अध्यात्म

हेरंब संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा: रानी दमयंती ने कैसे पाया खोया परिवार और राजपाट, पढ़ें भादो कृष्ण चौथ की पूरी कहानी

Heramba Sankashti Chaturthi Vrat Katha: हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर पढ़ें राजा नल और रानी दमयंती की पौराणिक कथा। जानें कैसे गणेश व्रत से उनका परिवार मिला और खोया राजपाट वापस आया।

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हेरंब संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

Heramba Sankashti Chaturthi Vrat Katha: हेरंब संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश के हेरंब स्वरूप को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से व्रत रखने और व्रत कथा सुनने से जीवन के संकट कम होते हैं। खासकर जब परिस्थितियां साथ न दे रही हों, परिवार बिखर रहा हो या किसी काम में बार-बार बाधा आ रही हो, तब भक्त हेरंब गणपति से रक्षा और सही मार्ग दिखाने की प्रार्थना करते हैं।

हेरंब गणपति का स्वरूप भी विशेष माना गया है। उनके पांच मुख और दस भुजाएं बताई गई हैं। उनका वाहन सिंह है। भगवान गणेश का यह स्वरूप निर्बल और संकट में घिरे लोगों की रक्षा करने वाला माना जाता है।

हेरंब संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

प्राचीन समय में नल नाम के एक धर्मप्रिय और न्याय करने वाले राजा थे। उनकी पत्नी का नाम दमयंती था। राजा नल और दमयंती एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। उनके राज्य में सुख-समृद्धि थी और प्रजा भी प्रसन्न रहती थी।

लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। राजा नल के जीवन में अचानक विपत्तियां आने लगीं। जुए में वह अपना धन और राजपाट हार गए। राजकोष खाली हो गया। हाथी-घोड़े चोरी हो गए। बची हुई संपत्ति भी आग में नष्ट हो गई। जिन लोगों पर राजा ने भरोसा किया था, उन्होंने भी संकट के समय उनका साथ छोड़ दिया।

कुछ ही समय में राजा नल को अपना राज्य छोड़कर जंगल की ओर जाना पड़ा। रानी दमयंती भी उनके साथ थीं। दोनों ने कई दिनों तक भूख, प्यास और अभाव का सामना किया। परिस्थिति इतनी कठिन हो गई कि राजा, रानी और उनका पुत्र एक-दूसरे से बिछड़ गए।

राजा नल एक नगर में घोड़ों की देखभाल करने लगे। उनका पुत्र भी अपना जीवन चलाने के लिए दूसरे स्थान पर काम करने लगा। उधर, रानी दमयंती अकेली जंगलों और अनजान रास्तों पर भटकती रहीं। राजमहल में रहने वाली रानी के पास अब न धन था, न परिवार और न रहने का कोई ठिकाना।

महर्षि शरभंग ने बताया संकट दूर करने का उपाय

एक दिन जंगल में भटकते हुए दमयंती की भेंट महर्षि शरभंग से हुई। रानी ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी पूरी व्यथा सुनाई। उन्होंने पूछा, “हे ऋषिवर, मेरा परिवार फिर कब मिलेगा? क्या राजा नल को उनका खोया हुआ राज्य वापस मिल सकेगा? हमारे दुखों का अंत कैसे होगा?”

महर्षि ने दमयंती को धैर्य रखने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को हेरंब संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान गणेश के हेरंब स्वरूप की पूजा करने से कठिन संकटों से निकलने का रास्ता मिलता है।

महर्षि ने रानी को पूरे विश्वास के साथ व्रत रखने, गणेश जी की पूजा करने और हर महीने संकष्टी चतुर्थी का नियम निभाने की सलाह दी। उन्होंने यह भी कहा कि तीन महीने के भीतर उनके जीवन में शुभ बदलाव दिखाई देने लगेंगे।

दमयंती को वापस मिला परिवार और राज्य

रानी दमयंती ने महर्षि की बात को केवल एक उपाय की तरह नहीं, बल्कि नई आशा की तरह अपनाया। उन्होंने श्रद्धा से हेरंब संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा। भगवान गणेश को दूर्वा, फूल और भोग अर्पित किया। दिनभर संयम रखा और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत पूरा किया।

दमयंती ने आगे आने वाली संकष्टी चतुर्थियों पर भी गणपति की पूजा जारी रखी। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलने लगीं। तीन महीने के भीतर उनका राजा नल और पुत्र से पुनर्मिलन हुआ। राजा नल को उनका खोया हुआ राज्य और सम्मान भी वापस मिल गया। परिवार फिर एक साथ हुआ और जीवन में सुख-समृद्धि लौट आई।

हेरंब संकष्टी व्रत कथा से क्या सीख मिलती है

यह कथा केवल राजपाट वापस मिलने की कहानी नहीं है। यह उस समय धैर्य बनाए रखने की सीख देती है, जब सब कुछ हाथ से निकलता हुआ दिखाई दे। रानी दमयंती ने मुश्किल समय में भी उम्मीद और विश्वास नहीं छोड़ा।

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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