कोविड-19 महामारी के संकट ने जहां पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था, वहीं इसी दौर में भारतीय युवाओं के इनोवेशन और जज्बे ने एक नया इतिहास भी रचा था। जो स्टार्टअप कंपनी शुरुआत में पानी के बिना सोलर पैनल साफ करने वाले रोबोट बना रही थी, महामारी के दौरान उसने अचानक अपनी दिशा बदल ली। आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) के दो विजनरी ग्रेजुएट—निखिल कुरेले और हर्षित राठौर ने संकट के उस कठिन दौर में केवल 90 दिनों के भीतर आईसीयू-ग्रेड वेंटिलेटर तैयार कर दिखाया और यह स्वदेशी वेंटिलेटर आगे चलकर भारत के अस्पतालों के लिए जीवन रक्षक साबित हुआ। आइए आज उसी रोबोटिक्स स्टार्टअप कंपनी के बारे में जानते हैं, जो अब देश की बड़ी मेडिकल टेक कंपनी में बदल गई है।
नोक्का रोबोटिक्स से हुई थी शुरुआत
वर्ष 2020 की शुरुआत तक नोक्का रोबोटिक्स (Nocca Robotics) का मेडिकल क्षेत्र या अस्पतालों से दूर-दूर तक कोई रिश्ता- नाता नहीं था। आईआईटी कानपुर से पढ़े निखिल कुरेले और हर्षित राठौर ने 2017 में अपनी अच्छी-खासी नौकरियां छोड़कर नोक्का रोबोटिक्स नाम से एक स्टार्टअप की स्थापना की थी। उनकी कंपनी का मुख्य काम सोलर पैनलों को बिना पानी के साफ करने वाले रोबोट्स तैयार करना था। यह तकनीक भारत के तेजी से बढ़ते रिन्यूबल एनर्जी के लिए काफी उपयोगी साबित हो रही थी और 2020 तक उनका बिजनेस काफी सुचारू रूप से चल रहा था। लेकिन फिर कोविड-19 महामारी आई और इस कंपनी की दिशा बदल गई।
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महामारी के संकट में वेंटिलेटर बनाने का बड़ा फैसला
साल 2020 में कोरोना महामारी के आगमन के साथ ही देश के अस्पतालों में गंभीर हालत में मरीजों की संख्या बढ़ने लगी और वेंटिलेटर की भारी कमी महसूस होने लगी। उस दौरान, जब पीएम और आईआईटी कानपुर के इनक्यूबेशन सेंटर ने स्टार्टअप्स से समाधान खोजने का आह्वान किया, तो निखिल और हर्षित ने तुरंत कदम आगे बढ़ाया। दोनों संस्थापकों को मेडिकल उपकरणों का कोई पूर्व अनुभव नहीं था। हर्षित ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी जिंदगी में पहले कभी वेंटिलेटर देखा तक नहीं था, लेकिन उन्होंने इसे सीखने, डॉक्टरों से परामर्श लेने और एक शुरुआती मॉडल बनाने का जोखिम उठाया।
90 दिनों में किया चमत्कार
यह छोटी सी पहल जल्द ही आईआईटी कानपुर वेंटिलेटर कंसोर्टियम में बदल गई, जिसमें देश के जाने-माने डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर और सलाहकार शामिल हुए। महज तीन महीने की रात-दिन की मेहनत के बाद टीम ने Noccarc V310 नामक एक अत्याधुनिक आईसीयू वेंटिलेटर तैयार किया गया। यह वेंटिलेटर मुख्य रूप से भारतीय कलपुर्जों यानी स्पेयर पार्ट्स से बनाया गया था, जो विदेशी मशीनों की तुलना में काफी सस्ता और गंभीर मरीजों के इलाज में पूरी तरह से सक्षम था। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान जब वेंटिलेटरों की मांग अपने पीक पर थी, तब निखिल और हर्षित द्वारा बनाए गए स्वदेशी वेंटिलेटर ने हजारों लोगों की जान बचाई।
रोबोटिक्स से मेडिकल टेक तक का नया सफर
इस आपातकालीन प्रोजेक्ट ने कंपनी का पूरा स्वरूप ही बदल दिया, जिसके बाद कंपनी के नाम नोक्का रोबोटिक्स' से बदलकर 'नोक्कार्क रोबोटिक्स' किया गया। अपने इनोवेशन के बाद इस कंपनी ने देशभर के अस्पतालों में 260 से अधिक आईसीयू वेंटिलेटर की आपूर्ति की। आज नोक्कार्क में 50 से अधिक कर्मचारी काम कर रहे हैं और इसके मेडिकल उपकरण बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को सीधी चुनौती दे रहे हैं। निखिल कुरेले की इस उपलब्धि के कारण उनका नाम फोर्ब्स 30 अंडर 30 की लिस्ट में शामिल किया गया है।
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फाउंडर्स का सफर
इस सफलता के पीछे दोनों संस्थापकों की कड़ी मेहनत और तकनीकी समझ नजर आती है। आइए इनके सफर के बारे में जानते हैं। सबसे पहले निखिल कुरेले की बात करें तो वह मध्य प्रदेश के शहरजोल के रहने वाले हैं। वह बचपन से ही गणित में काफी तेज थे। 10वीं में उन्होंने 96 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे, जिसके बाद वह कोटा गए और 2012 में आईआईटी कानपुर में मैकेनिकल इंजीनियरिंग कोर्स में प्रवेश प्राप्त किया।
2016 में अपनी ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद उन्होंने बजाज ऑटो से अपने करियर की शुरुआत की, लेकिन उनका सपना जॉब करना नहीं, बल्कि बिजनेस शुरू करन का था, जो उन्होंने किया भी। अब बात करें हर्षित राठौर की तो, उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय से पढ़े थे। 2016 में उन्होंने आईआईटी कानपुर से केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त कि और टाटा मोटर्स में इंटर्नशिप कर करियर की शुरुआत की और बाद में एक मैकेनिकल डिजाइन इंजीनियर के तौर पर कार्य किया। बाद में दोनों ने मिलकर एक स्टार्टअप की शुरुआत की जो मेडिकल टेक के जगत में कमाल कर रहा है।
