शहरों में सार्वजनिक परिवहन महिलाओं के लिए रोजमर्रा की जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कामकाजी महिलाएं, छात्राएं, घरेलू कामगार और अन्य यात्री बस, मेट्रो, ऑटो, ई-रिक्शा और लोकल ट्रांसपोर्ट के जरिए हर दिन सफर करती हैं। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन की सुरक्षा का सवाल केवल वाहन के भीतर होने वाली घटनाओं तक सीमित नहीं है। बस स्टॉप तक पहुंचने से लेकर वाहन में चढ़ने, सफर करने और गंतव्य तक उतरने के बाद सुरक्षित पहुंचने तक पूरी यात्रा को सुरक्षित बनाना जरूरी है।
ऐसे में राजधानी दिल्ली और उससे सटे नोएडा में चलती बस में नाबालिग के साथ हाल ही में हुई दरिंदगी की घटना के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। जिनमें सबसे प्रमुख है कि क्या सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा के लिए सामान्य Safety Audit से अलग एक विशेष Women Safety Audit होना चाहिए? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने आधी आबादी की भी राय जानी। आइए जानते हैं क्या है उनकी राय...
सामान्य Safety Audit और Women Safety Audit में क्या फर्क?
परंपरागत ट्रांसपोर्ट सेफ्टी ऑडिट में आमतौर पर सड़क की स्थिति, वाहन की तकनीकी सुरक्षा, दुर्घटना की संभावना, ट्रैफिक व्यवस्था और आपातकालीन इंतजामों पर ध्यान दिया जाता है। लेकिन महिलाओं के सामने आने वाले सुरक्षा जोखिम कुछ अलग हो सकते हैं इसलिए महिलाओं के लिए सेफ्टी ऑडिट को केवल सुरक्षा उपकरणों की मौजूदगी जांचने के बजाय महिला यात्रियों के वास्तविक अनुभव को केंद्र में रखना चाहिए।उदाहरण के लिए, किसी बस स्टॉप पर सड़क की गुणवत्ता अच्छी हो सकती है, लेकिन अगर वहां पर्याप्त रोशनी नहीं है, आसपास सुनसान इलाका है या रात में सार्वजनिक गतिविधि नहीं होती, तो महिला यात्रियों के लिए वह स्थान असुरक्षित महसूस हो सकता है। इसी तरह बस में CCTV लगा होना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि कैमरा वास्तव में काम कर रहा है या नहीं, उसकी रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी जाती है या नहीं और किसी शिकायत की स्थिति में फुटेज तक पहुंचने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
सेफ्टी ऑडिट में किन चीजों की होनी चाहिए जांच?
महिलाओं के लिए अलग से सेफ्टी ऑडिट में कम से कम पांच स्तरों पर जांच होनी चाहिए।
बस स्टॉप और स्टेशन की सुरक्षा
बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन या मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने वाले रास्ते की भी सुरक्षा जांच होनी चाहिए। इसमें जांचना चाहिए कि
- पर्याप्त स्ट्रीट लाइट है या नहीं?
- रात में वहां पर्याप्त रोशनी रहती है या नहीं?
- आसपास CCTV कैमरे हैं?
- आपात स्थिति में मदद मांगने की व्यवस्था है?
- बस स्टॉप सुनसान जगह पर तो नहीं?
- वहां से पैदल निकलने का सुरक्षित रास्ता है या नहीं?
- महिलाओं की सुरक्षा के लिए Last Mile Safety को ऑडिट का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
वाहन के भीतर की सुरक्षा
दूसरे चरण में बस या अन्य सार्वजनिक वाहन में सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ CCTV लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बल्कि ऑडिट में यह चेक करना चाहिए कि
- CCTV वास्तव में काम कर रहा है या नहीं।
- वाहन में पर्याप्त रोशनी है या नहीं।
- इमरजेंसी बटन या अलार्म काम कर रहा है या नहीं।
- ड्राइवर और कंडक्टर की पहचान स्पष्ट रूप से प्रदर्शित है या नहीं।
- शिकायत करने के लिए हेल्पलाइन या QR कोड उपलब्ध है या नहीं।
- दरवाजे और अन्य सुरक्षा उपकरण सही स्थिति में हैं या नहीं।
ड्राइवर और कंडक्टर की जवाबदेही
महिला सुरक्षा में मानव व्यवहार सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। इसलिए ड्राइवर और कंडक्टर के लिए ड्राइविंग या ऑपरेशनल ट्रेनिंग के साथ ही उन्हें लैंगिक संवेदनशीलता, महिला उत्पीडन पर प्रतिक्रिया और किसी भी आपात स्थिति से निपटने की ट्रेनिंग भी दी जानी चाहिए। जैसे अगर किसी महिला यात्री को उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, तो चालक या कंडक्टर को यह पता होना चाहिए कि तुरंत क्या कार्रवाई करनी है, वाहन कहां रोकना है और संबंधित एजेंसी या पुलिस को कैसे सूचना देनी है।शिकायत व्यवस्था कितनी आसान है?
कई बार सुरक्षा व्यवस्था इसलिए प्रभावी नहीं होती क्योंकि शिकायत दर्ज करना ही मुश्किल होता है। महिला यात्री को यह पता होना चाहिए कि घटना होने पर वह कहां और कैसे शिकायत कर सकती है। इसके साथ ही हर शिकायत का ट्रैकिंग नंबर हो और यात्री यह देख सके कि उसकी शिकायत किस स्तर पर पहुंची है।अनुभव भी हैं महत्वपूर्ण
इन सारे उपायों के साथ ही Women Safety Audit में रोज सफर करने वाली महिला यात्रियों की राय को भी शामिल करना चाहिए। सरकार या परिवहन एजेंसियां इसके लिए नियमित रूप से सर्वे कर सकती हैं-
- महिलाएं किस रूट को असुरक्षित मानती हैं?
- दिन और रात में सुरक्षा की स्थिति में कितना अंतर है?
- किन बस स्टॉप पर सबसे ज्यादा असहजता महसूस होती है?
- क्या महिलाएं किसी खास समय पर सार्वजनिक परिवहन से बचती हैं?
- शिकायत करने के बाद उन्हें कैसी प्रतिक्रिया मिली?
वूमेन सेफ्टी ऑडिट को लेकर आधी आबादी की क्या है राय?
पब्लिक ट्रांसपोर्ट में महिलाओं के लिए अलग से सेफ्टी ऑडिट को लेकर हमने ऑफिस या रोजमर्रा के कामों के लिए सार्वजनिक परिवहन का सहारा लेने वाली लड़कियों और महिलाओं से भी बात की। जहां उन्होंने अपनी राय साझा की। इनमें आईटी सेक्टर में काम करने वाली अक्षिता ने महिलाओं के लिए अलग से सेफ्टी ऑडिट का समर्थन किया।अक्षिता के अनुसार, 'सुरक्षा का मतलब सिर्फ सड़क पर आधी आबादी के खिलाफ होने वाले अपराध को रोकना भर नहीं है, बल्कि महिलाओं को बिना डर और झिझक के सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने का भरोसा देना भी उतना ही जरूरी है। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे महिलाएं हर समय खुद को सुरक्षित महसूस करें।'
महिलाओं से जुड़े पहलुओं को अलग से किया जाए चिन्हित- व्याख्या
वहीं, सॉफ्टवेयर इंजीनियर व्याख्या तिवारी का कहना था कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट में महिलाओं की सुरक्षा के लिए अलग से सेफ्टी ऑडिट होना चाहिए। इसमें खास तौर पर लाइटिंग, सीसीटीवी कैमरे, इमरजेंसी रिस्पॉन्स, छेड़छाड़ और रात में सफर के दौरान महिलाओं को होने वाली परेशानियों की जांच की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि महिलाओं से जुड़े इन पहलुओं को अलग से चिन्हित करने से सुरक्षा व्यवस्था को ज्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है।
वास्तविक अनुभवों और समस्याओं के आधार पर हो ऑडिट- नैंसी
इसी तरह नैंसी का कहना था कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए अलग से सेफ्टी ऑडिट होना चाहिए, लेकिन इसकी शुरुआत महिलाओं से यह जानने से होनी चाहिए कि वे पब्लिक ट्रांसपोर्ट में किन परिस्थितियों में खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। उनके वास्तविक अनुभवों और समस्याओं के आधार पर ऑडिट किया जाए, तभी उससे सही सुधार सामने आ पाएंगे।