Holi Hai: होली रंगों और मौज-मस्ती का त्योहार है। कहते हैं इस दिन सभी गिले-शिकवे भुलाकर दुश्मन भी गले लग जाते हैं। इस दिन एक से बढ़कर एक पकवान भी बनाए जाते हैं। होली के दिन अबीर-गुलाल के रंगों के साथ हर किसी पर फाल्गुल की मस्ती छा जाती है। कुछ जगहों पर होली के दिन नशे का बोलबाला भी देखने को मिलता है। कुछ लोग नशे में उल्टी-सीधी हरकतें करते हैं, जिसके बाद विवाद बढ़ता है और मामला पुलिस तक पहुंच जाता है। लेकिन उत्तराखंड में एक ऐसी भी जगह है, जहां पूरी तरह से नशामुक्त होली होती है। चलिए जानते हैं -
देश के अन्य हिस्सों की तरह उत्तराखंड में भी होली बड़े ही धूम-धाम से मनाई जाती है। होली के त्योहार को खराब करने में नशे ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस दिन लोग भांग और शराब का नशा करते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट विकासखंड में एक गांव पूरे देश के लिए मिसाल बना हुआ है।
द्वाराहाट का मल्याल गांव लगभग 25 वर्षों से मिसाल बना हुआ है। यहां होली का रंग तो खूब उड़ता है और लोगों पर होली की मस्ती भी खूब देखने को मिलती है। लेकिन इस अवसर पर शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता है। यहां होली पर सिर्फ रंग उड़ते हैं, पकवान खाए जाते हैं। यहां की होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि अनुशासन संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक भी बन चुकी है।
इस गांव में पिछले दो दशकों से अधिक समय से होली को लेकर एक अनोखा नियम बना हुआ है। गांव में एकादशी से होली के अंतिम दिन तक शराब, बीड़ी और किसी भी प्रकार के अन्य नशे पर पूरी तरह से प्रतिबंध होता है। ग्रामीणों का कहना है कि करीब दो दशक पहले गांव में होली के अवसर पर नशे के चलते झगड़े, गाली-गलौज और हुड़दंग की घटनाएं आम थीं।
नशे से गांव का माहौल बिगड़ रहा था। सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराएं टूट रही थी और लोगों में आपकी सौहार्द खराब हो रहा था। ऐसे में ग्रामीणों ने एक आम सभा बुलाई। उस सभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि होली के दौरान गांव में हर तरह के नशे पर पूरी तरह से प्रतिबंध होगा। इसके साथ ही यह भी तय किया गया कि अगर कोई व्यक्ति नशे की स्थिति में पाया जाता है तो उसके परिजनों को बुलाकर उसे घर भेज दिया जाएगा। इसके बावजूद अगर वह नहीं मानता है तो नशा उतरने तक गांव की गौशाला में बंद कर दिया जाएगा।
ग्रामीणों में इस तरह का सख्त फैसला लिया तो उसका असर भी धीरे-धीरे दिखने लगा। अब होली पर हुड़दंग करने वालों का सामाजिक बहिष्कार होने लगा और आज द्वाराहाट का मल्याल गांव अपनी नशा मुक्त होली के कारण आसपास के गांवों ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए मिसाल बन चुका है।
यहां एकादशी से होली की शुरुआत होती है, जिस दिन पधान के घर चीर बंधन की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान हर घर से अबीर, गुलाल, रोली, अक्षत, फूल, बताशे और लाल-पीले वस्त्र लाए जाते हैं। गणेश पूजा के साथ होलिका को देवी का प्रतीक मानकर जागृत किया जाता है। एकादशी की शाम को ही कालिका और भूमिया मंदिर में सभी इकट्ठा होते हैं। यहां महिलाएं और पुरुष पारंपरिक रागों में होगी के गीत गाते हैं। हर परिवार से गुड़ और दक्षिणा भी चढ़ाई जाती है, जिससे प्रसाद के रूप में हलवा तैयार होता है।
पधान के घर पर चीर बंधन के बाद गांव के होल्यार गांव के हर घर तक जाते हैं। पारंपरिक होली गीतों और आशीर्वाद के साथ त्योहार मनाया जाता है। गांव ही हर बाखली (घरों की कतार) में एक-एक दिन सभी घरों पर होल्यार पहुंचते हैं और होली गीत गाते हैं।
