2025 खत्म होकर 2026 का आगाज होने वाला है। इस साल दुनियाभर में काफी उठापटक रही। एक तरफ जहां कई देशों में जंग से तबाही मची रही तो कई देशों में बिना कार्यकाल पूरा किए ही सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया गया। आज हम बीत रहे साल पर नजर डालकर ऐसे ही देशों के बारे में आपको बताएंगे जहां राजनीतिक उठापटक देखने को मिली....
साल 2025 न सिर्फ भारत बल्कि वैश्विक रूप से काफी उथल-पुथल भरा रहा। कहीं सरकार के खिलाफ इस कदर जनाक्रोश भड़का कि सरकार ही गिरा दी गई तो कहीं गठबंधन की राजनीति ने सत्ता को कमजोर किया। इसके अलावा, बीत रहे साल में कई देशो में चुनाव के जरिए भी सरकारें बजल गई। ऐसे में जबकि यह साल खत्म हो रहा है तो जरूरत है राजनीतिक पुनरावलोकन करने की। ताकि इतिहास में हुई गलतियों से सीखा जा सके। ऐसे में हम आज आपको बताएंगे कि 2025 में किस देश में तख्तापलट या सरकार बदल गई और इसके पीछे की वजह भी....
ऐसे देश जहां 2025 में राजनीतिक अस्थिरता देखने को मिली उनमें हमारा पड़ोसी देश नेपाल शीर्ष पर है। नेपाल में बार-बार हो रहे सरकार परिवर्तन और प्रमुख दलों में सत्ता को लेकर हो रही खींचतान से लोगों में पहले ही नाराजगी थी। वहीं, इस आग में घी डालने का काम ओली सरकार द्वारा सितंबर में लिए गए सोशल मीडिया पर बैन के फैसले ने किया। उनके इस फैसले का परिणाम यह हुआ कि देश के युवा सड़कों पर उतर आए। शुरू में तो युवाओं का आंदोलन शांतिपूर्ण था, लेकिन ओली सरकार की सख्तियों ने इसे हिंसक बना दिया। इस आंदोलन को दुनिया भर में जेन जी आंदोलन के रूप में पहचान मिली। इस आंदोलन में कई मौतें हुईं और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। युवाओं के इस आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि नेपाल में ओली की सरकार गिल गई और उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा। इसके बाद सोशल मीडिया पर लगे बैन को हटा दिया गया और अंतरिम सरकार का गठन हुआ, जिसका नेतृत्व अभी सुशीला कार्की कर रही हैं। वहां अभी भी पूर्ण सरकार के लिए चुनाव नहीं हुए हैं हालांकि इसकी तारीख तय हो गई है। नेपाल में जेन जी आंदोलन के कारण आर्थिक नुकसान भी बड़े पैमाने पर हुआ। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इस आंदोलन में हुई हिंसा के कारण लगभग 5,000 करोड़ के ऊपर की हानि हुई।बता दें कि नेपाल एक ऐसा देश हैं जहां बीते 17 सालों में एक भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है।
नेपाल की तरह ही इस साल मेडागास्कर में भी तख्तापलट हुआ। अफ्रीका के पूर्वी तट पर स्थित इस देश में भी नेपाल के जेन जी आंदोलन की तरह ही युवाओं ने 25 सितंबर को देशव्यापी प्रदर्शन शुरू किए। उनका विरोध मुख्य रूप से बिजली-पानी की कमी, रोजगार की कमी, महंगाई और सरकार में भ्रष्टाचार के खिलाफ था। युवाओं के इस प्रदर्शन को कुछ दिनों के बाद सेना का भी समर्थन मिला और अक्टूबर में सैन्य तख्तापलट कर दिया गया और राष्ट्रपति एंड्री राजोएलिना अस्थिर स्थिति के बीच देश छोड़ कर भाग गए। 12 से 14 अक्टूबर के बीच, सैन्य इकाई CAPSAT के कमांडर कर्नल माइकल रैंड्रियनिरिना और उनके समर्थक सैनिकों ने सेना को नियंत्रित कर सरकार के अधिकांश संस्थानों को भंग कर दिया। इसके बाद, मेडागास्कर की संसद ने राजोएलिना को इम्पीच किया और उसके बाद सेना ने सत्ता की घोषणा की।
राजनीति के लिहाज से यह साल कनाडा के लिए भी काफी उथलपुथल भरा रहा। 2025 की शुरुआत में जस्टिन ट्रूडो को लेकर पार्टी और जनता में असंतोष बढ़ रहा था। जिसको देखते हुए ट्रूडो ने प्रधानमंत्री और लिबरन पार्टी के नेता के रूप में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद कनाडा में राजनीतिक अस्थिरता की शुरुआत हुई। ट्रूडो के इस्तीफे के बाद लिबरल पार्टी ने मॉर्क कार्नी को अपना नया नेता चुना। इसके बाद मार्क कार्नी ने कनाडा के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। इसके बाद कनाडा में अप्रैल में आम चुनाव हुए और उनमें भी लिबरल पार्टी ने जीत दर्ज की। इस जीत के बाद एक बार फिर से मार्क कॉर्नी ने प्रधानमंत्री पद ग्रहण किया।
इस साल पुर्तगाल में 1974 की क्रांति के बाद सबसे बड़ी राजनीतिक अस्थिरता देखी गई। पुर्तगाल में बीते कई सालों से लगातार अल्पसंख्यक सरकारें अपने कार्यकाल पूरे नहीं कर पाई्ं हैं। इस साल मार्च में यूरोपीय संघ में शामिल इस देश में लुईस मोंटेनग्रो के नेतृत्व वाली दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार ने संसद में अपना विश्वास मत खो दिया। जिससे लुईस को पीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद राष्ट्रपति ने वहां संसद भंग कर दी और सरकार गिर गई। इसके बाद मई में वहां फिर से आम चुनाव हुए। गौरतलब है कि पुर्तगाल ने 50 साल से भी अधिक समय पहले 1974 की कार्नेशन क्रांति के बाद लोकतंत्र को अपनाया था, जिसने चार दशक की तानाशाही को खत्म कर दिया था।
इस साल जापान में भी सत्ता बदली और उसे पहली बार साने ताका‑इची के रूप में महिला प्रधानमंत्री मिली। दरअसल, इस साल जुलाई में नेपाल के निचले सदन में चुनाव हुए। जहां शिगेरू इसिबा की पार्टी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी की हार हुई। इसके बाद उच्च सदन में भी इशिबा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने बहुमत गंवा दिया। हालांकि बहुमन न होने के बावजूद इशिबा की पार्चटी एलडीपी सबसे बड़ी पार्टी बनी रही। वहीं, शिगेरू पार्टी की हार के बाद भी पीएम पद पर बने रहे। ऐसे में उनपर काफी दबाव था, जिसके कारण शिगेरू ने सितंबर में अपने पद से इस्तीफा देने का एलान कर दिया। इसके बाद लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने साने ताकाइची को अपना नेता चुना और वे पीएम बनी।
1960 में फ्रांस से स्वतंत्र होने वाले पश्चिम अफ्रीकी देश में इस साल एक बार फिर सैन्य तख्तापलट की कोशिश हुई। यहां इसी महीने सात दिसंबर को ‘मिलिट्री कमेटी फॉर रीफाउंडेशन’ कहे जाने वाले सैनिकों के समूह ने स्टेट टीवी पर आकर तख्तापलट का एलान किया। उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रपति को पद से हटा दिया गया है। हालांकि बाद में बेनिन के गृहमंत्री अलास्साने सेइदोउ ने बताया कि तख्तापलट की कोशिशों को नाकाम कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि सात दिसंबर, 2025 की सुबह सैनिकों के एक छोटे समूह ने देश और उसकी संस्थाओं को अस्थिर करने के उद्देश्य से विद्रोह शुरू कर दिया था, लेकिन बेनिनी सशस्त्र बलों ने उसे नाकान कर दिया।