Vladimir Putin in Beijing: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक बार फिर चीन पहुंच चुके हैं, जहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हुई। यह सिर्फ एक सामान्य राजनयिक दौरा नहीं माना जा रहा, क्योंकि दोनों नेता अब तक 40 से ज्यादा बार मुलाकात कर चुके हैं। खास बात ये कि कुछ दिनों पहले ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन से होकर गए हैं और अब पुतिन चीन आ गए। बता दें कि दुनिया की राजनीति में शायद ही कोई ऐसा बड़ा नेता हो, जिससे शी जिनपिंग ने पुतिन जितनी बार मुलाकात की हो।
रूस और चीन की यह नजदीकी पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है। 2013 में शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों ने अपने रिश्तों को नई ऊंचाई तक पहुंचाने की बात शुरू की थी। बाद में 2022 में दोनों देशों ने 'No Limits Partnership' का ऐलान किया। यानी ऐसी साझेदारी जिसकी कोई तय सीमा नहीं होगी।
इस दोस्ती के पीछे क्या?
असल में इस दोस्ती की सबसे बड़ी वजह है अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ साझा रणनीति। रूस लंबे समय से NATO और अमेरिका को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है, जबकि चीन ताइवान, व्यापार युद्ध और इंडो-पैसिफिक रणनीति को लेकर अमेरिका से टकराव में है। ऐसे में मॉस्को और बीजिंग एक-दूसरे को मजबूत रणनीतिक साझेदार के तौर पर देखते हैं।
यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तब चीन रूस के लिए सबसे बड़ा आर्थिक सहारा बनकर सामने आया। चीन ने रूस से रिकॉर्ड मात्रा में तेल और गैस खरीदी, जिससे मॉस्को की अर्थव्यवस्था को राहत मिली। दूसरी तरफ रूस ने चीन को सस्ता ऊर्जा स्रोत और सैन्य सहयोग दिया।
रूस-चीन दोस्ती 'किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं'
पुतिन चीन रवाना होने से पहले कह चुके हैं कि रूस-चीन दोस्ती 'किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं' है, लेकिन दोनों देश मिलकर एक 'बहुध्रुवीय दुनिया' बनाना चाहते हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान सीधे अमेरिका को संदेश देने जैसा है कि अब दुनिया सिर्फ पश्चिमी ताकतों के हिसाब से नहीं चलेगी।
दोनों देशों के बीच सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि व्यापार और रक्षा सहयोग भी तेजी से बढ़ा है। डॉलर पर निर्भरता कम करने, अपनी करेंसी में व्यापार बढ़ाने और संयुक्त सैन्य अभ्यास करने जैसे कदम दोनों देशों को और करीब ला रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि शी जिनपिंग और पुतिन की यह दोस्ती सिर्फ व्यक्तिगत रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक राजनीति का बड़ा संकेत है। यही वजह है कि दुनिया अब हर शी-पुतिन मुलाकात को सिर्फ कूटनीतिक बैठक नहीं, बल्कि नए ग्लोबल पावर बैलेंस के संकेत के रूप में देख रही है।
'अच्छे पड़ोसी और मैत्रीपूर्ण सहयोग संधि' की 25वीं वर्षगांठ
रूसी राष्ट्रपति पुतिन चीन की दो-दिवसीय यात्रा पर पहुंचे हैं। इस यात्रा का मुख्य केंद्र चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब युद्ध, प्रतिबंधों और लगातार बिखरती जा रही वैश्विक व्यवस्था के बीच मॉस्को और बीजिंग एक-दूसरे के और करीब आ रहे हैं।

दोनों के बीच एक साथ से भी कम समय में दो आमने सामने की मुलाकातें
पुतिन की यह यात्रा एक साल से भी कम समय में शी के साथ उनकी दूसरी आमने-सामने की मुलाकात है। साथ ही, यह 2001 की 'अच्छे पड़ोसी और मैत्रीपूर्ण सहयोग संधि' की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर हो रही है। यह वह समझौता था जिसने दशकों की वैचारिक प्रतिद्वंद्विता और आपसी अविश्वास के बाद रूस और चीन के बीच संबंधों को औपचारिक रूप दिया था।
वहीं, जानकारों का कहना है कि शी का एक ही हफ्ते के भीतर ट्रंप और पुतिन की मेजबानी करने का फैसला कोई इत्तेफाक नहीं है। यह बीजिंग की उस कोशिश को दिखाता है जिसके तहत वह लगातार बंटती और अस्थिर होती जा रही वैश्विक व्यवस्था में खुद को एक भरोसेमंद किरदार के तौर पर पेश करना चाहता है।
एक समय पर कट्टर दुश्मन थे रूस और चीन
चीन और रूस का एक-दूसरे के इतिहास में लंबे समय से एक जटिल स्थान रहा है। कभी कम्युनिस्ट विचारधारा और पश्चिमी पूंजीवाद के साझा विरोध के जरिए एक-दूसरे से जुड़े सोवियत संघ और माओवादी चीन बाद में कट्टर दुश्मन बन गए। शीत युद्ध के दौरान उनकी 4,300 किलोमीटर (2,670 मील) लंबी सीमा पर तनाव ने दोनों देशों को युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया था। हालांकि, तब से वह सीमा असुरक्षा की सरहद से बदलकर रणनीतिक सहयोग और व्यापार की सरहद बन गई है।
न तो शी और न ही पुतिन अक्सर अंतरराष्ट्रीय यात्राएं करते हैं। यूक्रेन युद्ध को लेकर पुतिन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) का गिरफ्तारी वारंट जारी है, जबकि शी बहुत कम ही चीन से बाहर जाते हैं, सिवाय उन सरकारी यात्राओं के, जिनकी योजना बहुत सावधानी से बनाई गई हो। लेकिन दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के साथ अपने निजी संबंधों को बनाए रखने में काफी निवेश किया है।
