अध्यात्म

ऑस्कर तक पहुंची महाराष्ट्र की आस्था, आखिर क्या है ये 'गोंधल', जानें इसका आध्यात्मिक महत्व

Gondhal: गोंधल मुख्य रूप से देवी जगदंबा, मां भवानी और रेणुका माता के साथ-साथ कुलदेवता खंडोबा के सम्मान में आयोजित किया जाने वाला एक धार्मिक अनुष्ठान है।

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क्या होता है गोंधल (AI Generated and newsroom verified image)

Gondhal: हाल ही में महाराष्ट्र की समृद्ध लोक संस्कृति पर आधारित मराठी फिल्म 'गोंधल' को ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भारत की तरफ से नॉमिनेट किया गया है। इस नॉमिनेशन के बाद से ही देश और दुनिया भर के लोग जानना चाहते हैं कि आखिर 'गोंधल' है क्या? इन सवालों के जवाब में बता दें कि गोंधल महाराष्ट्र की सदियों पुरानी बेहद पवित्र, ऊर्जावान और आध्यात्मिक परंपरा भी है।

क्या है गोंधल का आध्यात्मिक अर्थ?

गोंधल मुख्य रूप से देवी जगदंबा, मां भवानी और रेणुका माता के साथ-साथ कुलदेवता खंडोबा के सम्मान में आयोजित किया जाने वाला एक धार्मिक अनुष्ठान है। आध्यात्मिक दृष्टि से गोंधल का शाब्दिक और सांकेतिक अर्थ 'ईश्वरीय शक्ति का आह्वान' है।

ऐसी मान्यता है कि जब घर में गोंधल का आयोजन होता है, तो वहां से सभी नकारात्मक ऊर्जाएं, दरिद्रता और मानसिक विकार समाप्त हो जाते हैं। यह घर में सकारात्मकता, सुख-समृद्धि और मां जगदंबा की छत्रछाया स्थापित करने का एक दिव्य माध्यम माना जाता है।

रात में होता है गोंधल

गोंधल की एक खास पहचान इसका रात में आयोजित होना है। पारंपरिक रूप से गोंधली कलाकार घर या आंगन में इसकी प्रस्तुति करते हैं। बीच में पूजा की व्यवस्था की जाती है। देवी का प्रतीक रखा जाता है और उसके सामने दीप या मशाल जलाई जाती है।

इसके बाद गीत, वादन, नृत्य और कथाओं का सिलसिला शुरू होता है। कई बार यह प्रस्तुति कुछ समय चलती है तो कहीं लंबे समय तक भी जारी रहती है। इसका माहौल काफी ऊर्जावान होता है। ढोल की तेज लय, गीत और कलाकारों की आवाज मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिसमें धार्मिक आस्था और लोक कला दोनों साथ दिखाई देते हैं।

कौन होते हैं गोंधली?

गोंधल प्रस्तुत करने वाले पारंपरिक कलाकारों को ‘गोंधली’ कहा जाता है। ये लोग पीढियों से इस परंपरा को आगे बढाते आए हैं। गोंधली कलाकारों की प्रस्तुति में खास वेशभूषा दिखाई देती है। पारंपरिक रूप से वे लंबे ढीले कपडे पहनते हैं। गले में कौड़ियों की माला और पैरों में घुंघरू भी देखे जाते हैं। उनके साथ अलग-अलग वाद्य बजाने वाले कलाकार होते हैं।

संबल और तुंतूना की आवाज

गोंधल की आवाज को पहचानना हो तो उसके पारंपरिक वाद्य सुनिए। इसमें ‘संबल’ एक महत्वपूर्ण वाद्य है। यह एक तरह का दो तरफा ढोल है, जिसे बजाते हुए कलाकार तेज लय पैदा करते हैं। इसके साथ ‘तुंतूना’ यानी एक तार वाला वाद्य और झांझ जैसे वाद्यों का इस्तेमाल भी होता है।

ऑस्कर पहुंची मराठी फिल्म गोंधल (Source: Youtube)

ऑस्कर पहुंची मराठी फिल्म गोंधल (Source: Youtube)

इसमें कहानियां भी होती हैं

गोंधल की एक खासियत इसकी कथात्मक शैली है। कलाकार देवी की स्तुति करने के साथ पौराणिक और लोक कथाएं भी सुनाते हैं। इन कथाओं में देवी-देवताओं, लोक नायकों और धार्मिक प्रसंगों का वर्णन मिलता है।

यही वह खूबी है, जिसकी वजह से ऐसी लोक परंपराएं पीढ़ियों तक याद रहती हैं। बहुत से लोग इन्हें किताबों से नहीं, बल्कि अपने घर और गांव में देखकर सीखते हैं।

गोंधली की शुरुआत कब हुई?

गोंधल की शुरुआत को लेकर एक ही सर्वमान्य कहानी नहीं है। कुछ परंपराएं इसे देवी रेणुका और परशुराम की कथाओं से जोड़ती हैं। कुछ विद्वान इसकी जडें महाराष्ट्र की पुरानी लोक और धार्मिक परंपराओं में देखते हैं। ऐतिहासिक स्रोतों में भी इसके अलग-अलग रूपों का उल्लेख मिलता है। इसलिए इसकी कोई एक निश्चित शुरुआत बताना आसान नहीं है।

इतना जरूर है कि यह महाराष्ट्र की पुरानी धार्मिक लोक परंपराओं में शामिल रहा है और समय के साथ इसके गीत, वाद्य और प्रस्तुति के तरीके विकसित होते गए।

विवाह से लेकर मन्नत तक

गोंधल का संबंध खास तौर पर शुभ अवसरों से रहा है। कई परिवार विवाह के मौके पर इसे कराते हैं। कुछ जगहों पर मुंडन या दूसरे संस्कारों के बाद भी इसकी परंपरा निभाई जाती है। मन्नत पूरी होने पर देवी को धन्यवाद देने के लिए गोंधल कराने की परंपरा भी मिलती है। इसमें परिवार और रिश्तेदार भी शामिल होते हैं।

गोंधल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि इसमें लोक जीवन और आध्यात्मिकता अलग-अलग नहीं हैं। देवी की पूजा होती है। गीत गाए जाते हैं। ढोल बजता है। कलाकार नाचते हैं। पुरानी कथाएं सुनाई जाती हैं। परिवार साथ बैठता है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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