Career in Space Technology: आज का स्पेस सेक्टर केवल वैज्ञानिकों का क्षेत्र नहीं रह गया है। यह इंजीनियरों, डेटा साइंटिस्ट, AI विशेषज्ञों, रोबोटिक्स इंजीनियरों और डिजाइन विशेषज्ञों के लिए भी तेजी से अवसर पैदा कर रहा है। आज दुनिया का स्पेस इकोनॉमी बाजार 600 अरब डॉलर से ज्यादा का है और आने वाले वर्षों में एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। दुनिया में सैटेलाइट लॉन्चिंग, कम्युनिकेशन, अर्थ ऑब्जर्वेशन और स्पेस टेक्नोलॉजी में जबरदस्त मांग बढ़ रही है। यही वजह है कि अमेरिका में स्पेस X, रॉकेट लैब और ब्लू ओरिजिन जैसी कंपनियां अरबों डॉलर का कारोबार कर रही हैं।
भारत के पास कम लागत, उच्च तकनीक और अनुभवी वैज्ञानिकों की ताकत है। इसी के बल पर भारत इस बाजार का बड़ा हिस्सा हासिल कर सकता है। इन दिनों भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। एक समय था जब स्पेस सेक्टर का मतलब केवल ISRO माना जाता था, लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। आने वाले दशक में यही क्षेत्र भारत के सबसे तेजी से बढ़ते हाई-टेक करियर सेक्टर में शामिल होने वाला है। वैश्विक स्तर पर वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक स्पेस इकोनॉमी लगभग 770 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। आने वाले समय में स्पेस टेक्नोलॉजी इंजीनियर्स की डिमांड होगी। ऐसे में भविष्य के इस सुनहरे करियर ऑप्शन के लिए आज ही तैयार होना जरूरी है।
एयरोस्पेस इंजीनियरिंग और स्पेस टेक्नोलॉजी में क्या अंतर?
बहुत से छात्र इन दोनों को एक ही मान लेते हैं, जबकि दोनों का फोकस अलग है। एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का दायरा व्यापक होता है। इसमें हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर, फाइटर जेस, मिसाल, रॉकेट और ड्रोन भी शामिल होते हैं। इस शाखा में एयरोडायनामिक्स, एयरक्राफ्ट डिजाइन, प्रोपल्शन, फ्लाइट कंट्रोल और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग पढ़ाई जाती है। वहीं स्पेस टेक्नोलॉजी पूरी तरह अंतरिक्ष पर केंद्रित होती है। इसमें सेटेलाइट, लॉन्च व्हीकल, स्पेसक्राफ्ट, ऑरबिटल मशीन, स्पेस कम्यूनिकेशन, स्पेस रोबोटिक्स और डीप स्पेस मिशन जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। यानी अगर आपका सपना चंद्रयान, गगनयान या मंगल मिशन जैसी परियोजनाओं पर काम करना है, तो स्पेस टेक्नोलॉजी ज्यादा उपयुक्त विकल्प हो सकती है।
छात्रों के लिए करियर के अवसर
- स्पेस सेक्टर अब केवल रॉकेट बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें कई नए करियर उभर रहे हैं।
- उपग्रह डिजाइन इंजीनियर (Satellite Design Engineer)
- लॉन्च व्हीकल इंजीनियर (Launch Vehicle Engineer)
- अंतरिक्ष प्रणाली इंजीनियर (Space Systems Engineer)
- एवियोनिक्स इंजीनियर (Avionics Engineer)
- AI एवं डाटा साइंटिस्ट
- रिमोट सेंसिंग स्पेशलिस्ट (Remote Sensing Specialist)
- अंतरिक्ष रोबोटिक्स इंजीनियर (Space Robotics Engineer)
- अंतरिक्ष मिशन योजना विशेषज्ञ (Mission Planning Expert)
- अंतरिक्ष विनिर्माण इंजीनियर (Space Manufacturing Engineer)
निजी कंपनियों ने बदली तस्वीर
पहले अंतरिक्ष क्षेत्र में सरकारी एजेंसियों का दबदबा था, लेकिन अब निजी कंपनियां सबसे बड़े रोजगार देने वालों में शामिल हो रही हैं। अमेरिका की SpaceX कंपनी री यूज होने वाले रॉकेट के जरिए लॉन्च की लागत में भारी कमी लाई है। इसके कारण दुनिया भर में सैटेलाइट लॉन्च की संख्या तेजी से बढ़ी है। उसी तर्ज पर भारत में स्काईरूट एयरोस्पेस ने विक्रम-एस रॉकेट का सफल प्रक्षेपण कर यह साबित किया कि निजी कंपनियां भी स्पेस सेक्टर में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। कंपनी जल्द ही ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम 1 लॉन्च करने वाली है जो पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करने वाला भारत का पहला निजी रॉकेट होगा। कंपनी भविष्य में छोटे उपग्रहों के लिए नियमित लॉन्च सेवाएं देने की दिशा में काम कर रही है। इसके अलावा Agnikul Cosmos, Pixxel, Bellatrix Aerospace और Dhruva Space जैसी कंपनियां भी नए इंजीनियरों की मांग बढ़ा रही हैं।
कौन-सा कोर्स चुनें?
अगर आपका लक्ष्य उपग्रह, इसरो, अंतरिक्ष मिशन, प्रक्षेपण यान (लॉन्च व्हीकल) और अंतरिक्ष क्षेत्र के स्टार्टअप्स में काम करना है, तो स्पेस टेक्नोलॉजी आपके लिए अधिक उपयुक्त विकल्प हो सकती है।
कहां से करें पढ़ाई?
भारत में कई प्रमुख संस्थान इन क्षेत्रों में पढ़ाई कराते हैं।
- IIT Bombay
- IIT Kanpur
- IIT Madras
- IIT Kharagpur
- IIT Delhi
- Indian Institute of Space Science and Technology (IIST), तिरुवनंतपुरम
- IIT BHU (कुछ संबंधित कार्यक्रम)
- NITs और अन्य प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थान
भविष्य क्यों है उज्ज्वल?
भारत सरकार ने स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया है। IN-SPACe, NSIL और बढ़ते स्पेस स्टार्टअप इकोसिस्टम के कारण आने वाले वर्षों में हजारों नई नौकरियां बनने की संभावना है। 2030 तक 770 अरब डॉलर की वैश्विक स्पेस इकोनॉमी में भारत की हिस्सेदारी लगातार बढ़ेगी। इसका सीधा लाभ उन छात्रों को मिलेगा जो आज से स्पेस टेक्नोलॉजी, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और डेटा साइंस जैसी स्किल्स विकसित करेंगे।