जन्माष्टमी के अगले दिन होता है दही-हांडी का आयोजन, जानें इसका भगवान कृष्ण से संबंध

जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाने वाला दही-हांडी उत्सव भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा है। माखन-दही की मटकी फोड़ने की यह परंपरा कृष्ण के माखन प्रेम, नटखट स्वभाव और सामूहिकता की भावना को दर्शाती है।

Authored by: gulshan kumarUpdated Sep 5 2026, 13:00 IST
​भगवान की लीलाओं से जुड़ाव​Image Credit : Canva01 / 07

​भगवान की लीलाओं से जुड़ाव​

भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं भक्तों के बीच हमेशा से आकर्षण का केंद्र रही हैं। जन्माष्टमी पर उनके जन्म का उत्सव मनाने के बाद अगले दिन कई जगहों पर दही-हांडी का आयोजन किया जाता है। खासतौर पर महाराष्ट्र, गुजरात और देश के कुछ अन्य हिस्सों में यह पर्व बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दही-हांडी की परंपरा का संबंध सीधे भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा है?

​ऊंचाई पर क्यों बांधी जाती है हांडी?​Image Credit : Canva02 / 07

​ऊंचाई पर क्यों बांधी जाती है हांडी?​

कृष्ण और उनके सखा ऊंचाई पर रखी मटकी तक पहुंचने के लिए एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते थे। दही-हांडी में इसी बाल लीला को प्रतीकात्मक रूप से दोहराया जाता है। एक मटकी को काफी ऊंचाई पर रस्सी से बांधा जाता है और युवाओं की टोली मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ती है।

​माखन के लिए कृष्ण करते थे नटखट लीला​Image Credit : Canva03 / 07

​माखन के लिए कृष्ण करते थे नटखट लीला​

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाल कृष्ण को माखन और दही बेहद प्रिय था। गोकुल में जब घरों में माखन-दही मटकों में ऊंचाई पर रखा जाता था, तब कृष्ण अपने सखाओं के साथ मिलकर उसे चुराने की कोशिश करते थे। इसी वजह से उन्हें प्रेम से माखनचोर भी कहा जाता है।

​दही-हांडी में छिपा है एक खास संदेश​Image Credit : Canva04 / 07

​दही-हांडी में छिपा है एक खास संदेश​

दही-हांडी केवल मनोरंजन या प्रतियोगिता नहीं है। यह एकता, सहयोग और सामूहिक प्रयास का संदेश भी देती है। हांडी तक पहुंचने के लिए पूरी टोली को एक-दूसरे पर भरोसा करना पड़ता है। यही भावना भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं में भी दिखाई देती है।

​माखन क्यों था कृष्ण को प्रिय?​Image Credit : Canva05 / 07

​माखन क्यों था कृष्ण को प्रिय?​

धार्मिक कथाओं में माखन को सादगी, प्रेम और निर्मलता का प्रतीक माना जाता है। कृष्ण का माखन चुराना उनकी बाल सुलभ चंचलता को दर्शाता है। भक्तों के लिए उनकी यह लीला भगवान और भक्त के बीच सहज प्रेम और अपनत्व का भाव भी प्रकट करती है।

​जन्माष्टमी के बाद क्यों मनाया जाता है?​Image Credit : Canva06 / 07

​जन्माष्टमी के बाद क्यों मनाया जाता है?​

जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव है, जबकि दही-हांडी उनके बाल स्वरूप की लीलाओं की याद दिलाती है। इसलिए कई स्थानों पर जन्माष्टमी के अगले दिन दही-हांडी का आयोजन किया जाता है। इस दौरान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा और भजन-कीर्तन भी किए जाते हैं।

​उत्सव में दिखता है कृष्ण की बाल लीलाओं का रंग​Image Credit : Canva07 / 07

​उत्सव में दिखता है कृष्ण की बाल लीलाओं का रंग​

दही-हांडी के दौरान सजाई गई मटकी, कृष्ण के भजन, संगीत और गोविंदा की टोलियां पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं। इस तरह यह पर्व भगवान कृष्ण की नटखट बाल लीलाओं को याद करने के साथ-साथ समाज में सहयोग, भाईचारे और सामूहिकता की भावना को भी मजबूत करता है।

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