NITI Aayog Report Explained : भारत को दुनिया का सबसे युवा देश कहा जाता है। जिस उम्र में देश के युवाओं को नए हुनर सीखकर अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनना चाहिए, उस उम्र में एक बहुत बड़ी आबादी मुख्यधारा से बाहर खड़ी है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट 'विकसित भारत 2047 के लिए कौशल विकास की नई कल्पना' (Reimagining Skill Development for Viksit Bharat 2047) ने देश में बेरोजगारी और हुनर की कमी को लेकर बेहद चिंताजनक आंकड़े सामने रखे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 15 से 29 वर्ष की आयु वर्ग के करीब 8.7 करोड़ ऐसे युवा हैं, जो 'NEET' कैटेगरी में आते हैं। NEET यानी Not in Education, Employment, or Training, ऐसे युवा जो न तो कोई पढ़ाई कर रहे हैं, न ही किसी रोजगार से जुड़े हैं और न ही किसी प्रकार का कोई कौशल प्रशिक्षण यानी स्किल ट्रेनिंग प्राप्त कर रहे हैं। यह आंकड़ा कोई साधारण संख्या नहीं है; यह राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSSO) के 78वें दौर के आंकड़ों पर आधारित एक गंभीर हकीकत है। यह सवाल उठाना लाजमी है कि अगर देश की इतनी बड़ी युवा आबादी कुछ नहीं कर रही, तो वे आखिर कर क्या रहे हैं? नीति आयोग की रिपोर्ट और धरातल की सच्चाइयों को समझें, तो यह स्थिति युवाओं की मर्जी नहीं, बल्कि उनकी मजबूरी और देश की शिक्षा व रोजगार व्यवस्था में मौजूद अंतरालों का नतीजा है।
न पढ़ाई के पैसे, न हुनर का मौका
शिक्षा और रोजगार के इस त्रिकोण से बाहर छूटे युवा आय के भयंकर अभाव का सामना कर रहे हैं। नीति आयोग ने स्पष्ट किया है कि ये युवा किसी आलस की वजह से घर नहीं बैठे हैं, बल्कि वे आर्थिक तंगी के ऐसे चक्रव्यूह में फंसे हैं जिससे निकलना बेहद मुश्किल है। अक्सर कम आय वाले परिवारों से आने वाले युवा और उनके माता-पिता पहले ही स्कूल-कॉलेज की फीस और भारी-भरकम प्राइवेट ट्यूशन के खर्चों से कर्ज में डूबे होते हैं। ऐसे में जब वे ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं, तब उनके सामने आगे कौशल सीखने या कोई फीस-आधारित ट्रेनिंग कोर्स करने का विकल्प ही नहीं बचता। जब जेब में पैसे न हों, तो हुनर सीखने के लिए अतिरिक्त निवेश करना आर्थिक रूप से नामुमकिन हो जाता है।
डिग्री हाथ में, पर काम की नहीं
भारत में उच्च शिक्षा का ढांचा पारंपरिक डिग्रियों पर टिका हुआ है, जिनका सीधा संबंध बाजार की मांग से नहीं होता। यही वजह है कि लाखों युवा कॉलेज से डिग्री लेकर तो निकलते हैं, लेकिन उनके पास वह हुनर नहीं होता जो आज की आधुनिक कंपनियों या उद्योगों को चाहिए। रिपोर्ट में एक बेहद चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है ग्रैजुएशन करने वाले युवाओं में से केवल 8.25 प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं, जो अपनी योग्यता और पढ़ाई के अनुरूप काम कर रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि 90 प्रतिशत से अधिक ग्रैजुएशन या तो अपनी योग्यता से नीचे के स्तर पर काम करने को मजबूर हैं, या फिर उन्हें उनकी पढ़ाई के हिसाब से कोई काम ही नहीं मिल रहा है। जब शिक्षा बाजार की मांग से मेल नहीं खाती, तो युवा डिग्रियां हासिल करने के बाद भी बेरोजगार खड़े रहते हैं।
मजबूरी का रोजगार
जब परिवार की माली हालत खराब होती है और आगे स्किल ट्रेनिंग के लिए पैसे नहीं होते, तब युवाओं के पास ज्यादा सोचने का वक्त नहीं होता। नीति आयोग के अनुसार, अपनी मौजूदा आर्थिक जिम्मेदारियों और पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने के लिए युवा कोई भी स्थायी आय वाला रोजगार चुनने पर मजबूर हो जाते हैं। चाहे वहां वेतन बेहद कम हो, काम का माहौल खराब हो या फिर वह उनकी पढ़ाई के स्तर का न हो, मजबूरी में युवा डिलीवरी बॉय, गीग वर्कर, दुकानों पर सेल्समैन या इंफॉर्मल क्षेत्रों में छोटे-मोटे काम करने लगते हैं। यह स्थिति उन्हें 'रोजगार में' तो दिखा सकती है, लेकिन असल में वे अपनी क्षमता का बेहद छोटा हिस्सा ही इस्तेमाल कर पाते हैं और जीवनभर एक ही आर्थिक स्तर पर टिके रहने को मजबूर हो जाते हैं।
देश के 'बेरोजगार ब्रिगेड' पर नीति आयोग का बड़ा धमाका! (तस्वीर- istock)
सबसे ज्यादा प्रभावित वर्ग
नीति आयोग ने प्रभाव और जरुरत के आधार पर देश के कार्यबल और शिक्षार्थियों को 5 प्रमुख कैटेगरी में बांटा है। स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, औपचारिक एवं अनौपचारिक वर्ग, महिलाएं, और NEET वर्ग। इसमें महिलाओं की स्थिति सबसे अधिक संवेदनशील है। 8.7 करोड़ NEET युवाओं में एक बहुत बड़ा हिस्सा महिलाओं का है। हमारे समाज में घरेलू जिम्मेदारियों, सुरक्षा की चिंता और सीमित अवसरों के कारण पढ़ाई पूरी करने के बाद लड़कियों को रोजगार या प्रशिक्षण के मौके बहुत कम मिल पाते हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी गंभीर है, जहां स्थानीय स्तर पर न तो अच्छे कोचिंग या ट्रेनिंग सेंटर उपलब्ध हैं और न ही उद्योग। इसके चलते ग्रामीण युवा समय बिताने के लिए खेती-किसानी में नाममात्र का हाथ बंटाते हैं या बिना किसी ठोस दिशा के प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सालों-साल बिता देते हैं।
सामाधन क्या है?
विकसित भारत 2047 के सपने को पूरा करने के लिए नीति आयोग ने माना है कि इस 8.7 करोड़ की युवा आबादी को अनदेखा करके देश आगे नहीं बढ़ सकता। आयोग ने इन युवाओं को वापस मुख्यधारा में लाने के लिए कुछ बेहद ठोस सुझाव दिए हैं। गरीब और कम आय वाले परिवारों के युवाओं के लिए पूरी तरह मुफ्त या भारी सब्सिडी वाले स्किल ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किए जाएं ताकि फीस का बोझ उनके हुनर के बीच न आए। केवल पारंपरिक कोर्स कराने के बजाय आज के आधुनिक उद्योगों (जैसे एआई, डेटा, ग्रीन एनर्जी, लॉजिस्टिक्स) और स्थानीय स्तर के बाजारों की जरूरतों को ध्यान में रखकर प्रशिक्षण दिया जाए। युवाओं को ट्रेनिंग के दौरान डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए आर्थिक सहायता दी जाए ताकि उन्हें ट्रेनिंग के दौरान अपने दैनिक खर्चों की चिंता न रहे। सिर्फ नौकरी ढूंढने वाला बनाने के बजाय युवाओं को अपना छोटा-मोटा व्यवसाय या स्टार्टअप शुरू करने के लिए आसान लोन और प्रोत्साहन दिया जाए।
भारत के पास 'जनसांख्यिकी लाभांश' का एक बहुत बड़ा अवसर है। लेकिन अगर 8.7 करोड़ युवा यूं ही बिना शिक्षा, रोजगार और हुनर के रह गए, तो यह अवसर एक बड़ी चुनौती में बदल सकता है। इस दिशा में सरकार, निजी क्षेत्र और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर तुरंत कदम उठाने होंगे ताकि देश का हर युवा अपनी क्षमता के अनुसार देश के निर्माण में योगदान दे सके।
