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Countries Without Trees: दुनिया के वो देश, जहां नहीं एक भी पेड़? जानें क्या है इस कमी के पीछे का रहस्य

Countries Without Trees: पेड़ पौधे के बिना दुनिया की कल्पना मुश्किल है, लेकिन पृथ्वी पर कई देश ऐसे हैं, जहां एक भी पेड़ नहीं है। आइए आपको उन देशों के बारे में बताएं।

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Countries Without Trees

Countries Without Trees: पेड़-पौधों के बिना दुनिया की कल्पना करना भी मुश्किल है। जब भी किसी स्थान की कल्पना की जाती है वहां हरियाली जरूर होती है। दुनिया के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में पेड़ों की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान मानी जाती है। ये न केवल हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर जलवायु को संतुलित रखने में भी मददगार होते हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के आंकड़ों के अनुसार, हमारी धरती का लगभग 31 प्रतिशत हिस्सा वनों से कवर है। लेकिन अगर हम कहें कि कुछ देश ऐसे भी हैं, जहां एक भी पेड़ नहीं तो क्या आप मानेगें। नहीं न... लेकिन यह सच है। दुनिया में कई स्थान है, जहां एक भी पेड़ (Country With No Forest) नहीं है। लेकिन इसकी वजह क्या है आइए जानें।

क्या है यहां पेड़ की कमी की वजह

पेड़ों की इस कमी के पीछे मुख्य रूप से भौगोलिक परिस्थितियां, अत्यधिक शहरीकरण और मानवीय हस्तक्षेप है। आइए आप दुनिया के उन देशों के बारे में बताएं यहां एक भी पेड़ नहीं है और उनकी वजह।

देशजंगल का अनुमानित प्रतिशतप्रमुख कारण
क़तर, कुवैत, बहरीन0%रेगिस्तानी जलवायु और शुष्कता
ग्रीनलैंड0%अत्यधिक ठंड और बर्फबारी
मोनाको, वेटिकन सिटी0%पूर्ण शहरीकरण
सैन मैरिनो0%सीमित पहाड़ी क्षेत्र
माल्टा, नौरू, हैती<1%खनन, पथरीली ज़मीन और वनों की कटाई

रेगिस्तानी जलवायु

खाड़ी देशों जैसे कतर, बहरीन और कुवैत में जंगलों का प्रतिशत शून्य यहां की गर्म जलवायु और शुष्क रेगिस्तानी की वजह से है। यहां सालाना बारिश बहुत ही कम होती है। इन देशों में रेतीली और खारी मिट्टी पाई जाती है, जिसमें विशाल पेड़ों का प्राकृतिक रूप से पनपना असंभव है। यहां तेज गर्म हवाएं और पानी की कमी वनों के विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं। वहीं बात करें बहरीन की तो यहां की सूखी धरती पर जो भी हरियाली नजर आती है, वह आधुनिक सिंचाई तकनीक और लैंडस्केपिंग प्रोजेक्ट्स का परिणाम है। प्राकृतिक रूप से यहां एक भी घना जंगल मौजूद नहीं है।

जमा देने वाली ठंड

दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप ग्रीनलैंड उन चुनिंदा स्थानों में शामिल है जहां एक भी पेड़ नहीं है। इसकी वजह है कि यहां अधिकांश भूमि साल भर मोटी बर्फ की चादरों से ढकी रहती है। अत्यधिक कम तापमान और जमा देने वाली ठंड के कारण बड़े पेड़ यहां की मिट्टी में जड़ें नहीं जमा पाते।

अत्यधिक शहरीकरण

मोनाको और वेटिकन सिटी जैसे देशों में पेड़ों की कमी का कारण प्रकृति नहीं, बल्कि उनकी बनावट और सीमित क्षेत्रफल है। यह दुनिया का सबसे घनी आबादी वाला और शहरीकृत देश है। यहां आलीशान इमारतों और सड़कों के जाल के बीच प्राकृतिक वनों के लिए कोई खुली जमीन बाकी नहीं रह गई है। वहीं वेटिकन सिटी की बात करें तो दुनिया का सबसे छोटा देश होने के नाते, यह पूरी तरह से ऐतिहासिक निर्माणों से घिरा हुआ है। यहां की हरियाली केवल सजावटी बगीचों तक सीमित है, जो पूरी तरह से मानव-निर्मित हैं।

मानवीय हस्तक्षेप और पर्यावरणीय नुकसान

नौरू और हैती उन देश में से एक है, जहां कभी हरियाली हुआ करती थी, लेकिन मनुष्य की गतिविधियों ने उसे नष्ट कर दिया। अंधाधुंध खनन और कोयला बनाने और वनों की अनियंत्रित कटाई के कारण यहां का इकोसिस्टम पूरी तरह से चरमरा गया है।

भौगोलिक चुनौतियां

माल्टा और सैन मैरिनो जैसे देशों में भौगोलिक बनावट पेड़ों के विकास के अनुकूल नहीं रही है। माल्टा में पथरीली जमीन और सैन मैरिनो छोटा सा पहाड़ी क्षेत्र है। यहां शुष्क मौसम के कारण घने जंगलों का अभाव है।

Varsha Kushwaha
वर्षा कुशवाहाauthor

वर्षा कुशवाहा टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की एजुकेशन डेस्क पर बतौर कॉपी एडिटर कार्यरत हैं और पिछले 5 वर्षों से मीडिया में सक्रिय हैं। जर्नलिज़्म में पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा पूरा करने के बाद उन्होंने न्यूज रूम में तेजी, सटीकता और गहराई के साथ काम करते हुए अपनी मजबूत संपादकीय पहचान बनाई है। वर्षा की विशेषज्ञता हाइपर-लोकल खबरों, इवेंट कवरेज और स्टेट पॉलिटिक्स से जुड़ी रिपोर्टिंग में भी है। अब तक वर्षा कुशवाहा 8,000 से अधिक खबरें लिख चुकी हैं, जिनमें कई अहम लोकल रिपोर्ट्स, एजुकेशन और करियर की खबरें तथा फीचर-आधारित स्टोरीज शामिल हैं।

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