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जिंदगी का पूरा फलसफा है नैना-बनी का ये सीन, Academy ने भी अपने अकाउंट पर किया शेयर

The Academy ने 'ये जवानी है दीवानी' का नैना-बनी वाला चर्चित सीन शेयर किया है। जानिए क्यों दीपिका पादुकोण और रणबीर कपूर पर उदयपुर फोर्ट पर सनसेट के समय फिल्माया गया यह सीन 13 साल बाद भी जिंदगी की बड़ी सीख देता है।

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नैना-बनी का सीन कैसे देता है जीवन की बड़ी सीख

फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ को रिलीज हुए 13 साल हो चुके हैं, लेकिन फिल्म के कुछ सीन और संवाद आज भी पुराने नहीं लगे। अब द एकेडमी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर फिल्म का नैना-बनी वाला खूबसूरत सीन शेयर किया है। इसके बाद रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के प्रशंसकों की पुरानी यादें एक बार फिर ताजा हो गईं।

वीडियो के साथ एकेडमी ने लिखा - A reminder from Naina to enjoy what’s right in front of you. इसका सीधा-सा अर्थ है कि नैना की बात याद रखें कि जो अभी आपके सामने है, पहले उसका आनंद लीजिए।

इस सीन में नैना, बनी को समझाती है कि जिंदगी में सब कुछ हासिल करना संभव नहीं। हम कितना भी प्रयास कर लें, कुछ न कुछ छूटेगा ही। इसलिए बेहतर है कि इंसान जहां है, उस पल को भरपूर जी ले। बात बहुत साधारण लगती है, लेकिन शायद यही जिंदगी का सबसे मुश्किल सबक भी है।

आखिर किस सीन को Academy ने किया शेयर

यह दृश्य अयान मुखर्जी के निर्देशन में बनी ‘ये जवानी है दीवानी’ का है। फिल्म में रणबीर कपूर ने कबीर थापर उर्फ बनी और दीपिका पादुकोण ने नैना तलवार की भूमिका निभाई थी।

इस सीन में बनी कम समय में ज्यादा से ज्यादा जगहें देख लेना चाहता है। उसकी नजर हमेशा अगली मंजिल पर रहती है। उसे लगता है कि अगर वह एक जगह ठहर गया तो बहुत कुछ देखने से रह जाएगा। तभी नैना उससे कहती है-

जितना भी ट्राई करो बनी, लाइफ में कुछ न कुछ तो छूटेगा ही। तो क्यों न जहां हैं, वहीं का मजा लेते हैं। यह केवल फिल्मी संवाद नहीं है। यह उस बेचैनी का जवाब है, जिसके साथ आज हममें से बहुत से लोग जी रहे हैं।

बनी की रफ्तार और नैना का ठहराव

गौर करें तो बनी और नैना दो ऐसे स्वभाव हैं, जो कहीं न कहीं हम सभी के भीतर मौजूद हैं। बनी को अगला शहर, अगला सफर और अगला अनुभव चाहिए। वह दुनिया से कुछ भी मिस नहीं करना चाहता। उसके पास सपने हैं, ऊर्जा है और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की हिम्मत भी।

दूसरी तरफ नैना समझ चुकी है कि जिंदगी की सूची कभी पूरी नहीं होती। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी सामने आ जाती है। वह बनी को सपने देखने या दुनिया घूमने से नहीं रोकती। वह केवल इतना कहती है कि अगली मंजिल तक पहुंचने की जल्दी में उस खूबसूरती को मत भूलो, जो इस समय तुम्हारे सामने है।

दोनों किरदारों के बीच का यही अंतर फिल्म को आज भी प्रासंगिक बनाता है। बनी के पास रफ्तार है और नैना के पास उस रफ्तार को संभालने वाला ठहराव।

Review Point: सामान्य बातचीत में छिपी बड़ी बात

इस सीन की खासियत क्या है? इसमें कोई लंबा भाषण नहीं दिया गया। न जरूरत से ज्यादा ड्रामा है और न भावनाओं को जबरन उभारने की कोशिश। दो लोग बैठे हैं और जिंदगी को देखने के दो अलग नजरिए हमारे सामने आ जाते हैं।

रणबीर कपूर का बनी कुछ भी पीछे नहीं छोड़ना चाहता। उसे डर है कि रुक गया तो जिंदगी आगे निकल जाएगी। दीपिका की नैना शांत है, लेकिन यह शांति कमजोरी नहीं लगती। उसके चेहरे पर ऐसी समझ दिखाई देती है, जो अक्सर जिंदगी को करीब से महसूस करने के बाद आती है।

इस बातचीत में कोई जीतता या हारता नहीं। नैना की बात सुनकर बनी के सपने गलत नहीं हो जाते। वहीं बनी की बेचैनी के सामने नैना का संतोष फीका नहीं पड़ता। सीन केवल यह बताता है कि अच्छी जिंदगी के लिए शायद दोनों की जरूरत है—आगे बढ़ने का उत्साह भी और कभी रुककर अपने आसपास देखने की समझ भी।

सिर्फ प्रेम कहानी नहीं थी ‘ये जवानी है दीवानी’

साल 2013 में रिलीज हुई ‘ये जवानी है दीवानी’ को दोस्ती, प्रेम और यात्रा से जुड़ी फिल्म के रूप में याद किया जाता है। इसके गाने आज भी शादियों और पार्टियों में बजते हैं। बनी और नैना की प्रेम कहानी के साथ अवि और अदिति की दोस्ती ने भी दर्शकों को प्रभावित किया।

लेकिन फिल्म की खूबसूरती केवल इसके गानों और रोमांस में नहीं थी। यह बड़े होने, पीछे छूटते दोस्तों, अधूरे रिश्तों और सपनों की कीमत की बात भी करती है।

बनी पूरी दुनिया देखना चाहता है और अपनी पसंद की जिंदगी जी भी रहा है। लेकिन पुराने दोस्तों के बीच लौटकर उसे महसूस होता है कि दुनिया देखने के सफर में उसकी अपनी छोटी-सी दुनिया पीछे छूट गई। वह कई खूबसूरत जगहों पर पहुंचा, लेकिन पिता के साथ उनका आखिरी समय नहीं बिता पाया। उसके पास किस्से बहुत हैं, मगर कुछ ऐसे खालीपन भी हैं जिन्हें कोई नई मंजिल नहीं भर सकती।

आज के दौर में और जरूरी है नैना की बात

आज हमारे पास पहले से ज्यादा विकल्प हैं। एक ट्रिप पर जाते हैं तो सोशल मीडिया दूसरी दस जगहें दिखा देता है। एक लक्ष्य पूरा होता है तो अगला सामने आ जाता है। कभी बेहतर नौकरी चाहिए, कभी बड़ा घर और कभी दूसरों जैसी जिंदगी।

इसी भागदौड़ में जो हमारे पास है, वह सामान्य लगने लगता है। ध्यान लगातार उन चीजों पर रहता है, जो अभी मिली नहीं हैं। नैना का संवाद महत्वाकांक्षा छोड़ने की बात नहीं करता। वह केवल याद दिलाता है कि सब कुछ पाने की कोशिश में उस पल को जीना न भूलें, जिसके लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं।

यही कारण है कि 13 साल बाद भी यह सीन अपना लगता है। बनी की उलझन आज भी हमारी उलझन है और नैना का जवाब आज भी उतना ही जरूरी- दुनिया देखने की चाह जरूर रखिए, लेकिन कभी-कभी रुककर यह भी देखिए कि इस वक्त आपके सामने क्या है। कहीं सब पाने के फेर में हम जो हाथ में है - उसको भी तो नहीं खो रहे!

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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