अध्यात्म

भगवान के सामने दीपक दाईं ओर और धूप बाईं ओर ही क्यों रखी जाती है, जानिए क्यों है इसका खास महत्व

Diya And Dhoop Direction Significance: पूजा के समय भगवान के सामने दीपक दाईं ओर और धूप बाईं ओर रखने की परंपरा क्यों है? जानिए इसके पीछे की धार्मिक मान्यता, व्यवहारिक कारण और इसका पूजा में क्या महत्व माना जाता है।

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पूजा में दीपक दाईं ओर, तो धूप बाईं और क्यों?

Diya And Dhoop Direction Significance: पूजा-पाठ करते समय हम कई ऐसे नियमों का पालन करते हैं, जिन्हें बचपन से देखते और सीखते आए हैं। इन्हीं में से एक नियम है कि भगवान के सामने दीपक दाईं ओर और धूप या अगरबत्ती बाईं ओर रखी जाती है। ज्यादातर लोग ऐसा करते तो हैं, लेकिन इसके पीछे की वजह बहुत कम लोगों को पता होती है। दरअसल, सनातन परंपरा में पूजा का हर नियम किसी न किसी सोच और उद्देश्य से जुड़ा माना गया है। कुछ बातें धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं, तो कुछ के पीछे व्यवहारिक कारण भी बताए जाते हैं। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि पूजा के समय दीपक और धूप को इसी तरह रखने की परंपरा क्यों चली आ रही है।

दीपक दाईं ओर रखने की क्या मान्यता है

धार्मिक मान्यता के अनुसार दीपक उजाले, ज्ञान और शुभता का प्रतीक होता है। इसलिए पूजा के समय इसे भगवान की दाईं ओर रखा जाता है। सनातन परंपरा में दाईं दिशा को शुभ और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। ऐसा माना जाता है कि दीपक की रोशनी भगवान के साथ-साथ पूरे पूजा स्थान में सकारात्मक वातावरण बनाती है। यही वजह है कि पूजा में दीपक की जगह का विशेष ध्यान रखा जाता है।

धूप या अगरबत्ती बाईं ओर क्यों रखी जाती है

धूप और अगरबत्ती का काम पूरे वातावरण को सुगंधित और शांत बनाना होता है। इसे भगवान की बाईं ओर रखने की परंपरा इसलिए मानी जाती है ताकि उससे निकलने वाला धुआं सीधे दीपक की लौ तक न पहुंचे। अगर धुआं लगातार लौ से टकराए, तो लौ छोटी पड़ सकती है या बुझ भी सकती है। अलग-अलग जगह रखने से दीपक भी अच्छी तरह जलता रहता है और धूप की खुशबू भी पूरे कमरे में आसानी से फैल जाती है।

धार्मिक मान्यता के साथ जुड़ी है व्यवहारिक सोच

पूजा की कई परंपराओं के पीछे रोजमर्रा की समझ भी छिपी होती है। दीपक और धूप को थोड़ी दूरी पर रखने से आग और धुएं का संतुलन बना रहता है। इससे पूजा के दौरान किसी तरह की परेशानी नहीं होती। साथ ही पूजा का स्थान साफ-सुथरा और व्यवस्थित भी दिखाई देता है। यही कारण है कि यह तरीका वर्षों से अपनाया जाता रहा है।

क्या इसका कोई वैज्ञानिक पहलू भी है

वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो दीपक की लौ को लगातार जलते रहने के लिए स्थिर हवा की जरूरत होती है। वहीं धूप या अगरबत्ती से लगातार धुआं निकलता रहता है। अगर दोनों बहुत पास रखे जाएं, तो धुआं लौ को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इन्हें अलग-अलग जगह रखना एक व्यवहारिक तरीका माना जाता है। हालांकि, विज्ञान किसी खास दिशा को जरूरी नहीं मानता, लेकिन इस तरह की व्यवस्था पूजा के दौरान सुविधा जरूर देती है।

सबसे जरूरी है सच्ची श्रद्धा

धार्मिक विद्वानों का मानना है कि पूजा के नियम हमारी परंपरा और अनुशासन का हिस्सा हैं। दीपक दाईं ओर और धूप बाईं ओर रखना भी उसी परंपरा का एक नियम है। लेकिन पूजा का सबसे बड़ा आधार मन की श्रद्धा, विश्वास और एकाग्रता है। अगर किसी कारण से दीपक या धूप की जगह बदल भी जाए, तो इससे पूजा का भाव कम नहीं होता। इसलिए नियमों का सम्मान करें, लेकिन सबसे ज्यादा महत्व अपनी सच्ची आस्था और अच्छे भाव को दें।

Vineet
विनीतauthor

विनीत टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में हेल्थ डेस्क के साथ बतौर चीफ कॉपी एडिटर जुड़े हैं। दिल्ली के रहने वाले विनीत को हेल्थ, फिटनेस और न्यूट्रिशन जैसे विषयों पर गहरी समझ है। इन्होंने हेल्थ, फिटनेस, न्यूट्रिशन और सप्लीमेंट के फील्ड में प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन भी किए हैं। वे 6 साल से इस फील्ड से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर 7,000 से अधिक लेख लिख चुके हैं। विनीत की खासियत उनकी रिसर्च-बेस्ड लेखन शैली और जनहित को ध्यान में रखते हुए लिखी गई जानकारीपूर्ण स्टोरीज हैं।

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