Parenting Tips (Pampering Is Killing Your Child): हर मां-बाप अपने बच्चे को बड़े लाड़-प्यार से पालते हैं। वैसे तो हर किसी का पेरेंटिंग स्टाइल अलग होता है, लेकिन नीयत सिर्फ बच्चों की भलाई ही होती है। हालांकि पेरेंटिंग के सही मॉडल पर कोई एक मत नहीं बन पाया है। कुछ पेरेंट्स बच्चे के साथ स्ट्रिक्ट रहना, उन्हें डांटना या मारकर समझाना सही मानते हैं तो कुछ उनको एकदम फूल की तरह पालते हैं।
डॉक्टर ने किया पेरेंट्स को अलर्ट
इसी बीच एक डॉक्टर के सोशल मीडिया पोस्ट ने पेरेंटिंग के स्टाइल पर एक बार फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है। थायरोकेयर के संस्थापक डॉक्टर ए वेलुमणि ने सोशल मीडिया के जरिए पेरेंटिंग पर लिखा है कि पेरेंट्स को अपने बच्चों को ज्यादा लाड-प्यार नहीं करना चाहिए। बचपन से हर जिद्द पूरी होने और हर चीज पर अपना अधिकार मानने की आदत ही बाद में बच्चों में स्ट्रेस यानी तनाव बढ़ाती है।

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इसके अलावा डॉ. ए वेलुमणि ने ये भी कहा कि पिछले 5 साल के अनुभव में उन्होंने पाया है कि जो पेरेंट्स अपने बच्चों को ज्यादा गाइड नहीं करते और उनको अपनी खुद सुलझाने के लिए कहते हैं, उनके बच्चे ज्यादा कॉन्फिडेंट, सुलझे हुए, आत्मनिर्भर और हिम्मतवाले होते हैं। वे हालात के आगे घुटने नहीं टेकते और कठिन परिस्थितियों का डट कर मुकाबला करते हैं। वहीं जो पेरेंट्स हर चीज बच्चे के हाथ में परोस देते हैं और उनको टफ सिचुएशन हैंडल करना नहीं सिखाते उनके बच्चे कंफ्यूज, तनावग्रस्त, निर्भर और डरे हुए नजर आते हैं।
ज्यादा लाड़-प्यार के क्या हैं नुकसान
गुरुग्राम स्थित पारस हॉस्पिटल के सायकिएट्रिस्ट डॉ. अनिल कुमार कहते हैं कि ज्यादा लाड-प्यार से बच्चे जिद्दी हो जाते हैं। ऐसे बच्चों की मांग बढ़ जाती है और जब माता-पिता उस मांग को पूरा नहीं करते हैं तब वो नखरे और मनमौजी व्यवहार दिखाते हैं। साथ ही वे जिंदगी को लेकर भी प्रैक्टिकल अप्रोच नहीं रखा पाते हैं। जरूरज से ज्यादा दुलार पाने वाले बच्चों को इन परेशािनयों का सामना करना पड़ता है:
1. ऐसे पेरेंट्स के बच्चे जीवन की निराशा का सामना नहीं कर पाते हैं। वो अक्सर दुखी और परेशान ही नजर आते हैं।
2. ऐसे बच्चों में कॉन्फिडेंस की काफी कमी रहती है। उनके अंदर हमेशा यह डर रहता है कि अगर वह कुछ गलत बोल देंगे तो लोग उनकी हंसी उड़ाएंगे और उन्हें भला बुरा बोलेंगे।

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3. ऐसे बच्चों की करियर च्वॉइस भी अपनी पसंद का नहीं होता। वो पेरेंट्स की तरफ देखते हैं और तब पेरेंट्स अपनी पसंद उन पर थोपते हैं।
4. इस तरह के बच्चे पेरेंट्स पर ज्यादा निर्भर रहते हैं क्योंकि बचपन से ही उन्होंने कोई टफ टाइम नहीं दखा है और ऐसे में जब परेशानी आती है तो वो बहुत जल्दी तनाव महसूस करते हैं।
5. ऐसे बच्चे फैसले लेने में भी अक्सर कंफ्यूजन में ही रहते हैं। वे फैसले करने में आत्मनिर्भर नहीं हो पाते।
तो क्या करें पेरेंट्स -
अगर आप अभी तक ये गलती करते आ रहे हैं तो आपको अपनी अप्रोच में अब कुछ बदलाव करने की जरूरत है। सायकिएट्रिस्ट डॉ. अनिल कुमार का कहना है कि अगर आपका बच्चा किसी बात से परेशान है या उसे समझ नहीं आ रहा है कि उसे क्या करना चाहिए तो उसकी मदद को तुरंत न पहुंचें बल्कि उसे तरह-तरह के रास्ते बताएं। बच्चे को बताएं कि क्या करने से उसे किस तरह के फायदे और नुकसान हो सकते हैं। और फाइनल फैसला लेने का हक उस पर छोड़ दें।

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बच्चे की परेशानी भी सुनें, उसकी बात पर सहमति भी दिखाएं और उसका विश्वास भी जीतें लेकिन समस्या का हल उसे खुद खोजने का अवसर दें। इससे उसमें सॉल्यूशन निकालने की क्षमता का विकास होगा। ये भी ध्यान में रखें कि बच्चा अपने पेरेंट्स को देखकर ही ज्यादातर चीजें सीखता है, इसलिए उसके सामने छोटी -छोटी बातों पर हताश होने या आपा खोने की बजाय खुद भी कंट्रोल में रखने की मिसाल पेश करें। हर समस्या का हंसकर सामना करें और उन्हें मोटिवेट करें कि हारना भी जीवन का एक पहलू है और कहीं मन का पूरा न होने से जिंदगी खत्म नहीं हो जाती है।
