किसी परेशानी से जूझ रहे इंसान को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसपर राय-मशवरे भले विशेषज्ञ दें लेकिन आदमी करता वही है, जो उसे भाता है। साल 1987 की बात है, पटना में पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद और बड़े समाजवादी नेता रामजीवन सिंह और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी खाने पर बैठे हुए थे। अचानक रामजीवन सिंह का ध्यान कर्पूरी की उंगलियों की तरफ गया। उन्होंने अंगूठी पहन रखी थी। पूछने पर कर्पूरी बोले कि हाल ही में वे मुजफ्फरपुर गए थे, वहां किसी ने उन्हें सुझाव दिया कि ग्रह-नक्षत्रों को ठीक करने के लिए यह अंगूठी पहननी चाहिए। रामजीवन सिंह को यह जवाब पचा नहीं, उन्होंने कर्पूरी को कहा,'अगर कुछ बांधना है तो मन को बांधिए, तन को बांधने से कुछ नहीं होता।' पत्रकार संतोष सिंह और आदित्य अनमोल अपनी किताब 'जननायक कर्पूरी ठाकुर: बेजुबानों की आवाज' में लिखते हैं कि इस घटना के बाद कर्पूरी ठाकुर ने कोई टोटका नहीं आजमाया।
नेता प्रतिपक्ष के पद से हटा दिए गए थे कर्पूरी
यह वही साल था जब कर्पूरी ठाकुर को नेता प्रतिपक्ष के पद से हटा दिया गया था। तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष शिव चंद्र झा के सामने कर्पूरी की सारी दलीलें धरी रह गई थीं। इस घटना का कर्पूरी के ऊपर एक गहरा असर पड़ा। उन्होंने यह तक कह डाला था कि अगर वह यादव पैदा होते तो उनके साथ ऐसा व्यवहार न होता। इसके बाद भी वह विधानसभा में सक्रिय तो रहे लेकिन उनपर पिछड़ों के नेता का लगा तमगा लगने के कारण मन थोड़ा परेशान रहता था।

आकाशवाणी से संबोधन देते कर्पूरी (चित्र साभार: Jan Nayak Karpoori Thakur Memorial Museum)
6 महीने बाद ही हो गई मृत्यु
इस घटना के छह महीने बाद ही हाई ब्लड प्रेशर के मरीज कर्पूरी की देह हृदयाघात से बीत गई। अपने जीवन के किसी लक्ष्य को पाने के लिए जिस आदमी ने कभी किसी टोने-टोटके, ज्योतिष-मंदिर का सहारा नहीं लिया था उसके जीवनलीला के अंत का कारण एक टोटका ही साबित हुआ। लेकिन ये कोई मंत्र का टोटका नहीं था, यह टोटका था चिकित्सा का जो 17 फरवरी 1988 को जननायक की मौत का कारण बना।
क्या हुआ उस दिन
संतोष सिंह लिखते हैं कि बीती रात देर से सोने के बावजूद उस दिन कर्पूरी हमेशा की तरह सुबह साढ़े चार बजे उठे। सुबह की दिनचर्या पूरी करने के बाद वह देशरत्न मार्ग पर अपनी सैर के लिए निकल पड़े। लौटने के बाद लोगों से भेंट का सिलसिला शुरू हुआ, जिस दौरान उन्हें थोड़ी बेचैनी महसूस हुई।
उस दिन उन्हें समस्तीपुर जाना था, जहां पार्टी कार्यकर्ताओं ने सम्मान के तौर पर उन्हें सिक्कों से तौलने की योजना बनाई थी। सुबह के साढ़े 9 बजे आसपास कर्पूरी ठाकुर ने अपना तौलिया पकड़ा और बाथरूम की ओर बढ़े लेकिन जल्दी ही वापस लौट आए, उनकी छाती में तेज दर्द हो रहा था। कर्पूरी को तुरंत पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (PMCH) ले जाया गया। दोनों बेटे रामनाथ और बीरेंद्र के अलावा उनके साथ पूर्व मंत्नी सत्येंद्र नारायण सिन्हा और लालू प्रसाद भी थे।
रामनाथ ठाकुर कहते हैं, 'देवी लाल ने लोकदल को पूसा से समस्तीपुर के शाहपुर पटौरी तक यात्रा निकालने के लिए न्याय रथ (बस) मुहैया कराया था। एंबुलेंस की तलाश में समय बर्बाद करने के बजाय हम सबने बेहोश ठाकुर जी को बस में बिठाया लेकिन जब तक हम अस्पताल पहुंचे, डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।'

1977 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में कर्पूरी (Jan Nayak Karpoori Thakur Memorial Museum)
क्या था कर्पूरी की मौत का कारण
उन्हें दिल का दौरा पड़ा था, जो दो साल पहले 1985 में आए दौरे से कहीं तेज था। अस्पताल के बाहर ठाकुर के भरोसेमंद सहयोगी धनिक लाल मंडल गिट्टी के ढेर पर बैठकर रो रहे थे। शव को कर्पूरी के आवास पर लाया गया। क्या मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद और क्या मंगनी लाल मंडल, सबकी आंखें नम थीं। लालू प्रसाद यादव तो शव के पास बैठकर फूट-फूट कर रो रहे थे। लेकिन 64 की उम्र में जननायक यूं ही नहीं गए, हाई ब्लड प्रेशर के इस मरीज के जाने का कारण कहीं ना कहीं नमक का घोल था और उसे देने वाला स्वामी अतुलानंद।
कौन था स्वामी अतुलानंद
कर्पूरी के मौत के पांच दिन बाद तत्कालीन विधायक रघुवंश प्रसाद सिंह ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को पत्र लिखकर ठाकुर की मौत की उच्च स्तरीय जांच की मांग की। चिट्ठी की एक प्रति तत्कालीन मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद को भी भेजी गई थी। ये मांग यूं ही नहीं की गई थी, इसके पीछे एक बड़ा कारण था अतुलानंद नाम का एक शख्स, जो कर्पूरी की मौत के बाद से ही लापता था। अतुलानंद सहरसा जिले का रहने वाला एक आयुर्वेदाचार्य था और किसी राजनेता ने ही कर्पूरी ठाकुर से उसका परिचय करवाया था। बकौल बीरेंद्र ठाकुर, अतुलानंद और कर्पूरी की जान-पहचान 1985 से थी। स्वामी अतुलानंद की भूमिका पर शक तब हुआ जब कर्पूरी की मृत्यु के तुरंत बाद लंबे बाल वाला वह योगी अपने बाल मुंडवा कर लापता हो गया और कभी किसी को पता नहीं चल पाया कि वो कहां गया।

ठाकुर की शव यात्रा में उमड़ा लोगों का हुजूम (Jan Nayak Karpoori Thakur Memorial Museum)
बीपी का मरीज और 13 लीटर नमक का घोल
16 और 17 फरवरी को, यानी कर्पूरी की मौत के एक दिन पहले से ही अतुलानंद उनका उपचार कर रहा था। दो साल पहले एक हल्का दिल का दौरा झेल चुके हाई ब्लड प्रेशर वाले मरीज को उसने नमक घुला पानी पिलाकर उल्टी करवाने के लिए राजी भी कर लिया था। अब ये बात तो किसी से छुपी नहीं है कि नमक और हाई ब्लड प्रेशर के मरीज के बीच कैसा रिश्ता होता है। अतुलानंद की बातों का कर्पूरी पर कुछ ऐसा असर था कि उन्होंने अपने 1976 से निजी डॉक्टर रहे, डॉ. सी. पी. ठाकुर की सलाहों-चेतावनियों को दरकिनार कर दिया।
संतोष सिंह लिखते हैं कि 16 फरवरी, 1988 को स्वामी अतुलानंद ने कर्पूरी को खाली पेट 13 लीटर नमक घुला पानी पिलाया और उल्टी कराई। अगले दिन कर्पूरी की देह बीत गई।
लगे कयास, उठे सवाल लेकिन नहीं हुई जांच
रघुवंश प्रसाद सिंह ने कर्पूरी की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी को चिट्ठी लिखी और उसमें एक समाजशास्त्रीय अध्ययन का हवाला देकर मौत पर शक जताया। वह स्टडी दो साल पहले बिहार सरकार ने कराई थी जिसमें इसपर बात थी कि कर्पूरी ठाकुर के ना रहने पर बिहार की राजनीतिक स्थिति क्या होगी। इस पेपर को कर्पूरी की मौत से जोड़ा जाने लगा। चिट्ठी में एक गोपनीय पत्र का भी जिक्र था जिसे कर्पूरी ठाकुर ने 1984 में बिहार सरकार के तत्कालीन मुख्य सचिव के. के. श्रीवास्तव को लिखा था। जिसमें पटना में एक नेता के आवास पर कुछ लोगों के गुप्त बैठक और उन्हें मारने की प्लानिंग की बात कही गई थी। लेकिन इस चिट्ठी लिखने का कोई फायदा न हुआ।

कर्पूरी की पार्थिव देह के किनारे खड़े लालू प्रसाद (Jan Nayak Karpoori Thakur Memorial Museum)
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास ने भी 1994 में हाजीपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कर्पूरी ठाकुर की मौत के कारणों की उच्चस्तरीय जांच कराए जाने की मांग रखी, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने ऐसे सभी मुद्दों को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
किताब 'जननायक कर्पूरी ठाकुर: बेजुबानों की आवाज' में शम्बूक नामक मासिक हिंदी पत्रिका के 1999 में छपे एक लेख के हवाले से लिखा है ये सब एक साजिश के तहत हुआ। उच्च जातियों के षड्यंत्र की ओर इशारा करते उस लेख में लिखा था, कि नाई जाति के कर्पूरी ठाकुर दो बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। इससे उच्च जातियों को परेशानी हुई। षड्यंत्र की शुरुआत दिल्ली से हुई। वहां से पैसा जमा हुआ। एक फर्जी संन्यासी आया। उसने कर्पूरी के आवास में प्रवेश पाया। चापलूसी करके आयुर्वेदाचार्य ने ठाकुर का विश्वास जीत लिया। कर्पूरी की तबीयत ठीक नहीं थी, उनका रक्तचाप बढ़ा रहता था। प्राकृतिक चिकित्सा और जल चिकित्सा के बहाने उन्हें शिकार बनाया गया। नमक का गाढ़ा घोल दिया गया। कर्पूरी की जान चली गई...।
सारे शक, कयास धरे रह गए और जननायक के मौत की कभी जांच नहीं हुई। कर्पूरी के बेटे रामनाथ ठाकुर ने इसपर कहते हैं कि अब जांच करने के लिए बहुत देर हो चुकी है।
कर्पूरी के जाने के बाद बिहार की राजनीति में एक बड़ा शून्य बन गया था। इसको भरने की इबारत जो लिखी जानी थी वो कर्पूरी के शव के सामने ही लिखी गई और उदय हुआ राज्य के सबसे बड़े यादव नेता का। इसकी अगली कड़ी में जानेंगे बिहार में कैसे आया 'लालू-युग'।
