खाड़ी और पश्चिम एशिया में रहने वाले CBSE के 12वीं के छात्रों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी सुनवाई शुरू की है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और CBSE से जवाब मांगा है। ये याचिका उन रेगुलर छात्रों के लिए है जिनकी मार्च 2026 में ईरान-अमेरिका तनाव और युद्ध जैसी स्थिति की वजह से बोर्ड परीक्षा नहीं हो पाई थी। याचिका में 27 मार्च 2026 को CBSE की तरफ से जारी असेसमेंट स्कीम को चुनौती दी गई है। छात्रों का कहना है कि युद्ध और तनाव की वजह से उनकी पढ़ाई, मानसिक हालत और आगे की पढ़ाई की प्लानिंग सब बिगड़ गई। ऐसे में सिर्फ नॉर्मल फॉर्मूले से नंबर देना उनके साथ सही नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की। कोर्ट ने केंद्र और CBSE को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता को ये भी कहा गया है कि याचिका की कॉपी सॉलिसिटर जनरल को दें।
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छात्र क्या राहत मांग रहे हैं?
याचिका में कई मांगें रखी गई हैं:
- कम्पेन्सेटरी ग्रेस मार्क्स - युद्ध की वजह से हुई पढ़ाई की कमी को थोड़ा बैलेंस करने के लिएस्पेशल फ्रेश एग्जाम और स्पेशल इम्प्रूवमेंट एग्जाम का विकल्प छात्रों को बेहतर वाला रिजल्ट चुनने का मौका
- शिकायत निवारण सिस्टम - अगर किसी को रिजल्ट पर आपत्ति हो तो वो समय पर अपील कर सके
एडमिशन को लेकर भी टेंशन
छात्रों ने कहा कि अगर नंबर कम आए या रिजल्ट लेट हुआ तो उनका कॉलेज एडमिशन रुक सकता है। इसलिए कोर्ट से मांग की गई है कि यूनिवर्सिटी और काउंसलिंग एजेंसियों को कहा जाए कि इन छात्रों के लिए प्रोविजनल एडमिशन और स्पेशल काउंसलिंग का इंतजाम किया जाए, ताकि उनका साल खराब न हो।
पहले क्या हुआ था?
ससे पहले जून 2026 में CBSE ने खाड़ी देशों के प्राइवेट छात्रों के लिए अलग फॉर्मूला बनाया था। उसमें 10वीं के 40% और 12वीं के पिछले प्रदर्शन के 60% अंक जोड़े गए थे। अब वाली याचिका रेगुलर छात्रों के लिए है और उनका कहना है कि 27 मार्च वाली स्कीम उनकी असली परेशानी हल नहीं करती।अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर है। इस फैसले से हजारों भारतीय छात्रों का रिजल्ट, कॉलेज एडमिशन और पूरा साल तय होगा।
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