सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है। दरअसल कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन (KSIC) के शोरूम के बाहर इन दिनों अजीब नज़ारा देखने को मिल रहा है। महिलाएं सुबह 4 बजे से लाइन लगाकर मैसूर की असली सिल्क साड़ी खरीदने पहुंच रही हैं। साड़ियों की कीमत करीब ₹23,000 से लेकर ₹2.5 लाख रुपये तक है। नियम यह है कि हर ग्राहक को सिर्फ एक ही साड़ी मिलेगी और लाइन में लगने के लिए टोकन जरूरी है। दरअसल, असली मैसूर सिल्क साड़ियों की बाजार में भारी कमी चल रही है। खासतौर पर वे साड़ियां जो KSIC बनाता है, क्योंकि यही संस्था GI टैग वाली शुद्ध मैसूर सिल्क तैयार करने का अधिकार रखती है। यह समस्या पूरे 2025 से बनी हुई है और 2026 में भी जल्दी खत्म होती नहीं दिख रही।
इस कमी की सबसे बड़ी वजह है कि कॉर्पोरेशन के पास सीमित संख्या में प्रशिक्षित बुनकर और कारीगर हैं। किसी कारीगर को काम के लिए तैयार होने में ही 6–7 महीने लग जाते हैं। इसके अलावा उत्पादन सिर्फ सरकारी प्रशिक्षित वर्कफोर्स तक सीमित है, जिससे तेजी से स्केल-अप करना संभव नहीं हो पाता। जब शादी का मौसम, वरलक्ष्मी पूजा, गौरी-गणेश उत्सव और दीपावली जैसे त्योहार आते हैं, तब मांग अचानक कई गुना बढ़ जाती है। नतीजा यह होता है कि शोरूम का स्टॉक कुछ ही समय में खत्म हो जाता है। कुछ लोग इस हालात की तुलना पुराने सोवियत यूनियन से कर रहे हैं, जहां चीजों की भारी किल्लत रहती थी।
फर्क बस इतना है कि KSIC कम से कम असलीपन की गारंटी देता है। जबकि निजी कंपनियां कई बार ग्राहकों को नकली या चीनी आर्टिफिशियल सिल्क थमा देती हैं। इसका उदाहरण तिरुपति में सामने आया था, जहां एक निजी ठेकेदार भक्तों को फर्जी सिल्क सप्लाई कर रहा था। इसी वजह से आज मैसूर सिल्क सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि भरोसे और इंतजार की कहानी बन चुका है। यह वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया के एक्स पर @ByRakeshSimha नामक अकाउंट से शेयर किया गया है। इस वीडियो को देखने यूजर्स भी कई तरह के कमेंट्स कर रहे हैं।
