ही प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों पर भी दबाव बनाया गया। धड़ाधड़ छापे, मुकदमे और गिरफ्तारियां हुईं। इसमें दिहाड़ी मजदूर, बिना टिकट यात्रा करने वाले लोग, भिखारी, जेल के कैदी, घुम्क्कड़ साधु आदि किसी को नहीं बख्शा गया, सबकी नसबंदी की गई। ब्लॉक अफसर, टीचर्स, डॉक्टर, पुलिस सभी को इसमें शामिल किया गया। उन्हें कैश, चावल और प्रमोशन का लालच दिया गया और नौकरी से निकालने, सैलरी और प्रमोशन रोकने की धमकी भी दी गई। कहते हैं बिहार सरकार को 3 लाख नसबंदी का टार्गेट दिया गया था, लेकिन राज्य में 6.5 लाख नसबंदी की गई। बिंदेश्वरी दुबे ने 1976-77 के अंत तक 10 लाख नसबंदी का टार्गेट पूरा करने का आदेश दे दिया। इससे बिंदेश्वरी दुबे, संजय गांधी के चहेते बन गए।
विधानसभा चुनाव हारकर दिल्ली पहुंचे बिंदेश्वरी दुबे
बिंदेश्वरी दुबे सातवीं बार बेरमो सीट से चुनाव लड़े तो डॉक्टरों ने आपातकाल में हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए उनके खिलाफ प्रचार किया और उन्हें हराकर ही दम लिया। हालांकि, इस हार का बिंदेश्वरी दुबे पर ज्यादा असर नहीं पड़ा, क्योंकि संजय गांधी ने 1980 के लोकसभा चुनाव में उन्हें गिरिडीह से उम्मीदवार बना दिया। बिंदेश्वरी दुबे 26 हजार वोटों के अंतर से जीते और सांसद बनकर दिल्ली पहुंच गए। जून 1980 संजय गांधी की विमान हादसे में मृत्यु के बाद राजीव गांधी की भूमिका पार्टी में बढ़ गई और बिंदेश्वरी उनके भी करीब आ गए। 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को एकतरफा जीत मिली, लेकिन बिंदेश्वरी को लोकसभा चुनाव की टिकट नहीं मिली। जीत के बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने।
ऐसे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे बिंदेश्वरी दुबे
इधर बिहार में पार्टी चंद्रशेखर सिंह बनाम जगन्नाथ मिश्र के दो गुटों में बंट गई। राजीव गांधी ने इस गुटबाजी को खत्म करने के लिए साल 1984 में बिंदेश्वरी दुबे को बिहार कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर पटना भेज दिया। 1985 में बिहार विधानसभा चुनाव में बिंदेश्वरी पाठक का नाम उम्मीदवारों की लिस्ट में था। लेकिन इस बार वह बेरमो से नहीं बल्टी भोजपुर जिले की शाहपुर सीट से चुनाव लड़े। बिंदेश्वरी ने यहां से जीत दर्ज की। चुनाव के समय चंद्रशेखर सिंह मुख्यमंत्री थे और दूसरे गुट का नेतृत्व जगन्नाथ मिश्र कर रहे थे। दोनों प्रमुख दावेदार थे। लेकिन ऑब्जर्वर बंसीलाल ने दोनों गुटों को दरकिनार कर बिंदेश्वरी दुबे को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर दी। जगन्नाथ और चंद्रशेखर दोनों गुट बिंदेश्वरी दुबे के नाम पर राजी हो गए। इस तरह 12 मार्च 1985 को बिंदेश्वरी दुबे बिहार के 17वें मुख्यमंत्री बन गए।
'कुछ माफिया नेता मुझे कुर्सी से हटाना चाहते हैं'
बिंदेश्वरी दुबे मुख्यमंत्री बन चुके थे, लेकिन उनके काम में जगन्नाथ मिश्र की झलक दिखती थी। इस बात से राजीव गांधी भी नाराज हुए, जिसके बाद उन्होंने जगन्नाथ मिश्र से किनारा कर लिया। फिर दोनों नेताओं में दरार बढ़ने लगी। जगन्नाथ मिश्र ने मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। जगन्नाथ कहते थे, बिंदेश्वरी दुबे जनता और मजदूरों का भरोसा खो चुके हैं, वह पार्टी व राजीव गांधी के लिए बोझ बन गए हैं। जगन्नाथ ने बिंदेश्वरी को उनके गढ़ धनबाद से मात देने का प्लान बनाया। बिंदेश्वरी दुबे राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संगठन के अध्यक्ष थे। लेकिन 1986 में एक मीटिंग बुलाकर प्रस्ताव पास किया गया कि अब वे हमारे अध्यक्ष नहीं हैं। उनकी जगह सांसद शंकर दयाल सिंह को जिम्मेदारी दी गई और वह जगन्नाथ के करीबी थे। तब बिंदेश्वरी बोले ये अच्छा नाटक है, लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं। अगले ही दिन बिंदेश्वरी धनबाद पहुंचे और वहां कांग्रेस मजदूर संगठन ईंटक के कार्यक्रम में 2 मंच बने थे। लेकिन सीएम बिंदेश्वरी के मंच से ज्यादा भीड़ जगन्नाथ के मंच के सामने थी। उस समय बिंदेश्वरी ने कहा, कुछ माफिया नेता मुझे मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते हैं, क्योंकि मैंने उनके धंधे पर रोक लगा दी है।
वो काली रात और बिंदेश्वरी दुबे की उल्टी गिनती
फिर 29 मई 1987 की वो काली रात भी आई। जब औरंगाबाद जिले के दलेलचक और बघौरा नाम के दो गांवों में जातीय नरसंहार हुआ। नक्सली संगठन MCC के 500 लोगों ने यह नरसंहार किया। नरसंहार में 54 राजपूत और 1 हरिजन सहित 55 लोग मारे गए। 7 परिवार पूरी तरह खत्म हो गए। महिलाओं और लड़कियों के गैंगरेप हुए। कुछ महिलाओं से गैंगरेप के बाद कुल्हाड़ी से गर्दन काटकर गड्ढ़े में दफन कर दिया। घरों को आग लगा दी गई। आजादी के बाद यह बिहार में सबसे बड़ा जातीय नरसंहार था। 31 मई को मुख्यमंत्री वहां पहुंचे और वहां का मंजर देखकर और लोगों का दर्द सुनकर उनकी आंखों में भी आंसू थे। पटना लौटकर उन्होंने MCC पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया। लेकिन जनता का गुस्सा कम नहीं हुआ। विपक्ष बिंदेश्वरी दुबे को हटाने की मांग करने लगा और पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र अपने ही मुख्यमंत्री पर लापरवाही का आरोप लगा रहे थे। इसी के साथ बिंदेश्वरी के सीएम पद से विदायी की उल्टी गिनती भी शुरू हो गई थी।
फिर एक बाढ़ आई और बिंदेश्वरी की कुर्सी बहा ले गई
बिहार आज हर साल बाढ़ के कारण सुर्खियों में रहता है। इसी तरह अगस्त 1987 में भी बाढ़ के कारण बिहार सुर्खियों में था। एक रिपोर्ट के मुताबिक बाढ़ के चलते 3 करोड़ लोगों की जिंदगी बर्बाद हो गई थी। 20 लाख परिवार बेघर हो गए और लगभग 2 हजार लोगों की जान गई थी। बिहार के 39 में से 30 जिले बाढ़ से लगभग बर्बाद हो चुके थे। यहां तक कि राजधानी पटना भी बाढ़ में डूब गया था। इस दौरान विपक्ष के बड़े नेता अटल बिहारी वाजयेपी ने तंज कसा, बिहार में सिर्फ एक ही व्यक्ति सुरक्षित हैं और वह बिंदेश्वरी बाबू हैं। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने केंद्रीय मंत्री राजेश पायलट को पटना भेजा। उन्होंने राज्य सरकार के काम की समीक्षा की और दिल्ली आकर रिपोर्ट सौंपी, जिसे पढ़कर प्रधानमंत्री बिंदेश्वरी दुबे से नाराज हो गए। उन्होंने बिंदेश्वरी दुबे को दिल्ली बुलाया। बिंदेश्वरी वापस पटना तो लौटे, लेकिन इस डर के साथ कि कभी भी उनसे इस्तीफा मांगा जा सकता है। इस दौरान वह बाबाओं के चक्कर भी लगाने लगे। फरवरी 1988 में उन्हें फिर दिल्ली बुलाया गया और फिर उन्हें इस्तीफा देने के लिए राजी भी होना पड़ा। आखिर 13 फरवरी 1988 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वह 2 साल 338 दिन तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। इसी दौरान राजीव गांधी ने यूपी, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी मुख्यमंत्री बदले।
बिंदेश्वरी दुबे की आखिरी पारी
बिंदेश्वरी दुबे ने बिहार में मुख्यमंत्री बद से इस्तीफा दिया और उसी शाम उन्हें केंद्र सरकार में कानून मंत्री बना दिया गया। सिर्फ 2 महीने बाद ही वह राज्यसभा के लिए चुने गए। जून 1988 में उन्हें श्रम मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। 1989 में सत्ता बदली और जनता दल की सरकार बनी। फिर 2 साल में ही वह सरकार गिरी और कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई। पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री बने, लेकिन अब बिंदेश्वरी दुबे का राजनीतिक सफर ढलान पर था। राज्यसभा सांसद के तौर पर उनका कार्यकाल 1994 में समाप्त होने वाला था, लेकिन उससे पहले ही उनकी सेहत खराब हो गई। 20 जनवरी 1993 को 72 साल की उम्र में बिंदेश्वरी दुबे का निधन हो गया।
