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सवाल कितना भी बदतमीजी से पूछा जाए, जवाब तमीज से दें- क्यों जरूरी है सुष्मिता सेन की सलाह?

सामने वाला क्या कहेगा, यह हमारे नियंत्रण में नहीं। लेकिन उसके जवाब में हम क्या चुनते हैं, यह जरूर हमारे हाथ में है।

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हर किसी के लिए क्यों जरूरी है सुष्मिता सेन को मिली ये सीख (Photo: Sushmita Sen insta)

किसी का लहजा खराब हो तो उसी अंदाज में जवाब देना आसान लगता है, लेकिन सुष्मिता सेन (Sushmita Sen) को 21 साल की उम्र में मिली एक सलाह ने उन्हें सिखाया कि सामने वाले के व्यवहार से ज्यादा जरूरी है कि आप खुद कैसे पेश आते हैं।

करियर के शुरुआत में सुष्मिता सेन को किसी ने कहा था- आपसे सवाल कितना भी बदतमीजी से पूछा जाए, जवाब हमेशा तहजीब से देना। वजह भी उन्होंने याद रखी: इतिहास सवाल को याद नहीं रखेगा, जवाब को याद रखेगा। यह बात उनके जेहन में इतनी गहराई से बैठी कि सार्वजनिक जीवन में असहमति जताते हुए भी अपनी बात सम्मान के साथ रखना उनकी आदत बन गई। सुष्मिता ने इस बात को गांठ बांध ली कि सामने वाला आपको कितना भी उकसाए, अपनी प्रतिक्रिया का नियंत्रण उसके हाथ में न दें।

तहजीब का मतलब कमजोर होना नहीं

काउंसलिंग साइकोलॉजिस्टस के मुताबिक, सम्मानजनक प्रतिक्रिया का अर्थ सबको खुश करना या जरूरत से ज्यादा विनम्र बनना नहीं है। इसे असर्टिव कम्युनिकेशन यानी दृढ़ संवाद के रूप में समझना बेहतर है, जहां आप अपनी बात साफ रखते हैं, लेकिन न खुद को छोटा करते हैं और न सामने वाले पर चिल्लाते हैं। मतलब कि किसी की बदतमीजी का जवाब देना जरूरी हो सकता है, लेकिन जवाब का लहजा आपके हाथ में रहता है।

गुस्से में पीछे छूट जाता है मुद्दा

मान लीजिए किसी मीटिंग में कोई आपसे रूखे तरीके से बात करता है और आप भी आवाज ऊंची कर देते हैं। कुछ ही देर में बातचीत का केंद्र उसके व्यवहार के बजाय आपका लहजा बन सकता है। इसके उलट, अगर आप शांत रहते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराते हैं तो बातचीत पर आपका नियंत्रण बना रहता है। ऐसी प्रतिक्रिया आत्मसम्मान और भावनात्मक नियंत्रण दोनों को बचाती है।

आपका जवाब बनता है आपकी पहचान

सुष्मिता को मिली इस सीख को हम भी अपने जीवन में आसानी से उतार सकते हैं। आज सोशल मीडिया से लेकर ऑफिस और निजी रिश्तों तक, लोग अक्सर एक-दूसरे की बात का जवाब तुरंत देते हैं। ऐसे में प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ पल रुकना कई बार पूरी बातचीत की दिशा बदल सकता है।

सामने वाला क्या कहेगा, यह हमारे नियंत्रण में नहीं। लेकिन उसके जवाब में हम क्या चुनते हैं, यह जरूर हमारे हाथ में है। सुष्मिता की सीख का सार भी इतना ही है कि किसी और की बदतमीजी को अपनी भाषा मत बनने दीजिए। क्योंकि अंत में सवाल किसने कैसा पूछा था, यह शायद भूल जाएं; लेकिन आपने खुद को किस तरह संभाला था, वह आपकी पहचान का हिस्सा बन सकता है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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