विशेषज्ञों के अनुसार, गाय के गोबर में ऐसे बैक्टीरिया ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं जो गैस बनाने में मदद करते हैं। ये बैक्टीरिया गोबर को जल्दी सड़ाकर उससे मीथेन गैस निकालते हैं। यही मीथेन गैस गोबर गैस के रूप में इस्तेमाल होती है। वहीं भैंस के गोबर में ये बैक्टीरिया अपेक्षाकृत कम होते हैं, जिससे गैस बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
गाय के गोबर में पानी और फाइबर का संतुलन सही होता है, जिससे यह आसानी से घुल जाता है और गैस प्लांट में अच्छे से काम करता है। दूसरी ओर, भैंस का गोबर ज्यादा गाढ़ा और भारी होता है, जिससे उसे प्रोसेस करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है और गैस उत्पादन कम होता है।
गाय के गोबर से ज्यादा और तेजी से गैस बनती है, जबकि भैंस के गोबर से गैस कम मात्रा में निकलती है। यही कारण है कि किसान और ग्रामीण लोग गाय के गोबर को प्राथमिकता देते हैं।
गोबर से बनी गैस न सिर्फ सस्ती होती है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित होती है। इसके बाद बचा हुआ स्लरी (अवशेष) खेतों के लिए बेहतरीन खाद बन जाता है। भैंस के गोबर का भी उपयोग हो सकता है, लेकिन उतना प्रभावी नहीं माना जाता।