Harela 2026 Date: बरसात की पहली फुहारें जब सूखी धरती को राहत देती हैं, तो सिर्फ मौसम ही नहीं बदलता, लोगों के मन भी खिल उठते हैं। उत्तराखंड में इसी हरियाली के स्वागत का नाम है हरेला। यह ऐसा त्योहार है, जिसमें न बड़े पंडाल लगते हैं, न शोर-शराबा होता है। यहां घर के एक छोटे से कोने में बोए गए कुछ बीज पूरे परिवार के लिए खुशहाली और अच्छे भविष्य की कामना बन जाते हैं।
हरेला 2026 की डेट
साल 2026 में हरेला 16 जुलाई, गुरुवार को मनाया जाएगा। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में इस पर्व का खास महत्व है। अब धीरे-धीरे इसकी पहचान पूरे देश में 'ग्रीन फेस्टिवल' के तौर पर भी बनने लगी है।
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10 दिन पहले ही शुरू हो जाती है त्योहार की तैयारी
हरेला की सबसे खूबसूरत बात यही है कि इसकी शुरुआत त्योहार वाले दिन नहीं होती। करीब दस दिन पहले घर की महिलाएं या बड़े-बुजुर्ग छोटी टोकरी या मिट्टी के बर्तन में पांच, सात या नौ तरह के अनाज के बीज बोते हैं। हर दिन उन पर थोड़ा-सा पानी डाला जाता है और फिर इंतजार होता है उन नन्हे-नन्हे अंकुरों का।
दसवें दिन जब ये बीज हरे-पीले रंग की कोमल पत्तियों में बदल जाते हैं, तो इन्हें काटकर घर के हर सदस्य के सिर पर रखा जाता है। यह सिर्फ एक रस्म नहीं होती, बल्कि परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और लंबी उम्र की शुभकामना मानी जाती है। छोटी-सी परंपरा है, लेकिन इसके पीछे जुड़ी भावना बहुत बड़ी है।
शिव-पार्वती से भी जुड़ी है हरेला की मान्यता
हरेला का रिश्ता सिर्फ खेती से नहीं, आस्था से भी है। मान्यता है कि यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का प्रतीक है। शायद यही वजह है कि इस दिन नई शुरुआत, उर्वरता और खुशहाली की कामना की जाती है।
पहाड़ों में रहने वाले लोग हमेशा से प्रकृति को भगवान का रूप मानते आए हैं। इसलिए यहां पेड़, पौधे, बारिश और मिट्टी... सबकी अपनी अलग पूजा है। हरेला उसी सोच का सबसे सुंदर उदाहरण माना जाता है।
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आज पेड़ लगाने की मुहिम भी बन चुका है हरेला
समय के साथ हरेला का स्वरूप थोड़ा बदला है, लेकिन इसका संदेश वही है। अब इस दिन उत्तराखंड में बड़े स्तर पर पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं। स्कूल, कॉलेज, सरकारी विभाग और स्थानीय लोग मिलकर हजारों पौधे लगाते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कई परिवारों ने भी इसे अपनी परंपरा बना लिया है। घर में पूजा के साथ एक पौधा जरूर लगाया जाता है। क्योंकि उनका मानना है कि पेड़ लगाना भी उतना ही पुण्य है, जितना पूजा करना।
शायद इसलिए अब पहले से ज्यादा जरूरी है हरेला
आज जब हर साल गर्मी नए रिकॉर्ड बना रही है, बारिश का मिजाज बदल रहा है और हरियाली लगातार कम होती जा रही है, तब हरेला का संदेश और भी बड़ा नजर आता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि प्रकृति सिर्फ हमारी जरूरत नहीं, हमारी जिम्मेदारी भी है।
