Pavagadh Kalika Mata Temple : 17 जून का दिन पावागढ़ कालिका माता मंदिर के इतिहास में बेहद खास माना जाता है। करीब चार साल पहले 17 जून 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के पंचमहल जिले में स्थित प्रसिद्ध पावागढ़ कालिका माता मंदिर के पुनर्निर्मित शिखर पर ध्वजारोहण किया था। यह क्षण इसलिए ऐतिहासिक था क्योंकि करीब 538 साल बाद मंदिर के शिखर पर फिर से ध्वज फहराया गया था। पावागढ़ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास, संस्कृति और आध्यात्म का संगम माना जाता है। यहां माता कालिका का शक्तिपीठ है, जहां देशभर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
क्यों खास है पावागढ़ कालिका मंदिर
गुजरात के पंचमहल जिले में स्थित पावागढ़ पहाड़ी पर मां कालिका का प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 भाग किए थे। मान्यता है कि माता सती के दाहिने पैर का अंगूठा पावागढ़ की पहाड़ी पर गिरा था।
इसी कारण इस स्थान को शक्तिपीठ का दर्जा प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि त्रेतायुग में महर्षि विश्वामित्र ने भी इस क्षेत्र में तपस्या की थी और मां कालिका की स्थापना की थी। पावागढ़ नाम को लेकर भी कई मान्यताएं हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार, यहां की पहाड़ी की बनावट और तेज हवाओं के कारण इसका नाम पावागढ़ पड़ा। वहीं कुछ लोग इसे ‘पांव’ यानी पैर और ‘गढ़’ यानी किले से जोड़कर देखते हैं।
538 साल बाद क्यों फहरा ध्वज
पावागढ़ मंदिर का इतिहास कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 15वीं शताब्दी में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने चंपानेर और पावागढ़ क्षेत्र पर आक्रमण किया था। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान मंदिर के ऊपरी हिस्से यानी शिखर को नुकसान पहुंचा था। मंदिर के ऊपरी भाग में बाद में सदनशाह पीर की दरगाह भी स्थित हो गई थी। इसके कारण लंबे समय तक मंदिर के शिखर पर ध्वज स्थापित नहीं हो सका।
वर्षों तक बातचीत और आपसी सहमति के बाद मंदिर के शिखर के पुनर्निर्माण का रास्ता साफ हुआ। इसके बाद मंदिर के पुनर्विकास का कार्य किया गया और 17 जून 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर के नए शिखर पर ध्वज फहराया। यह अवसर श्रद्धालुओं के लिए बेहद भावुक और ऐतिहासिक क्षण था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके पर कहा था कि मंदिर का शिखर ध्वज केवल आस्था और आध्यात्म का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह संदेश देता है कि समय बदलता है, युग बदलते हैं, लेकिन आस्था हमेशा बनी रहती है।
विश्व धरोहर है यह मंदिर
पावागढ़ कालिका मंदिर को गुजरात के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। यहां मां कालिका के दर्शन के लिए सालभर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि मां कालिका भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं और जीवन में शक्ति, साहस तथा सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती हैं। नवरात्रि और विशेष धार्मिक अवसरों पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
यह स्थान केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और स्थापत्य कला के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। पावागढ़ के पास स्थित चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व उद्यान को 2004 में यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी गई थी। यह क्षेत्र प्राचीन मंदिरों, मस्जिदों, किलों और ऐतिहासिक संरचनाओं के लिए भी प्रसिद्ध है।
कभी बेहद कठिन थी पावागढ़ की यात्रा
पुराने समय में पावागढ़ की यात्रा काफी कठिन मानी जाती थी। श्रद्धालुओं को पहाड़ी पर चढ़कर मंदिर तक पहुंचना पड़ता था। कहा जाता था कि जीवन में एक बार मां के दर्शन हो जाएं तो यह सौभाग्य की बात होती है। समय के साथ यहां सुविधाओं का विकास हुआ। आज रोपवे, बेहतर रास्तों और अन्य सुविधाओं के कारण श्रद्धालु आसानी से मंदिर तक पहुंच सकते हैं।
शक्ति साधना का है प्रमुख केंद्र
पावागढ़ को शक्ति साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां मां कालिका की पूजा करने से साहस, आत्मविश्वास और मन की शांति प्राप्त होने की मान्यता है। माना जाता है कि स्वामी विवेकानंद ने भी मां कालिका की उपासना यहां पर की थी। यह स्थान आध्यात्मिक साधना और आत्मिक ऊर्जा के लिए प्रसिद्ध है।
