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दिल्ली-NCR के PG कितने सुरक्षित? मकानों को हॉस्टल में बदलने का खेल धड़ल्ले से जारी, कौन जांचता है ऐसे भवनों की सुरक्षा?

लाखों छात्र-छात्राओं और कामकाजी युवाओं को पनाह देने वाले ये पीजी सुरक्षा और निर्माण मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। आखिर घर से हॉस्टल बने भवनों की सुरक्षा कौन जांचता है, कैसे हो रही नियमों की अनदेखी और कौन है जिम्मेदार?

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दिल्ली में अवैध PG हॉस्टल का खेल पड़ा भारी

Photo : PTI

साउथ-वेस्ट दिल्ली के सत्या निकेतन में 4 मंजिला इमारत ढहने और 6 लोगों की मौत के बाद दिल्ली-एनसीआर में चल रहे पेइंग गेस्ट (PG) और अनधिकृत हॉस्टलों की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ और नॉर्थ कैंपस, मुखर्जी नगर, लक्ष्मी नगर, नोएडा के सेक्टर-62 और गुरुग्राम के साइबर सिटी जैसे इलाकों में रिहायशी मकानों को व्यावसायिक पीजी में बदलने की अंधाधुंध होड़ मची है। लाखों छात्र-छात्राओं और कामकाजी युवाओं को पनाह देने वाले ये पीजी सुरक्षा और निर्माण मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। आखिर घर से हॉस्टल बने भवनों की सुरक्षा कौन जांचता है, कैसे हो रही नियमों की अनदेखी और कौन है जिम्मेदार?

रिहायशी मकान से PG बनने का खेल

सुरक्षा नियमों की बलिदिल्ली-एनसीआर में आवासीय भवनों को पीजी में बदलना एक बेहद मुनाफेवाला व्यवसाय बन चुका है, लेकिन इस प्रक्रिया में सुरक्षा मानकों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। तीन से चार मंजिल की अनुमति वाले प्लाटों पर बिना स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट के 5 से 6 मंजिलें खड़ी कर दी जाती हैं। नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से निर्माण किया जाता है, लेकिन स्थानीय प्रशासन और एमसीडी आंखें मूंद लेती हैं।

मुनाफे के लिए जिंदगी से सौदा

अधिक मुनाफा कमाने के लिए बड़े कमरों को पतले प्लायवुड या ईंट की दीवारों से छोटे-छोटे केबिन जैसे कमरों में बांट दिया जाता है। इससे इमारत का वजन असामान्य रूप से बढ़ जाता है और हवा व रोशनी का रास्ता बंद हो जाता है। अधिकतर पीजी संकरी गलियों में स्थित हैं, जहां आपात स्थिति यानी आग या भूकंप की स्थिति में न तो भागने के लिए चौड़ा रास्ता होता है और न ही फायर ब्रिगेड की गाड़ियां पहुंच सकती हैं। ऐसे में हालात और बिगड़ जाते हैं, राहत और बचाव कार्य भी प्रभावित होता है, नतीजतन मौतों का आंकड़ा बढ़ जाता है। साफ कहें तो नियमों को ताक पर बनाए गए ऐसे पीजी किसी भी तरह से सुरक्षित नहीं होते हैं।

घर से हॉस्टल बने भवनों की सुरक्षा कौन जांचता है?

कागजों पर एजेंसियों के पास सख्त नियम हैं, लेकिन हकीकत की धरातल पर जांच व्यवस्था लगभग ठप है। आखिर किन एजेंसियों पर है जांच करने की जिम्मेदारी, और हकीकत में होता क्या है, समझते हैं-

निकाय / एजेंसी - एमसीडी या नगर निगम

  • जिम्मेदारी: बिल्डिंग प्लान की मंजूरी, अवैध निर्माण की सीलिंग और कमर्शियल एक्टिविटी का चालान।
  • जमीनी हकीकत: सिर्फ शिकायत मिलने या बड़ा हादसा होने के बाद ही कार्रवाई होती है।

एजेंसी - फायर विभाग

  • जिम्मेदारी: 15 मीटर से ऊंची इमारतों के लिए फायर NOC और स्प्रिंकलर/सिलेंडर की जांच।
  • जमीनी हकीकत: 15 मीटर से कम ऊंची इमारतों को फायर एनओसी की अनिवार्यता से छूट का फायदा उठाकर मकान मालिक बच निकलते हैं।

एजेंसी- स्थानीय पुलिस

  • जिम्मेदारी: पीजी का रजिस्ट्रेशन, टेनेंट वेरिफिकेशन (किरायेदार सत्यापन) और सुरक्षा निरीक्षण।
  • जमीनी हकीकत: पुलिस का ध्यान मुख्य रूप से सिर्फ वेरिफिकेशन फॉर्म जमा करने तक सीमित रहता है, स्ट्रक्चरल सेफ्टी पर नहीं।

पीजी में रहने वालों की सुरक्षा से खिलवाड़

  • फायर सेफ्टी शून्य: 90% से अधिक पीजी में न तो इमरजेंसी एग्जिट यानी आपातकालीन द्वार होते हैं और न ही आग बुझाने वाले सिलेंडर।
  • ओवरलोडिंग और शॉर्ट सर्किट: हर कमरे में एसी, गीजर, इंडक्शन और इंडिविजुअल मीटर लगने से बिजली का लोड स्वीकृत सीमा से कई गुना बढ़ जाता है, जिससे शॉर्ट सर्किट की घटनाएं आम हैं।
  • कोई स्ट्रक्चरल ऑडिट नहीं: 20 से 30 साल पुरानी जर्जर इमारतों में बिना नींव मजबूत किए अतिरिक्त मंजिलें बना दी जाती हैं, जिनकी कोई तकनीकी जांच नहीं होती।

प्रशासनिक ढिलाई और छात्रों का आक्रोश

सत्या निकेतन हादसे के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) सहित कई छात्र संगठनों ने एमसीडी और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया है। छात्रों का आरोप है कि नगर निगम और पुलिस प्रशासन की मिलीभगत व ढिलाई के कारण मकान मालिक सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर छात्रों की जान जोखिम में डालते हैं।हादसे के बाद दिल्ली नगर निगम ने 4 मंजिल से ऊंची अवैध इमारतों को सील करने के निर्देश दिए हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह कार्रवाई कुछ दिनों के अभियानों तक सीमित रहेगी या एनसीआर के लाखों पीजी के लिए कोई स्थायी स्ट्रक्चरल और फायर ऑडिट नीति बनेगी?

मौतों का जिम्मेदार कौन?

यह हादसा सिर्फ एक अवैध बेसमेंट या कमजोर बिल्डिंग की कहानी नहीं है। असली सवाल है कि जब बिल्डिंग का नक्शा ही मंजूर नहीं था, बेसमेंट निर्माण अवैध था और फायर NOC भी नहीं था, तो वहां सालों तक PG कैसे चलता रहा? इस मामले में साफ तौर पर दिखता है कि जिम्मेदारी न सिर्फ सरकार की बनती है, बल्कि निकाय और पुलिस की भी है। इस तरह के निर्माण कार्यों को लेकर सरकार उदासीन बनी रहती है और स्थानीय निकाय और पुलिस भी चुप्पी साधे रखती है। नियमों की खुलेआम की चिंता न सरकार को रहती है न एमसीडी और पुलिस को। एजेंसियां और सरकार तभी जागती हैं, जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है। एजेंसियों और प्रशासन को शुरुआत से ही अवैध निर्माणों पर सतर्क रहना चाहिए, लेकिन ये आंखें मूंदे बैठी रहती हैं, जब तक कि कोई हादसा न हो जाए।

हादसों के बाद ही जागती है सरकार

ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब सरकार और प्रशासन की उदासीनता साफ नजर आई है। लेकिन हादसों के बाद भी इनकी नींद नहीं खुली। इससे पहले 3 जून 2026 को दिल्ली के मालवीय नगर में एक होटल में लगी भयंकर आग में 23 लोगों की मौत हुई थी। तब भी दिल्ली सरकार ने बडे़ बड़े दावे किए थे, उस पर कितना काम हुआ, इसकी जानकारी किसी को नहीं है, न ही कोई फॉलो अप लिया या दिया गया। अब पीजी हॉस्टल गिरने की घटना सामने आ गई है जिससे अवैध मंजिलों के निर्माण और पीजी बनाने के नियमों की ओर ध्यान जा रहा है। एमसीडी और सरकार के सख्त बयान आ रहे हैं, लेकिन जैसे ही घटना पुरानी हो जाएगी, हमेशा की तरह नियम भी भुला दिए जाएंगे।

Amit Mandal
अमित कुमार मंडलauthor

अमित मंडल टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में न्यूज डेस्क पर Assistant Editor के रूप में काम कर रहे हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल—तीनों माध्यमों में कुल मिलाकर 15 सालों से अधिक का अनुभव उन्हें खबरों को देखने की व्यापक दृष्टि देता है। ब्रेकिंग न्यूज, लाइव ब्लॉग, स्पेशल स्टोरीज और एक्सप्लेनेर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। एंगल चुनने की कला, खबरों की गति को समझना और समय पर सही जानकारी पहुंचाना—ये उनकी सबसे बड़ी खूबियां हैं। अमित अपने करियर में करीब 20 हजार से अधिक न्यूज आर्टिकल, एनालिसिस और एक्सप्लेनर पब्लिश कर चुके हैं।

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