दुनिया के नक्शे पर जब भी कच्चे तेल (Crude Oil) की बात होती है, तो अक्सर हमें लगता है कि सारा तेल एक जैसा ही होता होगा। लेकिन असलियत इससे कोसों दूर है। जिस तरह सोने की शुद्धता अलग-अलग होती है, वैसे ही दुनिया के अलग-अलग देशों से निकलने वाले कच्चे तेल की गुणवत्ता, उसका गाढ़ापन (Density) और उसमें मौजूद सल्फर की मात्रा में जमीन-आसमान का फर्क होता है। यही वह तकनीकी पेच है जिसके कारण ईरान का कच्चा तेल पूरी दुनिया, और खासकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आंखों का तारा और कांटा दोनों बना रहा। आइए समझते हैं कि ईरान के इस 'खजाने' में ऐसा क्या खास है।
ईरानी क्रूड क्यों है रिफाइनरियों की पहली पसंद?
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान का कच्चा तेल 'रिफाइनिंग' यानी साफ करने के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। तकनीकी भाषा में कहें तो यह तेल न बहुत ज्यादा भारी होता है और न ही इसमें बहुत ज्यादा गंदगी (सल्फर) होती है। इसे प्रोसेस करना रिफाइनरियों के लिए बेहद आसान और किफायती पड़ता है। जब इस तेल को साफ किया जाता है, तो इससे पेट्रोल, डीजल और एविएशन फ्यूल (हवाई जहाज का ईंधन) जैसे कीमती उत्पाद अधिक मात्रा में और कम लागत में निकलते हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद दुनिया भर की बड़ी रिफाइनरियां किसी न किसी रास्ते से ईरानी तेल हासिल करने की कोशिश करती हैं, क्योंकि इससे उनका मुनाफा बढ़ जाता है।
अमेरिका और वेनेजुएला के तेल की अपनी चुनौतियां
ईरान के मुकाबले अगर हम अमेरिका और वेनेजुएला के तेल को देखें, तो वहां कहानी थोड़ी अलग है। अमेरिका के पास तेल तो बहुत है, लेकिन उसकी संरचना अलग-अलग क्षेत्रों में बदल जाती है। वहीं, वेनेजुएला का तेल दुनिया में सबसे 'भारी' (Heavy Crude) माना जाता है। इसमें सल्फर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है, जिसकी वजह से इसे साफ करना किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं है। वेनेजुएला के तेल को रिफाइन करने के लिए बहुत ही जटिल और महंगी मशीनों की जरूरत होती है, जो हर देश या हर कंपनी के पास नहीं होतीं। इसी भारीपन के कारण वेनेजुएला के तेल की मांग बाजार में ईरानी तेल के मुकाबले कम रहती है।
कैसी है क्वालिटी?
कच्चे तेल की कीमत सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि बाजार में कितना तेल उपलब्ध है, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि वह कितना 'हल्का' (Light) और 'मीठा' (Sweet - कम सल्फर वाला) है। हल्का तेल कम मेहनत में ज्यादा ईंधन देता है, जबकि भारी तेल को साफ करने में बिजली, केमिकल और समय ज्यादा बर्बाद होता है। ईरान के पास जो भंडार है, वह इसी 'हल्के और बेहतर' तेल की श्रेणी में आता है। यही कारण है कि ईरान वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक ऐसा खिलाड़ी है जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह लड़ाई सिर्फ व्यापार की नहीं, बल्कि 'रणनीतिक ताकत' की है। जिस देश के पास रिफाइनिंग के लिए सबसे आसान और सस्ता तेल होता है, दुनिया की निर्भरता उस पर बढ़ जाती है। ट्रंप प्रशासन की 'आर-पार' की नीति के पीछे एक बड़ा कारण यह भी था कि ईरान के तेल को बाजार से बाहर करके अमेरिकी तेल की धमक बढ़ाई जा सके। लेकिन तकनीकी सच्चाई यह है कि दुनिया की कई बड़ी रिफाइनरियां (खासकर एशिया और यूरोप की) दशकों से ईरानी तेल के हिसाब से सेट हैं। उन्हें किसी दूसरे देश के तेल पर शिफ्ट करने का मतलब है अरबों डॉलर का अतिरिक्त खर्च।
