अरवरी नदी राजस्थान के अलवर जिले में थानागाजी ब्लॉक के भानेटा गांव से निकलती है। प्राचीन अरावली की पहाड़ियों से शुरू होने वाली यह धारा राजस्थान के शुष्क परिदृश्य से गुजरती हुई अंततः अलवर के सरस गांव के पास साहिबी (साई) नदी में मिल जाती है। अपनी यात्रा के दौरान यह छोटे-छोटे गांवों और खेतों को जीवन देती है।
एक समय था जब अरवरी पूरी तरह से सूख चुकी थी। अंधाधुंध वनों की कटाई और भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण लगभग छह दशकों तक यह नदी अस्तित्वहीन रही। इसके सूखने से इलाके का कृषि ढांचा चरमरा गया, कुएं सूख गए और ग्रामीण पलायन करने को मजबूर हो गए। अरवरी का सूखना राजस्थान के जल संकट का एक भयावह प्रतीक बन गया था।
1980 के दशक के उत्तरार्ध में इस बंजर भूमि की किस्मत तब बदली जब 'तरुण भारत संघ' (NGO) और स्थानीय ग्रामीणों ने हार न मानने का फैसला किया। उन्होंने पारंपरिक जल संचयन तकनीकों को अपनाया। बिना किसी सरकारी सहायता के, ग्रामीणों ने अपने श्रम और मिट्टी से छोटे-छोटे बांध बनाने शुरू किए, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'जोहड़' कहा जाता है।
मिट्टी के इन छोटे बांधों का उद्देश्य बारिश के पानी को रोकना था ताकि वह बहकर बर्बाद न हो और जमीन के अंदर रिस सके। धीरे-धीरे इन प्रयासों का असर दिखने लगा। जमीन का जलस्तर ऊपर आया और दशकों की खामोशी के बाद अरवरी नदी में फिर से पानी कलकल करने लगा। आज यह नदी राजस्थान के शुष्क इलाकों में भी साल भर बहती है।
नदी के पुनरुद्धार के बाद ग्रामीणों ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया, और वह था 'अरवरी नदी संसद' का गठन। यह भारत में अपनी तरह की पहली सामुदायिक संस्था है जहां नदी के किनारे बसे गांवों के प्रतिनिधि हर साल मिलते हैं। यहाँ नदी के पानी के उपयोग, मछली पकड़ने के नियम और प्रदूषण रोकने के कड़े फैसले लिए जाते हैं। यह 'पीपुल्स गवर्नेंस' का सबसे सटीक उदाहरण है।
अरवरी के फिर से बहने से इलाके की पूरी तस्वीर बदल गई। जो खेत कभी बंजर थे, वहां अब गेहूं, सरसों और हरी सब्जियों की लहलहाती फसलें दिखती हैं। जैव विविधता भी वापस लौट आई है; नदी में मछलियां और आसपास के इलाकों में पक्षियों का कलरव फिर से सुनाई देने लगा है। इसने साबित कर दिया कि प्रकृति को अगर थोड़ा सहारा मिले, तो वह खुद को फिर से संवार लेती है।
आज अरवरी नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि जल संरक्षण का एक उदाहरण है। दुनिया भर के पर्यावरणविद और छात्र यह सीखने यहां आते हैं कि कैसे सामूहिक इच्छाशक्ति और पारंपरिक बुद्धिमत्ता के तालमेल से एक 'मृत' नदी को फिर से जीवित किया जा सकता है। अरवरी हमें सिखाती है कि छोटी शुरुआत भी बड़े बदलाव ला सकती है।