मुख्यमंत्री : चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण वल्लभ सहाय, जिन्हें उनके एक काम से जमींदार अपना दुश्मन समझने लगे
- Authored by: Digpal Singh
- Updated Oct 9, 2025, 05:28 PM IST
Bihar Assembly Election 2025 की घोषणा हो चुकी है। इसी बहाने हम आपके लिए लेकर आए हैं मुख्यमंत्री सीरीज, जिसके तहत बिहार के अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों को याद किया जा रहा है। इसी कड़ी में आज बिहार के चौथे नंबर के मुख्यमंत्री कृष्ण वल्ल्भ सहाय की कहानी जानिए -
बिहार के चौथे मुख्यमंत्री, जिन्हें जमींदारी प्रथा खत्म करने का श्रेय जाता है
बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2025) की घोषणा हो चुकी है। बिहार में 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में मतदान होगा और 14 नवंबर को परिणाम घोषित किए जाएंगे। चुनावों को देखते हुए हम आपके लिए बिहार के अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानियां लेकर आ रहे हैं। इसी कड़ी में आज बिहार के चौथे मुख्यमंत्री रहे कृष्ण वल्लभ सहाय की कहानी लेकर आए हैं। वह एक ऐसे मुख्यमंत्री थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि जमींदार उन्हें अपना जानी दुश्मन समझते थे। आरोप तो यहां तक हैं कि जेपी की पैरवी पर उन्हें जवाहर लाल नेहरू ने शिखर तक पहुंचाया। चलिए जानते हैं बिहार के चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण वल्लभ सहाय के बारे में -
कृष्ण वल्लभ सहाय का शुरुआती जीवन
बिहार के चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण वल्लभ सहाय (केबी सहाय) का जन्म 31 दिसंबर 1898 को मौजूदा बिहार में पटना जिले के शेखपुरा में हुआ था। उनके पिता मुंशी गंगा प्रसाद उस समय भारतीय पुलिस में दरोगा थे। कृष्ण वल्लभ सहाय अपने माता-पिता के सबसे बड़े पुत्र थे। केबी सहाय ने साल 1919 में हजारीबाग के सैंट कोलंबिया कॉलेज से अंग्रेजी में बीए ऑनर्स की परीक्षा फर्स्ट क्लास में पास की।
स्वतंत्रता आंदोलन में केबी सहाय की भूमिका
केबी सहाय के पिता अंग्रेजी हुकूमत के मुलाजिम जरूर थे, लेकिन केबी ने भारत के स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने का विकल्प चुना। केबी ने 1930 के दशक में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया, जिसके लिए उन्हें 4 बार जेल भी जाना पड़ा। साल 1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो केबी तब डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा के साथ बिहार के लिए एक्शन प्लान पर काम कर रहे थे। उन्होंने हजारी बाग में स्वयं आंदोलन का नेतृत्व किया। उनके चुनावी राजनीति के करियर की शुरुआत साल 1937 में बिहार विधान परिषद के लिए चुने जाने के साथ हुई।
जमींदार क्यों समझते थे दुश्मन
साल 1937 में श्रीकृष्ण सिंह यानी श्रीबाबू ने जब पहली बार सरकार बनाई तो विधान परिषद के सदस्य केबी सहाय उनके सचिव बने। आजादी के बाद अंतरिम प्रांतीय सभा में भी वह श्रीबाबू के साथ रहें और श्रीबाबू ने उन्हें रेवेन्यू यानी राजस्व की जिम्मेदारी दी। रेवेन्यू के बहाने ही केबी सहाय ने राज्य से जमींदारी प्रथा के उन्मूलन की भी तैयारी कर ली। हालांकि, ये तैयारी आजादी के आंदोलन के समय ही शुरू हो गई थी। उस समय डॉ. राजेंद्र प्रसाद और जेबी कृपलानी जैसे बड़े कांग्रेस नेता भी देश से जमींदारी प्रथा को खत्म करने पर जोर दे रहे थे। केबी सहाय ने एक ड्राफ्ट बनाया और मुख्यमंत्री श्रीबाबू की कैबिनेट ने उस ड्राफ्ट को मंजूरी देकर एक्ट बना दिया। इस तरह देश से भी पहले बिहार में जमींदारी प्रथा खत्म हो गई। हालांकि, बाद में पटना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने यह एक्ट टिक नहीं पाया। लेकिन यह एक्ट दूसरे कानूनों के लिए रास्ता जरूर बना गया। इस सब में जमींदारों ने केबी सहाय को अपना दुश्मन मान लिया। तमाम जमींदार उनके खिलाफ इकट्ठा होने लगे।
जमींदारों से दुश्मनी के कारण मिली हार
जमींदारों ने केबी सहाय को अपना दुश्मन मान लिया था। जमींदारों की गोलबंदी के चलते ही साल 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में गिरडीह से आसानी से जीतने वाले केबी सहाय 1957 का चुनाव हार गए और कामाख्या नारायण सिंह को जीत मिली। अब केबी सहाय कांग्रेस संगठन तक सीमित रह गए। पांच साल के इंतजार के बाद साल 1962 के विधानसभा चुनाव में केबी सहाय ने पटना से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। अब तक पहले मुख्यमंत्री श्रीबाबू का निधन हो गया था और तीसरे मुख्यमंत्री विनोदानंद झा भी अपनी पकड़ मजबूत कर चुके थे। चुनाव के बाद विनोदानंद झा को ही मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन मछली कांड ने तत्कालीन मुंख्यमंत्री विनोदानंद झा और कांग्रेस की फजीहत करा दी।

केबी सहाय का स्टैच्यू
विनोदानंद झा के 'कामराज्ड' होने के बाद केबी सहाय को कमान
साल 1963 में कामराज प्लान लागू हुआ, जिसमें 10 साल से सत्ता में मौजूद नेताओं को संगठन में लाया जाना था। इस दौरान कई मुख्यमंत्रियों को इस्तीफा दिलाया गया, जिसमें विनोदानंद झा भी शामिल थे। विनोदानंद झा के इस्तीफे के बाद बिहार कांग्रेस में जोड़तोड़ शुरू हो गई, लेकिन किसी नाम पर सहमति नहीं बन पायी थी। विनोदानंद चाहते थे कि इस्तीफे के बाद भी सत्ता की कमान उनके ही हाथ में रहे। लेकिन उनकी तमाम कोशिशों और गुणा-भाग के बावजूद केबी सहाय के पक्ष में बात बन गई। 2 अक्टूबर 1963 को केबी सहाय बिहार के चौथे मुख्यमंत्री बने।
केबी सहाय के मंत्रिमंडल में पिछड़ों को जगह
केबी सहाय बिहार के मुख्यमंत्री तो बन गए थे, लेकिन कुछ ही महीनों में उनके लिए चुनौतियां खड़ी होने लगीं। मुख्यमंत्री बनने के लिए उनका समर्थन करने वाले महेश प्रसाद सिन्हा और सतेंद्र नारायण उनसे नाराज रहने लगे। इस तरह जब सवर्णों के दो मजबूत ब्लॉक उनसे खफा रहने लगे तो केबी सहाय ने पिछड़ों को कैबिनेट में जगह देकर काउंटर किया। इस दौरान रामलखन सिंह यादव उनके प्रिय थे। देवशरण सिंह (यादव), सुमित्रा देवी (कुशवाहा), अब्दुल कयुम अंसारी और कभी मुस्लिम लीग का हिस्सा रहे जफर इमाम जैसे लोगों को भी केबी सहाय ने अपने मंत्रिमंडल में जगह दी।
कांग्रेस ने पिछड़े वर्ग के नेताओं को मंत्री पद तो दिया, लेकिन शीर्ष यानी मुख्यमंत्री के पद पर दिल खोलकर जगह नहीं दी। उधर लोहिया के नेतृत्व में सोशलिस्ट खेमा लगातार पिछड़ों के हक की बात कर रहा था। यही वो वजह बनी, जिसके चलते 90 का दशक आते-आते यूपी-बिहार से कांग्रेस बाहर हो गई और फिर आज तक सत्ता में उसकी वापसी नहीं हुई।
पटना यूनिवर्सिटी में चली गोलियां
केबी सहाय लगभग साढ़े तीन साल यानी (3 साल, 154 दिन) तक मुख्यमंत्री रहे। इस बीच दिल्ली में पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का निधन हो गया, दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री बने और उनका भी निधन हो गया। अब केंद्र में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। सहाय की शिकायतें लगातार संगठन और सरकार तक पहुंच रही थीं। मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार व कमीशनखोरी के भी आरोप लग रहे थे। इस बीच फीस व अन्य मांगों को लेकर पटना यूनिवर्सिटी कैंपस में छात्रों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया। छात्रों का आंदोलन हिंसक हो गया और 5 जनवरी 1967 को यहां गोलियां चलीं, जिसमें कई छात्रों की मौत हो गई। इससे पूरे बिहार में केबी सहाय और उनकी सरकार के खिलाफ छात्र खड़े हो गए। हजारीबाग में उनके पैतृक घर और नवादा में उन पर भी हमला हुआ।
मुख्यमंत्री रहते हुए दोनों सीटों से चुनाव हार गए केबी
इस बीच 1967 के बिहार विधानसभा चुनाव हुए और जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। स्वयं केबी सहाय ने पटना पश्चिम और हजारीबाग दो सीटों पर चुनाव लड़ा और दोनों जगहों से हार गए। एक जगह से उन्हें हराने वाले प्रत्याशी ही बिहार के अगले मुख्यमंत्री भी बने। इसके बाद केबी सहाय की राजनीति ठंडे बस्ते में चली गई। 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ तो वह इंदिरा गांधी के उलट पुरानी कांग्रेस में ही रहे। हालांकि, 1974 वह विधान परिषद के लिए चुने गए, लेकिन कुछ ही समय बाद 3 जून, 1974 को पटना से हजारीबाग जाते समय एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
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