हिमालयी क्षेत्र में 5,000 से ज्यादा ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं।
ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार पिछले दशक में और तेज हुई।
नेपाल सिर्फ हिमालय की गोद में बसा एक खूबसूरत देश नहीं, बल्कि प्रकृति, जलस्रोत और जैव-विविधता का अनोखा संगम है। दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला हिमालय नेपाल की पहचान है और माउंट एवरेस्ट भी यहीं स्थित है। इसके हिमालयी क्षेत्र में हजारों ग्लेशियर हैं, जो कई महत्वपूर्ण नदियों के लिए पानी का स्रोत हैं। लेकिन नेपाल की यही प्राकृतिक खूबसूरती कभी-कभी उसके लिए अभिशाप भी बन जाती है।
नेपाल के रसुवा क्षेत्र में भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। अब तक 165 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 750 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं।
शुरुआती रिपोर्टों में इस आपदा को लेकर अलग-अलग आशंकाएं सामने आईं। हालांकि, वैज्ञानिकों और सैटेलाइट्स की तस्वीरों के शुरुआती विश्लेषण में ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटकर नीचे गिरने और उससे पैदा हुए मलबे के प्रवाह की भूमिका सामने आई है। यानी यह सिर्फ सामान्य बारिश या नदी में अचानक बढ़े पानी की कहानी नहीं है।
नेपाल-चीन सीमा पर आई बाढ़ में 165 से ज्यादा लोगों की मौत। AP
क्या ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़ रहा है खतरा?
यहीं से एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठता है। क्या हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से भविष्य में ऐसी तबाही और बढ़ सकती है? और जब किसी ग्लेशियर से बनी झील अचानक टूट जाती है, तो उसे GLOF (ग्लेशियल झील के अचानक फटने से आने वाली बाढ़) क्यों कहा जाता है? हालांकि, मौजूदा नेपाल आपदा को सीधे GLOF कहना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि वैज्ञानिक जांच में ग्लेशियर के टूटने और उससे पैदा हुए बर्फ-पत्थर के मलबे की भूमिका पर जोर दिया जा रहा है।
GLOF क्या होता है?
जीएलओएफ (GLOF) का पूरा नाम ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड है, जिसे हिमनद झील के फटने से आने वाली बाढ़ कहा जाता है। हिमालय के ऊंचे इलाकों में जब ग्लेशियर पीछे हटते हैं या उनका आकार घटता है, तो उनके आसपास और सामने पिघला हुआ पानी जमा होने लगता है। समय के साथ यह पानी बड़ी झील का रूप ले सकता है। कई बार इस झील को मिट्टी, पत्थर और बर्फ से बनी प्राकृतिक दीवार रोककर रखती है। इसे मोरैन डैम कहा जाता है।
पीड़ित को सुरक्षित स्थान पर ले जा रहे सुरक्षाकर्मियों की फोटो। AP
कैसे फटती है ग्लेशियल झील?
समस्या तब शुरू होती है, जब इस प्राकृतिक बांध पर पानी का दबाव बढ़ जाता है या कोई बाहरी घटना झील में बड़ी लहर पैदा कर देती है।
- भूस्खलन से झील में अचानक बड़ी मात्रा में मलबा गिर सकता है।
- चट्टान या बर्फ का बड़ा हिस्सा झील में गिरने से पानी का स्तर तेजी से बढ़ सकता है।
- इससे प्राकृतिक बांध कमजोर होकर टूट सकता है।
- बांध टूटते ही भारी मात्रा में पानी और मलबा तेजी से नीचे की ओर बहने लगता है।
अगस्त 2024 का थामे घाटी GLOF
इसका एक उदाहरण अगस्त 2024 का थामे घाटी GLOF है। एक बड़े रॉक एवलॉन्च ने लगभग 4,900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियल झील में विस्थापन लहर पैदा की। इसके बाद झील का प्राकृतिक बांध टूट गया। इस घटना से थामे गांव को भारी नुकसान पहुंचा। 135 लोग विस्थापित हुए और घरों, स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों तथा पुलों को नुकसान पहुंचा। इस घटना से एक बात स्पष्ट होती है कि GLOF सिर्फ दूर-दराज के ग्लेशियरों की समस्या नहीं है। इसका असर नीचे बसे गांवों, सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और पर्यटन ढांचे तक पहुंच सकता है।
नेपाल में बढ़ते तापमान से यहां ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। AI IMAGE
बढ़ते तापमान से क्यों बढ़ रही चिंता?
तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और कई जगहों पर नई झीलें बन रही हैं। कुछ मौजूदा झीलों का आकार भी बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि भविष्य में कुछ इलाकों में संभावित GLOF का खतरा बढ़ सकता है। ICIMOD के एक क्षेत्रीय आकलन के अनुसार, पिछले लगभग 190 वर्षों में हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में GLOF की घटनाओं से 7,000 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। संस्था ने यह भी बताया कि आधे से अधिक दर्ज GLOF घटनाएं बड़े पैमाने पर बर्फ, चट्टान या भूस्खलन जैसे मास मूवमेंट से जुड़ी थीं।
इस खतरे को रोका कैसे जा सकता है?
GLOF के खतरे को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं है, लेकिन समय रहते इसकी पहचान और चेतावनी से नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अगर किसी संभावित खतरनाक ग्लेशियल झील की लगातार निगरानी की जाए, तो उसके आकार, पानी के स्तर और प्राकृतिक बांध की स्थिति में होने वाले बदलावों को समझा जा सकता है।
इसके लिए आज कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
- सैटेलाइट तस्वीरें
- ड्रोन
- सेंसर
- जलस्तर मापक उपकरण
- शुरुआती चेतावनी प्रणालियां
कुछ मामलों में जोखिम वाली झील से पानी नियंत्रित तरीके से निकालकर उसका जलस्तर कम किया जा सकता है। लेकिन ऊंचे हिमालयी इलाकों में ऐसा करना बेहद कठिन और जोखिम भरा काम है।
ICIMOD लंबे समय से नेपाल और पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों की मैपिंग, जोखिम आकलन और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों पर काम करता रहा है।
भारत के लिए भी क्यों है बड़ी चेतावनी?
नेपाल की हिमालयी नदियां भारत के कई हिस्सों की जल व्यवस्था से जुड़ी हैं। इसलिए नेपाल में होने वाली बड़ी बाढ़ का असर सीमा पार भी पड़ सकता है। खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे मैदानी राज्यों के लिए नेपाल से आने वाली नदियां बेहद महत्वपूर्ण हैं। हिमालयी क्षेत्र में अचानक पानी और मलबे का प्रवाह नीचे की ओर आता है, तो इसका असर नदी के बहाव और बाढ़ की स्थिति पर पड़ सकता है। यही वजह है कि हिमालय को सिर्फ पहाड़ों की श्रृंखला के रूप में नहीं, बल्कि एक साझा पारिस्थितिक और जल-सुरक्षा क्षेत्र के रूप में देखने की जरूरत है।
त्रिशुली नदी के किनारे आई अचानक बाढ़ से हुई तबाही को देखते बच्चे की फोटो। AP
हिमालय में बदल रहा है प्राकृतिक संतुलन
बताते चलें कि हिमालय स्थिर और हमेशा एक जैसा रहने वाला भूभाग नहीं है। यहां ग्लेशियर बदल रहे हैं, झीलों का आकार बदल रहा है, पहाड़ों की ढलानें अस्थिर हो रही हैं और कई संवेदनशील क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पर्यटन और दूसरी परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है। हिमालयी क्षेत्र में GLOF के जोखिम को समझने के लिए सिर्फ झीलों की गिनती पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि झील कहां स्थित है, उसका प्राकृतिक बांध कितना मजबूत है, उसके नीचे कितनी आबादी रहती है और वहां किस तरह का बुनियादी ढांचा मौजूद है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए संयुक्त जोखिम आकलन करना जरूरी है।
हिमालय में ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों में हो रहे बदलाव आने वाले समय के लिए बड़ी चुनौती हैं। इसलिए सिर्फ आपदा आने के बाद राहत और बचाव पर निर्भर रहने के बजाय निगरानी, पूर्व चेतावनी, वैज्ञानिक अध्ययन और स्थानीय स्तर पर आपदा तैयारी को मजबूत करना जरूरी है। क्योंकि हिमालय की ऊंचाइयों पर होने वाला कोई बदलाव सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। उसका असर नीचे बसे गांवों, नदियों, शहरों और यहां तक कि भारत के मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।
