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Dronacharya Mela: दनकौर में क्यों लगता है द्रोणाचार्य मेला, एकलव्य से जुड़ी है इसकी कहानी

Dronacharya Mela Kyon Lagta Hai: ग्रेटर नोएडा के दनकौर में द्रोणाचार्य मेला क्यों आयोजित होता है? जानें गुरु द्रोणाचार्य मंदिर, एकलव्य की कथा और मेले का इतिहास।

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दनकौर में द्रोणाचार्य मेला क्यों लगता है, क्या है इसका इतिहास

Dronacharya Mela Kyon Lagta Hai: नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बुधवार, 9 सितंबर 2026 को स्कूल-कॉलेज बंद रहने की खबर के बाद द्रोणाचार्य मेला चर्चा में है। कई लोगों के मन में सवाल है कि आखिर यह मेला कहां लगता है और इसका गुरु द्रोणाचार्य से क्या संबंध है?

यह प्रसिद्ध मेला ग्रेटर नोएडा के दनकौर में स्थित प्राचीन गुरु द्रोणाचार्य मंदिर के पास आयोजित होता है। इसकी पहचान केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं है। यह मेला महाभारत की स्मृतियों, स्थानीय परंपराओं और गुरु-शिष्य संबंध की कहानी को भी अपने भीतर समेटे हुए है।

साल 2026 में दनकौर का 103वां श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मेला 3 से 15 सितंबर तक आयोजित किया जा रहा है। 9 सितंबर को इसका प्रमुख आयोजन होने के कारण गौतमबुद्ध नगर में शैक्षणिक संस्थानों के लिए अवकाश घोषित किया गया है। गौतमबुद्ध नगर प्रशासन की 2026 अवकाश सूची में भी गुरु द्रोणाचार्य मेला शामिल है।

द्रोणाचार्य मेला कहां लगता है

द्रोणाचार्य मेला उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले के दनकौर कस्बे में लगता है। दनकौर ग्रेटर नोएडा के पास स्थित है। यहां मौजूद गुरु द्रोणाचार्य मंदिर को स्थानीय लोग महाभारत काल की स्मृतियों से जोड़कर देखते हैं।

मान्यता है कि प्राचीन समय में यह क्षेत्र गुरु द्रोणाचार्य की तपस्थली या शिक्षास्थली रहा था। कुछ स्थानीय कथाओं में दनकौर का पुराना नाम ‘द्रोण नगरी’ या ‘द्रोणकोर’ भी बताया जाता है। हालांकि, इन दावों को प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय स्थानीय धार्मिक मान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है।

दनकौर में द्रोणाचार्य मेला क्यों लगता है

दनकौर में यह मेला गुरु द्रोणाचार्य के सम्मान और क्षेत्र से जुड़ी महाभारतकालीन मान्यताओं को जीवित रखने के लिए लगाया जाता है। समय के साथ इसमें श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के उत्सव भी जुड़ गए। यही कारण है कि इसे कहीं गुरु द्रोणाचार्य मेला, कहीं द्रोण मेला और कहीं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मेला कहा जाता है।

परंपरागत रूप से मेले की शुरुआत जन्माष्टमी के आसपास होती है। कई दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में पहले मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।

मेले का एक उद्देश्य नई पीढ़ी को क्षेत्र की पुरानी मान्यताओं और लोक इतिहास से परिचित कराना भी है। यहां आने वाला व्यक्ति केवल मंदिर में दर्शन नहीं करता, बल्कि दनकौर की सांस्कृतिक पहचान को भी करीब से महसूस करता है।

एकलव्य से कैसे जुड़ी है दनकौर की कहानी

दनकौर के गुरु द्रोणाचार्य मंदिर से एकलव्य की कथा भी जुड़ी हुई है। महाभारत के अनुसार एकलव्य धनुर्विद्या सीखना चाहते थे। गुरु द्रोणाचार्य से प्रत्यक्ष शिक्षा न मिल पाने पर उन्होंने मिट्टी की उनकी प्रतिमा बनाई और उसी को गुरु मानकर अभ्यास करने लगे।

लगातार साधना से एकलव्य श्रेष्ठ धनुर्धर बन गए। जब गुरु द्रोणाचार्य को उनकी प्रतिभा का पता चला तो उन्होंने गुरु दक्षिणा में एकलव्य के दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने बिना झिझक अपना अंगूठा अर्पित कर दिया।

दनकौर की स्थानीय मान्यता है कि एकलव्य ने यहीं गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर अभ्यास किया था। मंदिर परिसर में एकलव्य द्वारा बनाई गई मानी जाने वाली द्रोणाचार्य की प्रतिमा के दर्शन भी किए जाते हैं। दनकौर के द्रोणाचार्य मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं में एकलव्य उद्यान और प्राचीन तालाब का भी उल्लेख मिलता है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से क्या है मेले का संबंध

द्रोणाचार्य मेला सामान्यतः श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के आसपास आयोजित किया जाता है। इसलिए इसके धार्मिक कार्यक्रमों में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की झलक भी दिखाई देती है। मंदिर में विशेष पूजा, झांकी और भजन-कीर्तन होते हैं।

द्रोणाचार्य महाभारत के महत्वपूर्ण पात्र हैं, जबकि श्रीकृष्ण महाभारत की पूरी कथा के केंद्र में हैं। संभवतः इसी सांस्कृतिक जुड़ाव के कारण स्थानीय आयोजन ने समय के साथ एक बड़े जन्माष्टमी मेले का रूप ले लिया। जन्माष्टमी से शुरू होने वाला यह आयोजन लगभग दस दिन या निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उससे अधिक समय तक चल सकता है।

द्रोणाचार्य मेले में क्या-क्या होता है

यह मेला आस्था के साथ मनोरंजन और लोक संस्कृति का भी उत्सव बन चुका है। इसके अलग-अलग दिनों में कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जैसे

  • गुरु द्रोणाचार्य मंदिर में विशेष पूजा
  • श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और धार्मिक झांकियां
  • कुश्ती और पारंपरिक खेल प्रतियोगिताएं
  • रागिनी और लोकगीत कार्यक्रम
  • ऐतिहासिक एवं धार्मिक नाटक
  • कवि सम्मेलन
  • बच्चों के झूले और मनोरंजन के साधन
  • खिलौनों, मिठाइयों और घरेलू सामान की दुकानें

कुश्ती और दूसरी खेल प्रतियोगिताएं मेले की खास पहचान मानी जाती हैं। इन्हें गुरु द्रोणाचार्य की शस्त्र शिक्षा और अखाड़ा परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।

द्रोणाचार्य मेले पर छुट्टी क्यों होती है

द्रोणाचार्य मेले में दनकौर और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। प्रमुख आयोजन के दिन सड़कों पर भीड़ और वाहनों का दबाव काफी बढ़ जाता है। इसी वजह से प्रशासन स्थानीय अवकाश घोषित कर सकता है।

साल 2026 में मुख्य आयोजन को देखते हुए 9 सितंबर को गौतमबुद्ध नगर के सरकारी, परिषदीय और निजी स्कूल-कॉलेज बंद रखने का आदेश जारी किया गया। यह फैसला श्रद्धालुओं की सुविधा, बच्चों की सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को संभालने के लिए लिया गया है।

केवल मेला नहीं, दनकौर की पहचान है यह आयोजन

द्रोणाचार्य मेला आज भले ही झूलों, दुकानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भरा दिखाई देता हो, लेकिन इसकी जड़ें स्थानीय आस्था में हैं। यह आयोजन लोगों को गुरु द्रोणाचार्य, एकलव्य और महाभारत की उन कहानियों से जोड़ता है, जिन्हें पीढ़ियां सुनती आई हैं।

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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