भारत में Satellite Internet यानी सैटेलाइट के जरिए हाई-स्पीड इंटरनेट उपलब्ध कराने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। दूरसंचार विभाग के निर्णायक निकाय डिजिटल संचार आयोग (DCC) ने सैटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विस (Satellite Communication Services) के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) की ज्यादातर सिफारिशों को मंजूरी दे दी है। DCC की यह मंजूरी भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं की शुरुआत का रास्ता साफ करने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
क्या है पूरा मामला?
मामले से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, 3 सितंबर को हुई DCC की बैठक में सैटेलाइट कम्युनिकेशन यानी Satcom सेवाओं के लिए TRAI की सिफारिशों को मंजूरी दी गई। अब दूरसंचार विभाग सैटेलाइट सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम की कीमत और उसके आवंटन की प्रक्रिया को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने रखेगा। इसका मतलब है कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट (Satellite Internet) शुरू करने की दिशा में अभी एक और महत्वपूर्ण सरकारी प्रक्रिया पूरी होनी बाकी है।
जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशन/Photo-AI
भारत में कई बड़ी कंपनियां पहले ही इस क्षेत्र में उतरने की तैयारी कर चुकी हैं। एलन मस्क की Starlink, भारती समूह समर्थित Eutelsat OneWeb और Reliance की Jio Satellite Communications को देश में सैटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विस शुरू करने की अनुमति मिल चुकी है। हालांकि, सिर्फ अनुमति मिलने से सेवाएं शुरू नहीं की जा सकतीं। कंपनियों को स्पेक्ट्रम आवंटन के साथ सुरक्षा एजेंसियों से दूसरे चरण की सुरक्षा मंजूरी भी हासिल करनी होगी।
कैसे काम करता है सैटेलाइट इंटरनेट?
सैटेलाइट इंटरनेट में इंटरनेट कनेक्शन पहुंचाने के लिए जमीन पर बिछे फाइबर केबल या केवल मोबाइल टावर पर निर्भर रहने के बजाय सैटेलाइट का इस्तेमाल किया जाता है। यूजर के घर या ऑफिस में एक विशेष Satellite Dish या Terminal लगाया जाता है, जो आसमान में मौजूद उपग्रह से सीधे कम्युनिकेशन करता है।
कैसे काम करता है सैटेलाइट इंटरनेट?
अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग Orbit में मौजूद Satellites का इस्तेमाल कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, Low Earth Orbit यानी LEO Satellites पृथ्वी के काफी करीब होते हैं। इनकी दूरी कम होने की वजह से Data Latency यानी डेटा भेजने और प्राप्त करने में होने वाली देरी कम रखने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि LEO आधारित सैटेलाइट इंटरनेट को तेज कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
TRAI ने स्पेक्ट्रम को लेकर क्या सिफारिश की थी?
TRAI ने मई 2025 में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड के लिए स्पेक्ट्रम को पांच साल की अवधि के लिए आवंटित करने की सिफारिश की थी। इस अवधि को दो साल और बढ़ाने का विकल्प भी रखा गया था। नियामक ने सैटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विस प्रावाइडर से सालाना एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (Adjusted Gross Revenue) यानी AGR का 4 प्रतिशत स्पेक्ट्रम फीस लेने की सिफारिश की थी।
हालांकि, यहां सरकार और कंपनियों के बीच शुल्क को लेकर अंतर दिखाई देता है। सूत्रों के अनुसार, दूरसंचार विभाग 5 प्रतिशत स्पेक्ट्रम फीस लगाने के पक्ष में है। दूसरी ओर, Starlink और Amazon की सैटेलाइट इंटरनेट कंपनी Kuiper Systems ने TRAI के परामर्श के दौरान स्पेक्ट्रम फीस को AGR के 1 प्रतिशत से भी कम रखने और कोई अन्य शुल्क नहीं लगाने की मांग की थी।
GEO और NGSO Satellites में क्या अंतर है?
TRAI की सिफारिश के अनुसार, Geostationary Orbit यानी GSO और Non-Geostationary Satellite Orbit यानी NGSO, दोनों तरह के Satellite Operators से AGR का 4 प्रतिशत स्पेक्ट्रम फीस लिया जाना प्रस्तावित है। इसके लिए न्यूनतम सालाना शुल्क 3,500 रुपये प्रति MHz रखा गया है।
NGSO में Low Earth Orbit (LEO) और Medium Earth Orbit (MEO) में मौजूद Satellites शामिल होते हैं। वहीं GSO Satellites पृथ्वी के सापेक्ष एक निश्चित स्थिति में दिखाई देते हैं। सैटेलाइट इंटरनेट की तकनीक और उसकी परफॉरमेंस पर सैटेलाइट की Orbit का सीधा असर पड़ता है।
शहरों और गांवों में क्या होगा फायदा?
सैटेलाइट इंटरनेट का सबसे बड़ा फायदा उन इलाकों को हो सकता है जहां फाइबर ब्रॉडबैंड या मोबाइल नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल और महंगा है। देश के दूरदराज के गांवों, पहाड़ी क्षेत्रों, द्वीपों और ऐसे इलाकों में जहां टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर सीमित है, सैटेलाइट कनेक्टिविटी इंटरनेट पहुंचाने का विकल्प बन सकती है।
TRAI ने शहरी क्षेत्रों में सेवा देने वाले सैटेलाइट ऑपरेटर्स पर प्रति ग्राहक सालाना 500 रुपये का अतिरिक्त शुल्क लगाने की भी सिफारिश की है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी अतिरिक्त फीस नहीं रखने का प्रस्ताव है। इससे ग्रामीण और कम कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड को बढ़ावा देने की कोशिश दिखाई देती है।
आम यूजर के लिए क्या बदलेगा?
अगर सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस बड़े स्तर पर लॉन्च होती हैं, तो भारतीय इंटरनेट बाजार में एक नया विकल्प जुड़ जाएगा। इसका फायदा सिर्फ उन लोगों को नहीं मिलेगा जहां अभी ब्रॉडबैंड या मोबाइल नेटवर्क कमजोर है, बल्कि प्रतिस्पर्था बढ़ने से इंटरनेट कंपनियों को बेहतर कवरेज, स्पीड और सर्विस देने के लिए भी प्रोत्साहन मिल सकता है।
हालांकि, सैटेलाइट इंटरनेट की शुरुआती कीमत, उपकरणों की कीमत और मासिक सब्सक्रिप्शन आम ब्रॉडबैंड सर्विस की तुलना में कितनी होगी, यह अभी महत्वपूर्ण सवाल है। इसलिए इसकी असली पहुंच इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां भारत में अपनी सर्विस की कीमत किस स्तर पर रखती हैं।
कुल मिलाकर, DCC की मंजूरी भारत में सैटेलाइट इंटरनेट की राह में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब स्पेक्ट्रम की कीमत और आवंटन को लेकर अंतिम फैसला होने के बाद Starlink, OneWeb और Jio जैसी कंपनियों के लिए अगला चरण शुरू होगा। अगर बाकी प्रक्रियाएं भी पूरी होती हैं, तो आने वाले समय में भारत के इंटरनेट इकोसिस्टम में सैटेलाइट कनेक्टिविटी एक अहम भूमिका निभा सकती है।
