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Gurugram: मुठभेड़ में लगी गोली, घायल STF इंस्पेक्टर की मौत; 4 अपराधियों को उतारा था मौत के घाट

उत्तर प्रदेश के शामली में पुलिस एसटीएफ और अपराधियों के बीच हुई मुठभेड़ में घायल एसटीएफ के इंस्पेक्टर सुनील कुमार की गुरुग्राम में मौत हो गई। 21 और 22 जनवरी की दरमियानी रात हुई मुठभेड़ में चार अपराधी भी मारे गए थे।

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एसटीएफ इंस्पेक्टर सुनील कुमार की मौत

गुरुग्राम: यूपी के शामली जिले में मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल हुए उत्तर प्रदेश पुलिस की ‘स्पेशल टास्क फोर्स’ (एसटीएफ) के निरीक्षक की बुधवार को गुरुग्राम के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। पुलिस सूत्रों ने बताया कि शामली के झिंझिना इलाके में 21 और 22 जनवरी की दरमियानी रात हुई मुठभेड़ में पुलिस निरीक्षक सुनील कुमार (54) को कई गोलियां लगी थीं। एसटीएफ के साथ मुठभेड़ में एक वांछित अपराधी और उसके तीन साथी मारे गए थे। इस दौरान सुनील को पेट में तीन गोलियां लगीं। उन्हें पहले हरियाणा के करनाल के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बाद में उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया।

लिवर में गोली लगने से मौत

सूत्रों के अनुसार मेदांता में चिकित्सकों ने सुनील के लिवर में गोली लगने की वजह से उनकी सर्जरी शुरू की थी। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि ऑपरेशन के दौरान बुधवार को सुनील की मौत हो गई। कुमार साल 1990 में एक कांस्टेबल के रूप में प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (पीएसी) में शामिल हुए थे और 2002 में हेड कांस्टेबल के रूप में पदोन्नत हुए थे।

बाद में वह 2011 में पदोन्नति होने पर प्लाटून कमांडर बने। वह 2020 में "दलनायक" के रूप में पदोन्नत किये गए। वह 2009 से एसटीएफ के लिए काम कर रहे थे और उन्हें उनकी बहादुरी के लिए कई पुरस्कार मिले। अधिकारियों ने बताया कि कुमार का शव मेरठ जिले के उनके पैतृक गांव मसूरी ले जाया जाएगा। उनके परिवार में उनकी पत्नी और दो बच्चे हैं।

Pushpendra kumar
पुष्पेंद्र कुमारauthor

पुष्पेंद्र कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में चीफ कॉपी एडिटर के रूप में सिटी डेस्क पर कार्यरत हैं। जर्नलिज्म में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद से वे पिछले 7 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में जुड़े हैं। इस दौरान उन्होंने 10,000 से अधिक खबरें लिखी हैं। पुष्पेंद्र हाइपर-लोकल मुद्दों, रेलवे, रोड, इंफ्रास्ट्रक्चर, डेवलपमेंट, कृषि और मौसम से जुड़ी खबरों पर गहरी पकड़ रखते हैं। शहर से लेकर गांव-देहात तक की संवेदनशीलताओं को समझते हुए वे लोकल खबरों को ऐसा रूप देते हैं जो न केवल तथ्यपूर्ण होता है, बल्कि पाठकों से भावनात्मक रूप से भी जुड़ता है।

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