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72 साल तक मेटल के बॉक्स में गुजारी जिंदगी, टेक्नोलॉजी बनी सहारा, बना दिया विश्व रिकॉर्ड

पॉल अलेक्जेंडर उस वक्त महज 6 साल के थे। एक दिन वो टेक्सास में अपने घर के बाहर खेल रहे थे, तभी उन्हें बुखार और बदन दर्द महसूस हुआ। कुछ ही दिनों में पोलियो वायरस ने उनके पूरे शरीर को लकवाग्रस्त (Paralyzed) कर दिया था।

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पॉल अलेक्जेंडर ने पूरी लाइफ एक मेटल के बॉक्स में गुजारी है। (फोटो क्रेडिट-Reddit)

जब हम एक दिन के लिए भी किसी बंद कमरे में रहने की कल्पना करते हैं, तो हमारा दम घुटने लगता है। लेकिन दुनिया में एक ऐसा इंसान भी था जिसने अपनी जिंदगी के सिर्फ कुछ दिन या साल नहीं, बल्कि पूरे 72 साल एक भारी-भरकम लोहे के बक्से (Metal Box / Iron Lung) के अंदर बिता दिए। यह कहानी है अमेरिका के रहने वाले पॉल अलेक्जेंडर (Paul Alexander) की, जिन्हें दुनिया "द मैन इन द आयरन लंग" के नाम से जानती है।

मार्च 2024 में 78 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी जीने की जिजीविषा और संघर्ष की कहानी आज भी दुनिया के लिए एक मिसाल है। आइए जानते हैं उनकी इस हैरतअंगेज जिंदगी के बारे में।

6 साल की उम्र में थमी जिंदगी की रफ्तार

यह बात साल 1952 की है, जब अमेरिका में पोलियो महामारी का भयंकर प्रकोप था। पॉल अलेक्जेंडर उस वक्त महज 6 साल के थे। एक दिन वो टेक्सास में अपने घर के बाहर खेल रहे थे, तभी उन्हें बुखार और बदन दर्द महसूस हुआ। कुछ ही दिनों में पोलियो वायरस ने उनके पूरे शरीर को लकवाग्रस्त (Paralyzed) कर दिया था।

पॉल की गर्दन के नीचे का पूरा हिस्सा काम करना बंद कर चुका था, यहां तक कि उनके फेफड़े भी सांस लेने में असमर्थ हो गए थे। डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन उन्हें बचाने के लिए एक आखिरी रास्ता अपनाया गया। उन्हें 'आयरन लंग' (Iron Lung) नाम की एक मशीन के अंदर रख दिया गया।

क्या होती है 'आयरन लंग' मशीन?

'आयरन लंग' एक बड़ा, बेलनाकार धातु का वेंटिलेटर होता है, जो 1920 के दशक में ईजाद हुआ था। यह मशीन मरीज के पूरे शरीर को (सिर्फ सिर को छोड़कर) अपने अंदर बंद कर लेती है। यह हवा के दबाव (Negative Pressure) को बदलकर मरीज के फेफड़ों को कृत्रिम रूप से सिकुड़ने और फैलने में मदद करती है, जिससे मरीज सांस ले पाता है।

लोहे के बक्से को बनाया अपनी ताकत

शुरुआती दिनों में हर किसी को लगा कि पॉल इस मशीन के सहारे ज्यादा दिन नहीं जी पाएंगे। लेकिन पॉल ने हार नहीं माना। उन्होंने समय के साथ एक विशेष तकनीक सीखी जिसे "फ्रॉग ब्रीदिंग" (Frog Breathing) कहा जाता है। इसमें वो अपने मुंह और गले की मांसपेशियों का उपयोग करके हवा लेते थे और फेफड़ों तक पहुंचाते थे।

इस तकनीक की मदद से वो कुछ घंटों के लिए मशीन से बाहर निकलने में कामयाब हो जाते थे, लेकिन सोने के लिए और बाकी समय उन्हें वापस उसी लोहे के बक्से में जाना पड़ता था।

व्हीलचेयर से लेकर वकालत की डिग्री तक की उपलब्धियां

पॉल ने साबित कर दिया कि शारीरिक अक्षमता उनकी उड़ानों को नहीं रोक सकती। लोहे के बक्से में कैद रहने के बावजूद उन्होंने जो हासिल किया, वह आम लोगों के लिए भी बेहद मुश्किल है। उन्होंने घर और अस्पताल में रहकर अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की। वह यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास से इकोनॉमिक्स और लॉ की पढ़ाई करने वाले पहले छात्रों में से एक बने।

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड

पढ़ाई पूरी करने के बाद पॉल ने बाकायदा बार काउंसिल की परीक्षा पास की और व्हीलचेयर पर अदालत जाकर मुकदमों की पैरवी भी की। आपको बता दें कि पॉल के नाम विश्व रिकॉर्ड भी है। उन्होंने सबसे लंबे समय तक आयरन लंग के सहारे जीवित रहने के लिए उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि उन्होंने कीबोर्ड पर टाइप करके अपनी आत्मकथा 'थ्री मिनट्स फॉर ए डॉग: माई लाइफ इन एन आयरन लंग' लिखी।

Gaurav Tiwari
गौरव तिवारीauthor

गौरव तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में टेक और ऑटो बीट को कवर करते हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 9 वर्षों के अनुभव के साथ, गौरव तकनीकी दुनिया की तेजी से बदलती जानकारियो को सरल और समझने योग्य भाषा में पेश करने के लिए जाने जाते हैं। वह गैजेट रिव्यू, टेलिकॉम अपडेट्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर क्राइम, टिप्स एंड ट्रिक्स, ई-कॉमर्स और ऑटोमोबाइल सेक्टर की महत्वपूर्ण खबरों पर लगातार काम करते हैं। गौरव अब तक 10,000 से अधिक आर्टिकल्स लिख चुके हैं। उनकी स्टोरीज न सिर्फ टेक-सेवी पाठकों के लिए उपयोगी होती हैं, बल्कि आम यूजर्स को भी नई तकनीक समझने और अपनाने में मदद करती हैं।

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