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श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ हिंदी में, ओम नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि के लिरिक्स अर्थ सहित

श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ हिंदी में (shri ganpati atharvashirsha in hindi): श्री गणपति अथर्वशीर्ष का जाप पवित्र और शक्तिशली माना जाता है। मान्यता है कि इस स्तोत्र का जाप सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला और संकट हरने वाला है। इस मंत्र को हमेशा माला के साथ जपना चाहिए। यहां देखें श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ मंत्र लिखित, ओम नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि के लिरिक्स। जानें श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ क्यों किया जाता है और श्री गणपति अथर्वशीर्ष का क्या महत्व है।

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श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ हिंदी में (Pic: Canva)

श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ हिंदी में (shri ganpati atharvashirsha in hindi): गणेश जी के मंत्रों में विशिष्ट स्थान रखता है श्री गणपति अथर्वशीर्ष। इसका जाप संकट दूर करने वाला, मनोकामना पूर्ति वाला और अंदर से बल देने वाला माना जाता है। हर बुधवार को गणेश जी के इस स्तोत्र का जाप शुभफलदायी माना जाता है। यहां देखें ओम नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि के लिरिक्स, om namaste ganapataye tvameva lyrics। जानें श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ के लिरिक्स और इसकी महिमा।

Shri Ganpati Atharvashirsha Lyrics in Hindi

ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि

त्वमेव केवलं कर्ताऽसि

त्वमेव केवलं धर्ताऽसि

त्वमेव केवलं हर्ताऽसि

त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि

त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।।

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।।

अव त्व मां। अव वक्तारं।

अव श्रोतारं। अव दातारं।

अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।

अव पश्चातात। अव पुरस्तात।

अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।

अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।

सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्।।3।।

त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।

त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।

त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि।

त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।

त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि।।4।।

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।

सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।

सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।

सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।

त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।

त्वं चत्वारिवाक्पदानि।।5।।

त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।

त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।

त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।

त्वं शक्तित्रयात्मक:।

त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं

रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं

वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं

ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।

गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।

अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।

तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।

गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।

अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।

नाद: संधानं। सं हितासंधि:

सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:

निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।

ॐ गं गणपतये नम:।।7।।

एकदंताय विद्‍महे।

वक्रतुण्डाय धीमहि।

तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।।

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।

रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।

रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।

रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।

भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।

आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।

एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।।

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।

नम: प्रमथपतये।

नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।

विघ्ननाशिने शिवसुताय।

श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।।

एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।

स ब्रह्मभूयाय कल्पते।

स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।

स सर्वत: सुखमेधते।

स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।।11।।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।

प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।

सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।

सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।

धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।।12।।

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।

यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।

सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।13।।

अनेन गणपतिमभिषिंचति

स वाग्मी भवति

चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति

स विद्यावान भवति।

इत्यथर्वणवाक्यं।

ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्

न बिभेति कदाचनेति।।14।।

यो दूर्वांकुरैंर्यजति

स वैश्रवणोपमो भवति।

यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति

स मेधावान भवति।

यो मोदकसहस्रेण यजति

स वाञ्छित फलमवाप्रोति।

य: साज्यसमिद्भिर्यजति

स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा

सूर्यवर्चस्वी भवति।

सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ

वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।

महाविघ्नात्प्रमुच्यते।

महादोषात्प्रमुच्यते।

महापापात् प्रमुच्यते।

स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।

य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।।16।।

अथर्ववेदीय गणपतिउपनिषद समाप्त।।

इसके बाद इस मंत्र का जाप करें

ॐ सहनाव वतु सहनो भुनक्तु सहवीर्यंकरवावहे तेजस्वी नावधितमस्तु मा विद्विषामहे।।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष का अर्थ हिंदी में

गणपति अथर्वशीर्ष ऋग्वेदीय गणपत्युपनिषद् है। इसमें गणेश जी को साक्षात ब्रह्मस्वरूप, सृष्टिकर्ता और रक्षक बताया गया है। इसमें कहा गया है हे गणपति! आपको नमस्कार। आप प्रत्यक्ष ब्रह्मतत्त्व हैं। आप ही सृष्टि के कर्ता हैं। आप ही इस जगत के धारक हैं। आप ही इस संसार के संहारक हैं। आप ही यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मस्वरूप हैं। आप ही शाश्वत आत्मस्वरूप हैं। मैं ऋत (धर्म) कहता हूं, सत्य कहता हूं। आप मुझे, वक्ता, श्रोता, दाता, धारक, विद्यार्जन करने वाले और शिष्य को रक्षा प्रदान करें। आप मुझे पश्चिम, पूर्व, उत्तर, दक्षिण, ऊपर और नीचे – हर दिशा से सुरक्षित रखें। आप वाणी के स्वरूप हैं।

आप चेतनास्वरूप और आनंदस्वरूप हैं। आप अद्वितीय सत्-चित्-आनंद ब्रह्म हैं। आप सम्पूर्ण विश्व के कारण हैं। आप सदा मूलाधार चक्र में विराजते हैं। आप तीन शक्तियों (इच्छा, क्रिया, ज्ञान) के अधिपति हैं। योगीजन आपको सदैव ध्यान करते हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र हैं। आप ही अग्नि, वायु, सूर्य और चंद्र हैं। आप ही ब्रह्म, भूः, भुवः और स्वः हैं।

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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