Ahilyabai Holkar Jayanti 2025 Speech, Bhashan in Hindi: नारी शक्ति की प्रतीक, राष्ट्र, धर्म और संस्कृति की पुनर्स्थापना की अग्रदूत देवी अहिल्याबाई होल्कर ने विदेशी आक्रांताओं के कालखंड में जिस साहस, भक्ति और समर्पण से काशी से लेकर रामेश्वरम तक देश के अनेक तीर्थस्थलों का पुनरोद्धार कराया वह भारतीय इतिहास का अद्वितीय अध्याय है। अहिल्याबाई का जन्म 31 मई 1725 को चोंडी, अहमदनगर (महाराष्ट्र) में हुआ था। मात्र आठ वर्ष की उम्र में वे राजवधु बनकर इंदौर आ गई। उनका पूरा जीवन विषमता से भरा रहा। वे केवल 29 वर्ष की थीं तभी पति महाराज खांडेराव वीरगति को प्राप्त हो गये। 1766 में पितृवत स्नेह देने वाले मल्हार राव होलकर का निधन हुआ और इसके बाद पुत्र मालेराव का निधन और फिर दोहित्र का निधन, फिर दामाद का निधन और बेटी का सती होना, उन्होंने झेला।
बावजूद इसके आदर्श शासिका बनकर अहिल्याबाई होल्कर ने अपने शासनकाल में देश भर में धार्मिक स्थलों का विकास किया। सोमनाथ मंदिर, बद्रीनाथ धाम, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी, द्वारिका और मथुरा में श्रीकृष्ण मंदिर का निर्माण कराया। वाराणसी में विश्वनाथ विष्णु धाम मंदिर और मणिकर्णिका घाट का निर्माण भी उनकी देन है। लोकमाता अहिल्याबाई केवल काशी तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने केदारनाथ धाम, रामेश्वरम्, सोमनाथ, हरिद्वार, महिष्मति और देश के अनेक तीर्थस्थलों के जीर्णोद्धार का कार्य किया। उन्होंने नदियों के घाटों, कुओं और बावड़ियों का निर्माण करवाया ताकि श्रद्धालुओं को सुविधा मिले और शुद्ध पेयजल की उपलब्धता बनी रहे।
कौन थीं अहिल्याबाई होल्कर
देवी अहिल्या बाई होल्कर का जीवन समाज, संस्कृति और राष्ट्र के लिए समर्पित रहा। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व भारत की अमोल निधि है। उन्हें समाज ने पुण्य-श्लोका, लोकमाता, मातोश्री, न्यायप्रिया, प्रजावत्सला, राजमाता आदि से संबोधित किया। उनकी कार्य शैली, व्यवहार, कर्म-कर्तव्य का पालन, विपरीत और विषम परिस्थिति में भी स्थिर रहना, उचित समय पर उचित निर्णय, दूरदृष्टि, संकल्प की दृढ़ता, प्रशासनिक कौशल अद्भुत था।
अहिल्याबाई होल्कर के कार्य
जिस तरह पूज्य शंकराचार्य जी ने चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना कर सनातन संस्कृति को पुनर्स्थापित किया। ठीक उसी तरह देवी अहिल्याबाई होलकर ने पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक सांस्कृतिक गौरव की पुनप्रतिष्ठा की तथा भारत को एक सूत्र में पिरोया। व्यक्ति निर्माण, समाज निर्माण, नारी सशक्तिकरण, प्रकृति-पर्यावरण संवर्धन और भारत के सांस्कृतिक गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा का जो कार्य अहिल्याबाई होलकर ने किया यह उनके विराट व्यक्तित्व का परिचय कराता है।
अहिल्याबाई एक कुशल सैन्य संचालक भी थीं। वे तलवार, भाला और तीर कमान चलाने में निपुण थी। वे हाथी पर बैठकर युद्ध करती थीं। अहिल्याबाई की दृष्टि में जन्म, जाति, वर्ग या वर्ण से परे योग्यता महत्वपूर्ण थी। सामाजिक समरसता के इस सिद्धांत की झलक उनके मंत्रि-परिषद, उनके द्वारा बसायी गई बस्तियों में, सुरक्षा टोलियों के गठन और कृषि भूमि आवंटन में दिखती है। वे अपने व्यक्तिगत जीवन में जितनी शांत, सरल और भावनात्मक थीं, राजकाज और राष्ट्र संस्कृति की रक्षा में उतनी ही संकल्पनिष्ठ और दृढ़ प्रतिज्ञ।
अहिल्याबाई होल्कर का जीवन
आज के समय में हम सभी को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर समाज और देश के उत्थान के लिए कार्य करने की आवश्यकता है। हमें महारानी अहिल्याबाई के जीवन से प्रेरणा लेकर भारत के प्राचीन गौरव और सनातन संस्कृति के उत्कर्ष में संपूर्ण मनोयोग से समर्पित होना चाहिए। लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की स्मृति को नमन करना केवल एक ऐतिहासिक दायित्व नहीं है, बल्कि सनातन धर्म, भारतीयता और राष्ट्र के पुनर्निर्माण की उस चेतना को पुनः जागृत करने का अवसर है, जिससे भारत विश्वगुरु बने।
