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जूता मार होली! क्या आपने इस होली का नाम सुना है, जानें कहां और क्यों मनाई जाती है

लठमार होली, फूलों की होली जैसे कई तरह की होली के बारे में आपने सुना होगा। क्या आप जानते हैं कि देश में जूता मार होली भी मनाई जाती है। चलिए जानते हैं, इस तरह की होली कब, कहां और क्यों मनाई जाती है।

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यहां मनाई जाती है जूता मार होली

बुधवार 4 मार्च को देशभर में होली की धूम होगी। हर तरफ अभी से ही अबीर-गुलाल उड़ने लगा है। बच्चे राहगीरों पर पानी भरे गुब्बारे फेंक रहे हैं। लेकिन होली के दिन पूरा देश रंगों से सराबोर हो जाएगा। होली का त्योहार देशभर में मनाया जाता है, लेकिन हर जगह के रीति-रिवाज कुछ अलग होते हैं। हर जगह होली खेलने का अपना अलग तरीका होता है। होली के अलग-अलग रूपों के बारे में आपको जानकारी होगी, लेकिन क्या आप जूता मार होली के बारे में जानते हैं? क्या आपको पता है कि जूता मार होली कहां और क्यों मनाई जाती है? चलिए जानते हैं -

कहां मनाई जाती है जूता मार होली?

'जूता मार होली' नाम से ही कुछ अलग लग रही है। ऐसे में प्रश्न है कि इस तरह की होली कहां मनाई जाती है। बता दें कि उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में यह जूता मार होली खेली जाती है। इस दौरान भैंसा गाड़ी पर बैठे एक शख्स की तरफ सभी लोग जूते और चप्पल फेंककर मारते हैं।

कौन होता है भैंसा गाड़ी पर बैठा व्यक्ति

भैंसा गाड़ी पर बैठे व्यक्ति की तरफ सभी जूते-चप्पल फेंककर मारते हैं, लेकिन क्यों? आखिर यह व्यक्ति कौन होता है और ऐसा क्यों किया जाता है। भैंसा गाड़ी पर बैठा व्यक्ति 'लाट साहब' होता है।

जूता मार होली की परंपरा क्या है?

दरअसल यह परंपरा देश की गुलामी के दौर से चली आ रही है। इस दौरान एक व्यक्ति को अंग्रेजी शासन के दौरान के 'लाट साहब' वाली ड्रेस पहना दी जाती है। फिर वह व्यक्ति भैंसा गाड़ी पर सवार होता है और सभी के आकर्षण का केंद्र भी। इस तरह से देखा जाए तो अंग्रेज 'साहब' पर जूता-चप्पल मारे जाते हैं।

कब मनाई जाती है जूता मार होली?

जूता मार होली के लिए कोई अलग से दिन निर्धारित नहीं है, बल्कि होली के दिन ही यह परंपरा मनाई जाती है। इस दौरान किसी तरह की अनहोनी न हो, इसके लिए पुलिस प्रशासन हर साल बड़ी तैयारी करता है। इस साल भी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए जाने की तैयारी है। रैपिड एक्शन फोर्स के साथ ही NDRF की टीम को भी तैनात किया जाएगा। शहर में बड़े लाट साहब और छोटे लाट साहब के लगभग 8 किमी रूट पर 100 से ज्यादा सोलर पावर्ड सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं।

जूता मार होली का इतिहास क्या है?

इतिहासकारों के अनुसार जूता मार होली की शुरुआत 18वीं सदी से मानी जाती है। जब नवाब अब्दुल्ला खान परिवार से नाराज होकर फर्रूखाबाद चले गए थे। जब 1728 में शाहजहांपुर लौटे तो इत्तेफाक से उस समय होली का त्योहार मनाया जा रहा था। हिंदू-मुस्लिम सभी ने शहरभर में मने होली के जश्न में भाग लिया। इतिहासकारों के अनुसार 1859 में शाहजहांपुर को वापस अपने कब्जे में लेने के बाद अंग्रेजों ने यहां के होली के जश्न को मान्यता दे दी।

इसके बाद हर साल शांतिपूर्ण तरीके से होली का त्योहार मनाया जाने लगा। साल 1988 में तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट कपिल देव ने 'नवाब साहब' शब्द को 'लाट साहब' से बदल दिया। जूता मार होली की शुरुआत फूलमती देवी मंदिर में पूजा से होती है और फिर पूरे शहर में होली का जुलूस निकलता है। साल 1990 में इस परंपरा को बंद करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका भी लगाई जा चुकी है, लेकिन कोर्ट ने इसे लंबे समय से चली आ रही परंपरा बताकर याचिका खारिज कर दी।

Digpal Singh
दिगपाल सिंहauthor

दिगपाल सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सिटी टीम को लीड कर रहे हैं। शहरों से जुड़ी ताजाखबरें, लोकल मुद्दे, चुनावी कवरेज और एक्सप्लेनर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। 2006 से पत्रकारिता में सक्रिय दिगपाल सिंह को प्रिंट और डिजिटल दोनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है। दोनों प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए उन्होंने ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग से लेकर सेंट्रल डेस्क पर बड़ी खबरों की हैंडलिंग तक हर स्तर पर अनुभव हासिल किया है। अब तक 30,000 से अधिक खबरें लिख चुके दिगपाल हाइपर-लोकल न्यूज की बारीकियों, शहरों की समस्याओं और लोगों से जुड़े वास्तविक मुद्दों को समझने की विशेष क्षमता रखते हैं।

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