Golden Dome Project: अमेरिका अपने देश को संभावित मिसाइल हमलों से सुरक्षित करने के लिए एक बेहद महत्वाकांक्षी और बहुस्तरीय मिसाइल रक्षा प्रणाली तैयार कर रहा है, जिसे 'गोल्डन डोम' (Golden Dome) नाम दिया गया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन (Donald Trump) का लक्ष्य जनवरी 2029 तक इस लगभग 175 अरब डॉलर की परियोजना को पूरी तरह सक्रिय करने का है।
द स्ट्रैटेजिस्ट के मुताबिक यह रक्षा प्रणाली न केवल अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों और पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइलों को रोकने में सक्षम होगी, बल्कि क्रूज मिसाइलों, हाइपरसोनिक हथियारों और फ्रैक्शनल ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम जैसे आधुनिक खतरों को भी हवा में ही नष्ट करने के लिए डिजाइन की जा रही है। यह रीगन काल के चर्चित 'स्टार वॉर्स' कार्यक्रम की याद दिलाता है, जिसका उद्देश्य एक साथ होने वाले बड़े मिसाइल हमलों को निष्फल बनाना है।
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गोल्डन डोम के लिए ग्रीनलैंड का भूगोल इतना अहम क्यों?
इस पूरे रक्षा प्रोजेक्ट की सफलता में सबसे बड़ा योगदान ग्रीनलैंड के भूगोल का है। द स्ट्रैटेजिस्ट की मानें तो यदि रूस या चीन अपनी मुख्य भूमि या आर्कटिक क्षेत्र से अमेरिकी शहरों को निशाना बनाकर मिसाइलें दागते हैं, तो उनका सबसे छोटा और सीधा रास्ता उत्तरी ध्रुव (North Pole) के ऊपर से होकर गुजरता है। ग्रीनलैंड ठीक इसी रास्ते के नीचे स्थित है।
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सैन्य रणनीति के लिहाज से, दुश्मन की मिसाइल को जितना जल्दी ट्रैक किया जाए, उसे नष्ट करने की संभावना उतनी ही अधिक होती है। ग्रीनलैंड में अर्ली-वार्निंग सेंसर्स, रडार, संचार उपकरण और इंटरसेप्टर मिसाइलें तैनात करने से अमेरिकी सेना को मिसाइल के लॉन्च होते ही या उसके शुरुआती सफर के दौरान ही जानकारी मिल जाएगी। इससे निर्णय लेने के लिए बहुमूल्य अतिरिक्त मिनट मिल जाते हैं।
सुरक्षा का यह बहुस्तरीय ढांचा कैसे काम करेगा?
पहला स्तर (स्पेस-बेस्ड इंटरसेप्टर): अंतरिक्ष में तैनात उपग्रह और सिस्टम मिसाइल के लॉन्च होते ही (बूस्ट फेज में) उसे नष्ट करने का प्रयास करेंगे।
दूसरा स्तर (ग्रीनलैंड आधारित इंटरसेप्टर): यदि मिसाइल अंतरिक्ष के शुरुआती चरण को पार कर जाती है, तो ग्रीनलैंड में लगे इंटरसेप्टर उसे अंतरिक्ष के मध्य-मार्ग (मिड-कोर्स फेज) में ही मार गिराएंगे।
तीसरा स्तर (अलास्का और कैलिफोर्निया): अंतिम चरण में, जब मिसाइल अपने लक्ष्य की ओर नीचे आ रही होगी, तब अलास्का और कैलिफोर्निया में तैनात मौजूदा रक्षा प्रणालियां उसे निशाना बनाएंगी।
ग्रीनलैंड में मौजूद 'पिटुफिक स्पेस बेस' (पूर्व में थुले बेस) पहले से ही रडार तकनीक के जरिए रूस और चीन के मिसाइल मार्गों पर नजर रख रहा है, जिसे अब और अधिक मजबूत करने की योजना है।
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रूस और चीन को रोकने का कूटनीतिक और आर्थिक मास्टरस्ट्रोक
ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए केवल मिसाइल सुरक्षा का केंद्र नहीं है, बल्कि यह रूस और चीन के प्रभाव को बेअसर करने का भी बड़ा जरिया है। अमेरिका की रणनीति है कि ग्रीनलैंड में किसी भी विरोधी देश को सैन्य बेस बनाने या रणनीतिक निवेश करने की अनुमति न मिले। इससे चीन के उस आर्थिक एजेंडे पर रोक लगेगी, जिसके तहत वह बंदरगाहों और खदानों में हिस्सेदारी खरीदकर आर्कटिक में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता था।
इसके अतिरिक्त, ग्रीनलैंड में 'रेयर अर्थ मिनरल्स' (दुर्लभ पृथ्वी खनिजों) का विशाल खजाना छिपा हुआ है। अनुमान है कि यहां करीब 3.6 करोड़ टन दुर्लभ खनिज मौजूद हैं, जिनमें कॉपर, निकल, जिंक और टंगस्टन जैसे 25 महत्वपूर्ण कच्चे माल शामिल हैं।
ये धातुएं इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टरों और आधुनिक हथियारों के निर्माण के लिए अनिवार्य हैं। वर्तमान में दुनिया के लगभग 60% दुर्लभ खनिजों के उत्पादन और 85% प्रोसेसिंग पर चीन का कब्जा है। ग्रीनलैंड के संसाधनों तक पहुंच बनाकर अमेरिका अपनी तकनीकी और सैन्य आपूर्ति श्रृंखला को चीन के प्रभाव से मुक्त कराना चाहता है।
